Prem n Haat Bikaay - 16 in Hindi Love Stories by DrPranava Bharti books and stories PDF | प्रेम न हाट बिकाय - भाग 16

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 16

16  ---

      वह वर्ष भी हँसते, खेलते कहाँ उड़नछू हो गया, पता ही तो न चला |पूरे वर्ष बासुदी इसी प्रकार चाय की लारी पर चाय पीती व सबके साथ मिलकर मस्ती करती रहीं| आदमी के  भीतर का बच्चा कभी नहीं मरता, सो जाता है |उसे जगा दो तो फिर खिलखिलाने लगता है |

     यह भी कमाल ही था कि शुरू वाले दिन एक ही बार शुरू-शुरू में मि. बासु वहाँ दिखाई दिए थे फिर कभी दिखाई नहीं दिए |ड्राइवर  अंगद जी गाड़ी में जमे रहकर प्रतीक्षा करते -करते स्टीरियिंग पर सिर रखे टूलते रहते  और उसकी नाक के नीचे सब मिलकर एंजॉय करते | बासुदी  भी अब खूब शैतान हो गईं थीं और अब तो ख़ुद ही याद दिलाने लगीं थीं चाय की लारी पर चलने के लिए | 

         गर्मी की छुट्टियों में सब बिछुड़े | कोई कहीं गया तो कोई कहीं |लड़के अपने -अपने घरों में अपने माता-पिता, भाई-बहन के पास चक्कर मार आए | बासुदी मि. बासु के साथ विदेश-यात्रा पर गईं और सबके लिए कुछ न कुछ छोटी-मोटी भेंट भी ले आईं | 

     कुंजबाला दीदी अपने 'रिसर्च वर्क' पर गुजरात के कई शहरों में विभिन्न संस्थानों में मुलाकात कर आईं, अनामिका अपने बच्चों को लेकर मुंबई जाकर आई | रेखा बहन वहीं रहीं, उनके पास बाहर जाने का न कोई कारण था और न ही अतिरिक्त साधन ! वैसे भी वो दोनों कम ही शामिल हो पाती थीं शैतानों की धमाचौकड़ी में !  

       अनामिका का पीएच. डी का रजिस्ट्रेशन हो गया | छुट्टियों के बाद सब अपने काम में गंभीर तो हो गए किन्तु शरारतें वैसी ही रहीं | बासुदी, रेखा बहन व कुंजबाला दीदी के शोध प्रबंध की प्रस्तुति  की तारीख़ पास आ रही थीं और अनामिका  का पहला वर्ष था | अभी उसे कम से कम तीन वर्ष अथवा चार या उससे अधिक समय भी लग सकता था |राजेन्द्र  का शोध भी टाइपिंग में था और उसको नौकरी भी मिल रही थी | यह भी तय हो गया था कि वो अपना शोध प्रबंध प्रस्तुत करके नौकरी शुरू कर सकता है, साक्षात्कार बाद में भी होगा तो भी कोई बात नहीं |उसको खुशी तो थी पर सबको छोड़ने का दुःख भी था जो उसके चेहरे पर दिखाई देता था |

 "आना दी ! पता है हमारे हॉस्टल में एक जापानी लड़का आया है ---" मयंक ने बहुत उत्साह से बताया| गुजरात में रहने के कारण वह अधिकतर प्रत्येक शनिवार की शाम   को पास के कस्बे में अपने घर चला जाता था | 

"अच्छा ! क्या पढ़ने आया है वह यहाँ ?"

"इंडियन इकॉनोमिक्स ----" उत्तर अशोक ने दिया |

"तब उसे ‘स्कूल ऑफ़ इकॉनोमिक्स’ में दाखिला लेना चाहिए था न !उल्टी गंगा क्यों बहा रहा है ? " अनामिका ने अपने ज्ञान के कपाट खोले|  

   बासुदी ने भी उसकी हाँ में हाँ मिलाई | 

 " नहीं उल्टी गंगा नहीं, हाँ, वह पहले गाँधी जी के बारे में जानना चाहता है, एक वर्ष का गाँधियन विचारधारा का कोर्स करके वह वहीं एडमिशन ले लेगा | "

