(सुबह।)
(कौशिक आईने के सामने खड़ा है। आँखों पर चश्मा।)
कौशिक (थोड़ा असहज होकर) बोला -
सुनीति… सच कहूँ तो
मुझे इसमें बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा।
सुनीति (समझाते हुए) बोली -
आज पहली बार ऑफिस जा रहे हैं शादी के बाद।
थोड़ा एडजस्ट कर लीजिए… प्लीज़।
(कौशिक गहरी साँस लेकर हामी भर देता है।)
(ऑफिस के केबिन में कौशिक कंप्यूटर पर काम कर रहा है।)
(स्क्रीन चमक रही है।)
चश्मे से कौशिक सबकुछ साफ़ दिखाई दे रहा था…
पर उसकी अपनी दुनिया धुंधली हो रही थी।
(वो सिर पकड़ लेता है।)
कौशिक (कराहते हुए) बोला -
सिर फट रहा है…
(वो चश्मा उतार देता है।)
(कुर्सी… खाली।)
(केबिन का दरवाज़ा खुलता है।)
राघव (अंदर आते हुए) बोला -
Good morning sir—
(वो रुक जाता है।)
राघव (हैरान होकर) बोला -
सर…?
(वो चारों ओर देखता है।)
राघव बोला -
अभी तो यहीं बैठे थे…।
(वो केबिन के बाहर झाँकता है, फिर अंदर।)
राघव (खुद से) बोला -
Boss कहाँ गए?
(टेबल के चारों ओर घूमता है, पर्दे के पीछे झाँकता है।)
(उसी वक्त सुनीति ऑफिस के फ्लोर से गुज़र रही होती है।)
(वो ये सारा सीन देख लेती है।)
सुनीति (मन में) बोली -
हे भगवान… फिर से?
(वो तुरंत केबिन में जाती है।)
सुनीति (राघव से) बोली -
क्या हुआ? आप किसे ढूँढ रहे हैं?
राघव (घबराया हुआ) बोला -
Mam… बॉस को।
अभी अंदर थे… और अचानक गायब।”
(सुनीति की नज़र टेबल पर रखे चश्मे पर पड़ती है।)
सुनीति को समझने में एक पल भी नहीं लगा…
कौशिक यहीं है। बस दिखाई नहीं दे रहा।
सुनीति (मुस्कुराकर) बोली -
आप बाहर जाइए।
शायद मीटिंग रूम में होंगे।
राघव बोला -
ओह… जी mam।
(राघव बाहर चला जाता है।)
(दरवाज़ा बंद होते ही…)
सुनीति (धीरे से) बोली -
कौशिक जी…?
कौशिक (थकी आवाज़ में) बोला -
सिर बहुत दर्द कर रहा था…।
(सुनीति चश्मा उठाती है और प्यार से उसके चेहरे के पास लाती है।)
(जैसे ही चश्मा उसकी आँखों पर जाता है…।)
(कौशिक फिर से दिखाई देने लगता है।)
सुनीति (नाराज़ + राहत में) बोली -
आज तो आप मुझे मरवा ही देते!
कौशिक (मासूमियत से) बोला -
सॉरी… पर सच में बहुत दर्द था।
अब एक नई समस्या सामने थी…
दिखने के लिए चश्मा ज़रूरी था, पर चश्मा कौशिक के लिए ज़हर बन रहा था।
(सुनीति कौशिक का हाथ थामे खड़ी है।)
सुनीति (दृढ़ता से) बोली -
कुछ न कुछ रास्ता निकालेंगे।
पर ऐसे रिस्क नहीं।
(कौशिक उसे देखता है — डर और प्यार दोनों के साथ।)
(रात।)
(दरवाज़ा खुलता है।)
(कौशिक धीरे-धीरे अंदर आता है। उसके कंधे झुके हुए हैं।)
दिन भर दिखते रहने की कीमत कौशिक ने अपने सिरदर्द और थकान से चुकाई थी।
कौशिक (थकी आवाज़ में) बोला -
आज का दिन… बहुत भारी था।
सुनीति (फिक्र से) बोली -
मैं जानती हूँ… आ जाइए।
(कौशिक पलंग के पास बैठता है।)
(धीरे से चश्मा उतार देता है।)
(वो उसी पल अदृश्य हो जाता है।)
चश्मा उतरते ही वो फिर उसी दुनिया में लौट गया जहाँ वो दिखता नहीं था… पर मौजूद था।
(सुनीति बिना कुछ कहे अपना चश्मा पहन लेती है।)
(उसे कौशिक साफ़ दिखता है — थका, चुप, आँखें बंद किए हुए।)
सुनीति (मन में) बोली -
इतना सब सह रहे हो… सिर्फ़ मेरे लिए।
(सुनीति उसके पास बैठती है।)
(धीरे-धीरे उसके सिर को दबाने लगती है।)
कौशिक (आँखें बंद रखते हुए) बोला -
ऐसा लग रहा है जैसे पूरा दिन किसी ने दिमाग खींच लिया हो।
