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शीनोदा के सामने बच्चों का उत्तरदायित्व था जिसको अच्छी तरह निबाहने की उसे ट्रेनिंग मिल रही थी | बच्चे स्कूल जाते उसी समय वह दो-तीन घंटों के लिए अपनी यूनिवर्सिटी चला जाता और वहाँ से अपनी ज़रूरत की पुस्तकें व शोध-पेपर्स ले आता |
रात का खाना खाकर वह रोज़ ही बच्चों को घुमाने ले जाता फिर आइसक्रीम तो पक्की ही थी |मज़े की बात यह थी कि दोनों बच्चों में से एक ने भी अपने माता-पिता को याद नहीं किया था | घर का काम रामी कर ही जाती थी |
“देखो, तुम लोग रात में अपना होम-वर्क करना और मैं भी तुम्हारे साथ अपना पढ़ाई करेंगे –मतलब मैं अपना और आप लोक अपना ---”शीनोदा ने पहले ही दिन बच्चों से कह दिया था | दोनों अपना होम-वर्क कर लेते लेकिन शैतानी करना तो उनका जन्मसिद्ध अधिकार था सो कभी-कभी दृष्टांत शैतानी शुरू करता और दृष्टि उसका साथ देती |
“शीनोदा अंकल !आज पढ़ने का मन नहीं है ---”
“मन नहीं है, तब भी जो काम करना होता है, वह तो करना पड़ता न ?”
“एक दिन नहीं करेंगे तो क्या हो जाएगा ?”दृष्टांत सबके साथ ही ऐसा खुल जाता था कि मन में आई बात फटाक से उगल देता |
“तो –ठीक है न, हम लोक एक दिन खाना नहीं खाएँगे और आइसक्रीम भी नहीं –इन फ़ैक्ट एक दिन सब चीज़ों की चुट्टी रकते हैं न ?”शीनोदा को बच्चों की कमजोरी पकड़नी खूब आ गई थी |
“आप गलत बोले अंकल ---“दृष्टि ने अपने अध्यापिका होने का फर्ज़ निभाया |
‘हम लोगों ने –आपको कितनी बार समझाया अंकल, ‘लोक’ नहीं लोग ---”
“ओ ! यस टीचर, यू आर राइट –अब ध्यान रकेगा –ओ –नो—नो –रखूंगा –राइट ?”
“राइट –लेकिन और भी गलत बोले न आप –”दृष्टांत शीनोदा का ध्यान भटकाते हुए बोला |
“अच्चा –और दूसरा क्या?”शीनोदा ने पूछा |
“अब एक और ---”दृष्टांत उछला |
शीनोदा समझ गया कि आज तो ये लोग उसको पकाने के मूड में हैं लेकिन वह भी हार मानने वालों में नहीं था |दोनों ओर पक्के खिलाड़ी थे |
“ तो आपको आज अचार नहीं मिलना चाहिए, बिना अचार का खाना मिलेगा –”दृष्टि ने शीनोदा को चिढ़ाया |
“आपकी गलती बताती हूँ –छुट्टी रखते हैं, आप क्या बोले ‘चुट्टी रकते’—और इसके बाद आपने अच्छा को ‘अच्चा’बोला –बोला कि नहीं ?”
“ हाँ, स्लिप ऑफ टंग –हो जाता है न ।नई-नई बाशा –नो—नो भाषा-- में मुश्किल तो पड़ती है न ?”वह हँसकर बोला |
“तो पनिशमेंट भी मिलेगा न ?”दृष्टांत ने शीनोदा के सामने रखे हुए पेपर्स समेटते हुए कहा |
‘नो—नो --, ऐसा नहीं करना चाहिए –”फिर रुककर बोला |
“तुमको जापान की एक बात बताता हूँ --”
“हम तो कबसे कह रहे हैं, आप बताते ही नहीं—”दृष्टांत ने रूठने का नाटक किया|
“जापान में 100%बच्चे स्कूल में जाते हैं |यानि की वहाँ कोई ऐसा है ही नहीं जो स्कूल न जाए |सरकार का नियम सबको फॉलो करना पड़ता है|हमारे यहाँ बेसिक शिक्षा सरकार की तरफ़ से होती है | हाँ, बड़ी कक्षाओं में या बड़े कोर्स करने के लिए ज़रूर पैसा खर्च करना पड़ता है –”शीनोदा भी बातें करने के मूड में आ गया था |
“तो अंकल ! आपके जापान में सारे लोग पढ़े होते हैं ? मेरा मतलब है ---”
“मैं तुम्हारा मतलब समझ गया | यस, अभी वो ही तो बताया, सभी को बचपन में स्कूल तो जाना ही पड़ता है |”फिर कुछ रुककर शीनोदा ने कहा;
“फिर बड़ी कक्षा में पढ़ने का अपना इंटेरेस्ट है तो ---”कुछ रुककर बोला --
“पता है, हमारे यहाँ स्कूल में कोई सरवेंट नहीं होता, सब बच्चे स्कूल की सफ़ाई खुद करते हैं |”
यह बात बच्चों के लिए नई थी |
“हा –ये क्या बात हुई –हम तो कभी स्कूल में झाड़ू न लगाएँ |आपको पता है अंकल, जब हम किसी दिन संडे को स्कूल जाने की बात करते हैं न तो हमको सब लोग चिढ़ाते हैं ‘संडे को झाड़ू मारने जाना है स्कूल !”