       पूरा ग्रुप इस समय ख़ाली था, सभी लायब्रेरी के पीछे वाली सीढ़ियों पर टिफ़िन लिए बैठे थे|सामने सुंदर फूलों का बगीचा था और उनके एक ओर लंबे अशोक के वृक्षों की कतारें ! जिनकी टहनियों पर छोटी-बड़ी गिलहरियाँ फुदकती रहतीं | जैसे ही इधर सीढ़ियों पर टिफ़िन खुलते, गिलहरियों को सुगंध आ जाती|अपनी दावत का समय वे कभी न भूलतीं|   लंबे-लंबे वृक्षों से उछल-कूद मचाती हुई वे  सीढ़ियों पर आ फुदकने लगतीं| 

        मयंक व अशोक ने गिलहरियों को खाना देने की शुरुआत की तो वो प्यारे मित्रों की तरह खूब करीब आने लगीं | फिर तो सब उन्हें अपने हाथ से खिलाने लगे | वो बड़ा मज़ा लेती हुई अपनी पूँछ लहराती हुई इधर से उधर भागते हुए  फुदकती हुई खातीं, फिर पेड़ पर जा चढ़तीं |खाना खत्म होने के बाद भी वे सीढ़ियों पर खाने के बचे-खुचे दाने टूंगने के लिए चक्कर मारती रहतीं और गोल-गोल आँखों से मटर-मटर सबको ऐसे देखतीं कि उन पर प्यार आ जाता | 

कुछ दिनों के बाद तो गिलहरियों का पूरा काफ़िला आने लगा था | उनकी शरारतें देखकर सीढ़ियों पर बैठे हुए सबका मन खिल जाता | 

"ऐ ---वो देखो तुम्हारा जापानी फ्रैंड ---!" बासु दी ने इतनी ज़ोर से बोला कि सबकी दृष्टि उस ओर उठ गई | 

       एक लंबा गोरा-चिट्टा लड़का खादी के श्वेत कुर्ते, नीली जींस में खादी का झोला कंधे पर लटकाए सामने वाले बिलकुल सटे हुए रास्ते से गुज़र रहा था |उसका ध्यान बिलकुल सीधी सड़क पर था, उसने इधर-उधर देखने की कोई चेष्टा नहीं की |  

"हैलो ----" अचानक  राजेंद्र उसी रास्ते पर था |शायद वह अपने चैंबर से निकलकर आया था  जिसका रास्ता उसी ओर से आता था | हॉस्टल में तीन दिन पहले आए हुए उस लड़के से उसकी पहचान हो चुकी थी |   

"हैलो ----यू टोल्ड मी युअर नेम ---बत सॉरी ---आई फॉरगेट ----" जापानी लड़के ने थोड़ी झिझक से टूटे-फूटे शब्दों में कहा | 

"डोंट वरी, आई आल्सो फॉरगोट योर नेम --- आर यू बिज़ी? " मुस्कुराया राजेंद्र  फिर उसने उस जापानी से पूछा | 

"नो--नॉट मच ---आई जस्ट वांटेड टु हैव ए कप ऑफ़ टी ---" 

" दैन कम -----सी, अवर ग्रुप ---लेट मी इंट्रोड्यूस यू टू आल द फ्रैंड्स ---" दो कदम की दूरी पर ही थे दोनों | 

"ओह ! यस ---श्योर ---" लंबे जापानी लड़के ने अपने कंधे से खादी का खिसकता हुआ   झोला संभाला और वीरेंद्र के साथ सीढ़ियों पर बैठे सब मित्रों की ओर बढ़ आया | 

"ओहायो गोजाइ मासु" ---मींस --- 'गुद मॉर्निंग' जापानी लड़के ने पास आकर सबकी ओर झुककर बड़ी विनम्रता से कहा | 

" वैलकम ---ओहायो गोजाइ मासु " बासु दी ने सबकी ओर से उसका स्वागत किया |वे अपने पति के साथ कई बार जापान  जा चुकी थीं और कुछ बेसिक चीज़ों का उन्हें ज्ञान था जबकि बाक़ी सब उन दोनों के चेहरे देखते रह गए | 

       उसे जगह देने के लिए सब सीढ़ियों पर खड़े हो गए | प्रार्थना सभा के हॉल की सीढ़ियाँ बहुत लंबी थीं और ऊपर-नीचे काफ़ी ऊँचाई पर बनी हुईं थीं | वे सब इस प्रकार बैठते थे जिससे सबके चेहरे दिखाई दे सकें |  छोटे कद वाले सबसे ऊपर, उससे नीचे की सीढ़ियों पर लंबे लोग |हाँ, सब दीदियाँ ऊपर ही बैठतीं | बासुदी  सबको छेड़ती रहती थीं ;