सुनीति (प्यार से) बोली -
चुप… कुछ मत बोलिए।
(उसकी उँगलियाँ सलीके से चलती हैं।)
जहाँ दवाइयाँ फेल थीं… वहाँ उसका स्पर्श काम कर रहा था।
(कुछ ही देर में कौशिक की साँसें गहरी हो जाती हैं।)
(वो बिना कुछ कहे सो जाता है।)
(सुनीति ने चश्मा उतारा और धीरे से उसके पास लेट जाती है।)
(अब दोनों पास हैं —
एक दिखता है, एक सिर्फ़ चश्मे से।)
(कमरा अँधेरे में डूबा है।)
(सुनीति छत की तरफ़ देख रही है।)
सुनीति (मन में दृढ़ता से) बोली -
चाहे मुझे दुनिया से लड़ना पड़े…
विज्ञान से…
किस्मत से…।
पर मैं अपने पति को
ऐसे नहीं जीने दूँगी।
(वो कौशिक के और पास सिमट जाती है।)
(उसकी आँखें अपने आप बंद हो जाती हैं।)
वो नहीं जानती थी कि जब वो उसके क़रीब होती है तो वो भी
दुनिया से ओझल हो जाती है।
प्यार कभी-कभी इलाज नहीं होता… पर इलाज ढूँढने की ताक़त ज़रूर बन जाता है।
और सुनीति अब हार मानने वालों में से नहीं थी।
(सुनीति लैपटॉप के सामने बैठी है। आँखों के नीचे काले घेरे।)
दिन बीतते जा रहे थे… पर इलाज कहीं नहीं मिल रहा था।
सुनीति हर प्लेटफ़ॉर्म, हर रिसर्च पेपर, हर मेडिकल फोरम खंगाल चुकी थी।
पर जवाब… कहीं नहीं था।
सुनीति (चिड़चिड़ेपन से) बोली -
क्यों नहीं मिल रहा कोई हल…?
(वो लैपटॉप बंद कर देती है।)
(ऑफिस। रात का समय।)
(अचानक पूरी बिल्डिंग की लाइट चली जाती है।)
कर्मचारी बोला -
अरे! लाइट चली गई!
(सुनीति एक फ़ाइल हाथ में लेकर अँधेरे कॉरिडोर में चल रही है।)
(चलते-चलते…)
(उसे लगता है जैसे कोई
उसका पल्लू पकड़कर साथ चल रहा हो।)
सुनीति (रुककर) बोली -
क…कौन?
(वो पीछे मुड़ती है।)
(कोई नहीं।)
(दिल ज़ोर से धड़कने लगता है।)
(सुनीति तेज़-तेज़ चलने लगती है।)
(उसे लगता है
कोई उसके पीछे-पीछे आ रहा है।)
(वो बार-बार पीछे देखती है।)
कुछ नहीं।
सुनीति (घबराकर) बोली -
ये सब क्या हो रहा है…?
(अचानक…)
(उसकी गर्दन के बिल्कुल पास
किसी की गर्म साँसें।)
(सुनीति सिहर जाती है।)
सुनीति (पूरी ताक़त से चीख़ती है) —
आआआ! भूत…!
(उसी पल…)
(किसी के हाथ
उसकी आँखों पर चश्मा लगा देते हैं।)
(जैसे ही चश्मा लगता है…)
(कौशिक सामने खड़ा है।)
कौशिक (हैरान होकर) बोला -
सुनीति!
ये क्या कर रही हो?
कौशिक (नरमी से) बोला -
मैं हूँ…
कोई भूत नहीं।
तुम्हारा पति हूँ।
(सुनीति की आँखों में डर नहीं…
अब गुस्सा है।)
सुनीति (तीखी आवाज़ में) बोली -
आपको मज़ाक सूझ रहा है?!
कौशिक बोला कि
मैं बस तुम्हें—
सुनीति (बीच में काटते हुए) बोली -
बस!
बहुत हो गया!
सुनीति (आवाज़ काँपती हुई) बोली -
आपको अंदाज़ा है मैं किस हालत से गुज़र रही हूँ?
दिन-रात इलाज ढूँढ रही हूँ…।
और आप ऐसे पीछे-पीछे चलकर मुझे डरा रहे हैं?!
(कौशिक चुप।)
(सुनीति गुस्से में फ़ाइल उठाती है।)
सुनीति बोली -
मुझे अभी आपसे बात ही नहीं करनी।
(वो तेज़ क़दमों से वहाँ से चली जाती है।)
(कौशिक वहीं खड़ा रह जाता है —
चश्मे के बिना…
अदृश्य।)
ये झगड़ा किसी नाराज़गी का नहीं था…
ये उस डर का था जो सुनीति को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा था।
और पहली बार… प्यार और परेशानी आमने-सामने खड़े थे।
क्या ये दूरी बढ़ेगी?
क्या कौशिक समझ पाएगा सुनीति की हालत?
या किसी तीसरे को इस अदृश्य सच की भनक लग जाएगी?
Agar kahani pasand aaye to ❤️ de aur follow karein”