“तुम अगर जापान में पढ़ोगे तो वहाँ सफ़ाई करनी पड़ेगी |” शीनोदा ने तटस्थ भाव से दृष्टि की बात का उत्तर दिया|
दोनों बच्चों को अविश्वसनीय लग रहा था लेकिन वे बड़े मनोयोग से शीनोदा की बात सुन रहे थे |
“अच्छा ! एक बात बताओ, अपना या अपने घर का काम करने में शर्म क्यों आनी चाहिए?हम अपनी माता से काम करवाते हैं तो हम क्यों नहीं कर सकते ?”दोनों बच्चों के पास इस बात का कोई उत्तर नहीं था | वे चुपचाप एक-दूसरे के चेहरे देखते रहे |
“आपसे और किसी ने यह बात नहीं पूछी ?”शीनोदा ने उन्हें चुप देखकर फिर पूछा |
“नहीं, हमको यह तो मालूम है कि फॉरन कंट्रीज़ में सब हाथ से काम करते हैं लेकिन हमारे से तो किसी ने यह बात नहीं पूछी –“ दृष्टांत ने कहा |
“हम्म ---“ कहकर शिनोदा चुप लगा गया | इस विषय पर उसने आगे कोई बात करनी ठीक नहीं समझी |
वैसे इस परिवार में इतने विदेशी मेहमान आते रहते थे कि बच्चों को यह तो मालूम ही था कि विदेशों में सब काम हाथ से करना पड़ता है लेकिन यह पता नहीं था कि जापान में स्कूल भी बच्चों को साफ़ करना पड़ता है |
“आप लोग मंदिर में जाते हैं ?”दृष्टि ने अचानक ही उससे पूछ लिया |
शीनोदा ने बच्चों को बताया कि जापानी लोग प्रकृति की पूजा करते हैं | बच्चों को समझ न आने पर शीनोदा ने उन्हें समझाया कि जापान के लोग नेचर को ईश्वर मानते हैं | उनके यहाँ धर्म का कोई आकार नहीं है, न ही जाति-पाति के भेदभाव है | कोई किसीको छोटा-बड़ा नहीं मानते सब नेचर के बच्चे हैं |
“तो वहाँ पर कोई भगवान होता ही नहीं ?”दृष्टि की बालसुलभ जिज्ञासा शांत ही नहीं हो रही थी |
“नेचर भगवान है न ---आप भी नेचर को भगवान तो मानते हैं न ?”
“नहीं तो ---हम तो राम भगवान, कृष्ण भगवान, हनुमान जी, राधा जी, दुर्गा माँ को भगवान कहते हैं |”दृष्टि बोली |दृष्टांत उसका मुख देख रहा था |
“क्यों –आप लोग सूरज को, अग्नि को, धरती को, पवन –हवा को-----”
“मुझे पता है अंकल पवन –हवा होती है ----”
“हम कहते नहीं क्या पवन सुत हनुमान की जय ---पवन के बेटे हैं न हनुमान जी तो पवन जी को भी भगवान मानते हैं न ?”दृष्टांत जी ने अपना ज्ञान बघारा, वह भला पीछे कैसे रहता ?
“हाँ, तो पवन यानि हवा, सूर्य यानि सूरज की रोशनी, हैं न ?इनको भगवान मानते हैं न तो ये क्या है ?नेचर ही है न ?”
दोनों बच्चों ने फिर एक-दूसरे के चेहरे पर दृष्टि डाली | सही तो कह रहे थे शीनोदा अंकल लेकिन उन्हें कभी इस तरह से समझाया ही नहीं गया था |
“इसे छोड़िए अंकल ----अंकल ! जापान में खेल कौनसे खेले जाते हैं ?” दृष्टांत शीनोदा से जैसे जापान की सारी बातें एक साथ ही जान लेना चाहता था |भगवान और पूजा की बात पर इससे अधिक समझने के मूड में नहीं थे बच्चे !
