(भाग 1)
उसने कभी ऊँची आवाज़ में कुछ नहीं कहा।
न शिकायत… न इल्ज़ाम… न मोहब्बत का इज़हार।
बस…
चुपचाप सब सहती रही।
और शायद…
यही उसकी सबसे बड़ी गलती थी।
1
सफेद लिली उसके हाथों में काँप रही थी।
नाज़रीन को नहीं पता था कि ठंड से काँप रही है या दिल से।
कमरा बहुत शांत था… इतना शांत कि दीवारों पर टंगी घड़ी की टिक-टिक भी उसे चुभ रही थी। उसकी उंगलियाँ फूल की डंडी को ऐसे पकड़े थीं जैसे अगर छोड़ दिया, तो सब कुछ हाथ से फिसल जाएगा।
उसके पीछे खड़ा था — आरव मल्होत्रा।
उसकी मौजूदगी ही काफी थी कमरे की हवा बदलने के लिए।
वो पास था…
बहुत पास।
लेकिन फिर भी…
हज़ार मील दूर।
आरव की आँखें नाज़रीन पर नहीं थीं।
वो खिड़की के बाहर देख रहा था, जैसे वहाँ कुछ ऐसा हो जो उसके अंदर की उथल-पुथल को शांत कर दे।
“आज भी कुछ नहीं कहोगी?”
उसकी आवाज़ भारी थी… मगर भावनाओं से खाली।
नाज़रीन ने पलटकर नहीं देखा।
अगर देख लेती, तो टूट जाती।
“कुछ कहने को बचा ही क्या है?”
उसकी आवाज़ धीमी थी… लगभग बे-सदाई।
आरव ने जबरदस्ती हँसने की कोशिश की।
“तुम्हें हमेशा लगता है कि तुम अकेली हो। लेकिन तुम जानती नहीं, मैं किससे लड़ रहा हूँ।”
नाज़रीन की पलकों पर आँसू जम गए।
“लड़ाई तब होती है आरव…”
उसने पहली बार उसकी तरफ देखा,
“जब दोनों एक-दूसरे के साथ खड़े हों।”
कमरे में सन्नाटा गिर गया।
2
नाज़रीन कभी ऐसी नहीं थी।
कभी ज़ोर से हँसती थी।
कभी छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करती थी।
कभी आरव की बाँह पकड़कर कहती थी—
“तुम मेरे हो, समझे?”
लेकिन वक़्त ने उसे खामोश बना दिया।
और आरव…
वो आदमी जो सब कुछ पा सकता था,
बस उसे छोड़कर।
उनकी शादी कोई कहानी नहीं थी।
वो एक समझौता थी।
दो नाम।
दो परिवार।
और एक रिश्ता… जिसमें दिल को जगह नहीं मिली।
आरव ने शादी की थी ज़िम्मेदारी से।
नाज़रीन ने शादी की थी उम्मीद से।
यही फर्क था।
3
पहली रात भी खामोश थी।
न कोई बात…
न कोई सवाल।
आरव ने बस इतना कहा था—
“मैं तुम्हें इज़्ज़त दूँगा।”
नाज़रीन ने जवाब में मुस्कुरा दिया था।
उसे लगा…
शायद यही प्यार है।
लेकिन इज़्ज़त में गर्माहट नहीं होती।
और मोहब्बत बिना गर्माहट के मर जाती है।
4
आज उसकी सालगिरह थी।
पाँच साल।
पाँच साल की खामोशी।
पाँच साल की अधूरी बातें।
पाँच साल की बे-सदाई।
आरव को याद तक नहीं था।
नाज़रीन ने खुद को समझाया—
“कोई बात नहीं… उसे काम ज़्यादा होगा।”
वो हमेशा उसे समझा लेती थी।
लेकिन आज…
आज कुछ टूट गया था।
5
डिनर टेबल पर दो प्लेटें थीं।
एक ठंडी।
एक खाली।
आरव देर से आया।
“खाना खाया?”
उसने बिना देखे पूछा।
“नहीं।”
“तो खा लो।”
बस…
इतना ही।
नाज़रीन उठी।
प्लेट उठाई।
और सिंक में डाल दी।
उस आवाज़ में कुछ ऐसा था…
जो आरव को चुभ गया।
“क्या हुआ है तुम्हें?”
उसने पहली बार गुस्से से पूछा।
नाज़रीन मुस्कुरा दी।
लेकिन वो मुस्कान उसकी आँखों तक नहीं पहुँची।
“कुछ नहीं आरव…
बस…
अब आवाज़ नहीं बची।”
6
उस रात नाज़रीन सोई नहीं।
वो बालकनी में बैठी रही।
शहर की लाइट्स देखती रही।
उसके अंदर का शोर बहुत तेज़ था।
लेकिन बाहर…
वो चुप थी।
बे-सदाई।
7
सुबह एक चिट्ठी रखी थी।
सफेद कागज़।
साफ लिखावट।
“मैं जा रही हूँ।
क्योंकि मैं चिल्ला-चिल्लाकर प्यार नहीं माँग सकती।
और तुम…
सुन नहीं सकते।
— नाज़रीन”
आरव के हाथ काँप गए।
पहली बार…
उसने उसकी खामोशी सुनी।
और तब समझ आया…
कुछ आवाज़ें तबाही मचाती हैं,
जब वो अचानक सुनाई देती हैं।
8
घर खाली था।
लेकिन आरव का सीना भारी।
उसने सोचा था नाज़रीन हमेशा रहेगी।
चुप…
मगर मौजूद।
उसे क्या पता था…
कि खामोशी भी एक दिन चली जाती है।
9
नाज़रीन ट्रेन में बैठी थी।
खिड़की से बाहर देखते हुए।
आँसू गिर रहे थे।
लेकिन चेहरे पर सुकून था।
कम से कम…
अब वो खुद को सुन सकती थी।
10
और पीछे…
आरव पहली बार
उस औरत के बिना साँस लेना सीख रहा था…
जिसने कभी
उससे कुछ माँगा ही नहीं।
— भाग 1 समाप्त
अगला जारी रहेगा........