"ऐ ---तुम सब लोक, दीदी लोगों के चरनों में बैठने से आशीर्वाद मिलेगा ---" फिर सब खिलखिलाकर हँस पड़ते  | 

"इससे अच्छा क्या होगा, मन से आशीर्वाद और आप लोगों के हाथ का चटपटा खाना तो और भी बड़ा आशीर्वाद !" सब दाँत फाड़ते |ये सारे लड़के बड़े शैतान हो गए थे | 

"दीदी ! हम लोग तो चरण दबा देंगे, दंडवत भी कर लेंगे --बस, ज़रा इस बेचारे पेट महाराज पर इनायत होती रहे सब दीदियों की ---" सारे एक से एक पक्के हो चुके थे |    

"वाई दोंत यू ऑल सित दाउन ----" ये सब क्या बोल रहे थे जापानी लड़के को कुछ समझ नहीं आ रहा था |वह थोड़ा हकबका सा गया था | वह कभी-कभी 'ड' को 'त' बोलता था, सबने इसको नोटिस किया |  

   " यू ऑल्सो जॉयन अस ---प्लीज़ ---" सबने सीढ़ियों पर उसके लिए जगह बना दी और राजेंद्र  ने उससे सबका परिचय भी करा दिया | कुछ संकोच के बाद वह सबके साथ सीढ़ियों पर बैठ गया | सब डिब्बों में से खा रहे थे, उसकी ओर भी डिब्बा घुमाया गया किन्तु वह संकोच में ही रहा | 

"ओह ! नो, नो थैंक्स---प्लीज़ कंटीन्यू --"उसने बड़ी विनम्रता से कहा |

"इकुत्सु  का तोते कुदासी ---" बासुदी  मुस्कुराकर उसकी ओर डिब्बा बढ़ाया | 

 "क्या बोलीं दीदी ? अरे ! ये बढ़िया ---हम सब बुद्धू बन जाएंगे ये लोग तो भई---- किस भाषा में बोल रहे हैं जी --" अशोक गढ़वाली था, उसकी बोली में एक अलग ही मिठास थी | 

"प्लीज़ हैव सम---ये बोली मैं, समझा बुद्धू -"सब ठठाकर हँस पड़े | 

"अरे भई, हमको दो-चार बात आती हैं, जे -- इसको हिंदी सीखनी पड़ेगा | " 

"सिखानी पड़ेगी—और आपको भी दीदी  --?"अशोक ने उन्हें चिढ़ाया | 

"वोई बाबा रे --तुम लोक --जे ---"बासु दीदी के स्टाइल पर एक और ज़ोरदार ठहाका लगा |

 बेचारा जापानी लड़का एक-एक करके सबके चेहरे ताक रहा था |बासुदी के अनुरोध पर उसने डिब्बे से कुछ खाना ले लिया | 

"आ --म --वेरी तेस्ती ---"उसने चटकारा लगाया, उसकी आँखों में एक हल्की सी चमक भी भर आई जो बता रही थी कि वह केवल प्रशंसा करने के लिए ही नहीं बोल रहा, उसे वाक़ई अच्छा लगा था |    

       उसके चेहरे पर कोई ख़ास प्रसन्नता के चिन्ह दिखाई नहीं दे रहे थे या इन सब ठहाके लगाने वालों को उसके चेहरे के भाव समझ नहीं आ रहे थे |नया था, स्वभाव से संकोची भी लग रहा था किन्तु कुछ ही देर में मुस्कान उसके चेहरे पर उतर आई |बासु दी ने उससे दो-एक बात जापानी में कीं थीं शायद इसलिए वह थोड़ा कम्फ़र्ट महसूस करने लगा था  | 

    शायद उसे सबसे मिलना अब अच्छा लग रहा था, एक अपनेपन की थोड़ी सी छुअन !  बिलकुल अनजान स्थान व  लोगों के बीच उसे एक संबल दिखाई दिया था और फुदकती गिलहरियों को देखकर उसके चेहरे पर भी मुस्कान तैरने लगी थी |  

         चाय, नाश्ते के बाद वह उठकर खड़ा हो गया | उसने बताया कि वह एक साल तो यहाँ पर है ही, बाद में विश्वविद्यालय बदल लेगा क्योंकि उसको इंडियन इकॉनोमिक्स में शोध करनी थी लेकिन उससे पहले बापू के बारे में जानना चाहता था और उसे हिंदी व गुजराती भाषाएँ भी सीखनी थीं |