“ओह ! जापान में तो खेलों की बहुत बड़ी कल्चर है |हमारे यहाँ सूमो और मार्शल-आर्ट्स हमारे जापानी परंपरा के खेल हैं लेकिन अभी तो सब देशों के खेल भी खेलने लगे हैं न !”
“मतलब ?”
“मतलब है कि अब जापान में वैस्टर्न वर्ल्ड का भी बहुत इंप्रेशन पड़ता है न | अभी तो वहाँ पर बेसबॉल और फुटबॉल जैसे खेल भी खेले जाने लगे हैं |”
“सूमो तो वो ही न जो दो बहुत मोटे आदमी लड़ाई करते हैं—”
“अरे !नहीं, नहीं लड़ाई नहीं करते हैं वो खेल है न इसलिए दो लोग कुश्ती कहते हैं न भारत में –वही है वो –”
“अंकल ! चोट नहीं लगती ?” दृष्टि ने पूछा |
“हाँ, चोट तो लगती है न ! आप लोग हॉकी और –क्या कहते हैं उसको –अं –अं –ओह यस और कबड्डी और भी बहुत सारे खेल हैं न, उनमें चोट नहीं लगती है ?”शीनोदा ने हँसकर दृष्टांत से पूछा|
“लगती होगी न लेकिन हम तो नहीं खेलते न !”दृष्टि ने कहा |
“हम भी नहीं खेलते वो तो खिलाड़ी खेलते हैं न !लेकिन वे अच्छे खेल हैं, खेलना चाइए, स्ट्रॉंग बने तो अच्चा होगा न !”
शीनोदा जितना समझा सकता था उसने उतना समझाया और बच्चे जितना समझ सकते थे, उन्होंने उतना समझा ---
“जापान में खेलों को बढ़ावा दिया जाता है –और वहाँ पर रग्बी, टेबल-टेनिस भी खेलते हैं |”
“टेबल टेनिस, बैडमिंटन तो यहाँ पर भी खेला जाता है ---”दृष्टि को भी तो कुछ बोलना चाहिए था न !
“जैसे यहाँ पर स्कूलों में अब्यास करवाते हैं न, वैसे ही हमारे देश में भी स्कूलों में प्रैक्टिस करवाते हैं और खेलों के लिए विशेष रूप से संस्थाएँ भी होती हैं |”
“और म्यूज़िक --? डांस ---?”दृष्टि ने पूछा |
“हाँ, बिल्कुल होता है न—अमारा ट्रेडीशनल म्यूज़िक और डांस—अब तो सब लोक वैस्टर्न म्यूज़िक और डांस भी करते हैं –और –हाँ, बारतीय का भी –शौक है न !”
“बहुत गलत बोल रहे हैं शीनोदा अंकल ----”दृष्टि ने खिंचाई करने की कोशिश की |आख़िर वह शीनोदा की अध्यापिका थी |
“अब्बी तो मैं तुम लोकों को नई जानकारी देता है न –बाद में ध्यान रखूँगा –”
“ शीनोदा भी कम शैतान नहीं था, शैतान बच्चों के साथ शैतानी से काम चलता है न !”तीनों खिलखिलाकर हँस पड़े |
लगभग रोज़ाना ही शीनोदा बच्चों को जापान के बारे में कोई न कोई जानकारी देता और उनसे हिन्दी में बात करता | पहले ही उसकी हिन्दी काफ़ी अच्छी हो चुकी थी |
यहाँ बच्चे रिक्शा में स्कूल जाते थे | बच्चों के रिक्शा वाले राजू भाई बड़े प्यार से रिक्शा में लेकर जाते | शीनोदा से भी राजू का अच्छा परिचय हो चुका था| राजू को एक विदेशी से हिन्दी में बातें करते हुए बड़ा मज़ा आता |वह बहुत से प्रश्न पूछता | किसी दिन यदि सब बच्चों को छोड़कर उसके पास समय होता तो वह बैठ जाता |
“रामी बेन चा पवड़ाओशो ---“ वह कहता
“केम नई –बेसो भाई ---“
वह शीनोदा और राजू के लिए चाय बनाकर लाती, अपने लिए भी और वहीं कार्पेट पर बैठकर उनकी बातें सुनती |
“आपके देस में भी बच्चे रिक्शा में स्कूल जाते होंगे न ?” चाय की चुस्की लेते हुए राजू ने पूछा
“नईं –नईं –वहाँ रिक्शा नहीं होतीं |प्राइमरी स्कूल के बच्चे भी प्रतिदिन गाड़ियों से स्कूल जाते हैं |गाड़ियों की बहुत अच्छी सुविधा होती है |
“तो छोकराओ ने रजा कयारे होय छे ?रविवार को न ?”
“नहीं, वहाँ तो छुट्टी होती ही नहीं –“ शीनोदा ने बताया तो रामी और राजू मुँह फाड़कर देखने लगे |
“प्राइमरी स्कूल के छोटे-छोटे बच्चे भी अकेले गाडियों के द्वारा स्कूल जाते है। गले में आईडी और मोबाइल लटका रखा होता है। अपने आप स्टेशन पर उतरना चढना आदि अपने आप करते है। यह देखकर जान सकते है कि गाडियों की सुविधाएं और जापान कितना सुरक्षित देश है। लोकल ट्रेन तीन प्रकार की होती है। धीमी गति की मध्यम गति की और तेज गति की 75 से 150 कि.मी. की रफ्तार रहती है।“
“अरे बाबा ! नाना बच्चा भी गाड़ी से स्कूल ? आने जे ---” वह चुप हो गई, पता नहीं क्या कहना चाहती थी जैसे शब्द गले के भीतर धकेल लिए हों \
”शनिवार ओर रविवार को गाडियों में हाईस्कूल के विद्यार्थी स्पोर्टस की यूनिफार्म में बहुत मिलेंगे। वैसे तो प्रतिदिन स्कूल के विद्यार्थी गाडियों से जाते है। गाडियों की सुविधा बहुत अच्छी है इसलिए स्कूल जाने के लिए गाडियों के द्वारा ही जाते है।
शनिवार ओर रविवार को गाडियों में हाईस्कूल के विद्यार्थी स्पोर्टस की यूनिफार्म में बहुत मिलेंगे। वैसे तो प्रतिदिन स्कूल के विद्यार्थी गाडियों से जाते हैं ।
“और साब छुट्टियाँ कब होती हैं ?”राजू को बातों को जानने में बड़ा आनंद आता था |वह शीनोदा से अक्सर एक ही बात को घूम फिराकर पूछता रहता |
“अरे ! अबी तो बताया रामी बेन को -- जापान में स्कूल के विद्यार्थियों के लिए छुट्टियां नहीं होती शनिवार रविवार वो स्पोर्टस करने स्कूल जाते है। खेलकूद का टूर्नामेन्ट आदि शनिवार रविवार को होता है न ।”उसने एक बार फिर से सब खोलकर बता दिया |
((1988 मार्च 14 को जापान आयी थी। जापान में अंग्रेजी भाषा बिल्कुल नहीं है मुझे उस समय मालूम नहीं था।
जापानी भाषा सीखने के लिए टोक्यो के एक स्कूल में जाना शुरू किया। उसके लिए गाडी (ट्रेन) से 1.30 घंटे का सफर था।
ट्रेन का टिकट मशीन से खरीदा। पहले तो बहुत मुश्किल था क्योंकि सब कुछ जापानी भाषा में लिखा था। टिकट खरीदकर प्लेटफार्म पर गई न कुली न चायवाले की आवाज न समोसे की दुकाने इनकी जगह वेन्डिंग मशीन में दो भाग होते है ऊपर गर्म चीजे ओर नीचे के भाग में ठंडी। सब प्लेटफार्म पर लाइन से खड़े हुए थे।गाड़ी रुकी तो उतरने वाले यात्री पहले उतरे बाद में चढने वाले यात्री चढे। नोरमल गाडी में 10 से 15 तक कोच होते है। (डिब्बे) कोच के बीच के भाग में तीन लम्बी सीटे आमने सामने होती है। एक लम्बी सीट पर 7 यात्री बैठ सकते है। कोच के आगे के दरवाजे ओर पीछे के द्वार पर तीन तीन यात्री बैठ सके आमने सामने की सीटें होती है। मैं इसलिए बता रही हूं कि लम्बी सीट पर साथ बैठ सकते है तो साथ ही बैठेंगे कोई बीच में घुसकर नहीं बैठेगा यहां तक की छोटा बच्चा भी।
सीट के बीच के रस्तों पर खडे वालों की जगह होती है खडे होते समय भी सब सीट के सामने लाइन लगाकर खडे होते है। जिससे बैठा हुआ यात्री उठकर चला जाये तो उसके सामने खडा यात्री ही उस जगह पर बैठे।
सब कुछ काम नियम और अनुशासन से, किसी को परेशानी न हो इसलिए बैठने वाले यात्री अपना बैग अपनी गोदी में रखते है।
कोई बाते नहीं कोई शोर नहीं सब चुपचाप अपनी-अपनी किताबें पढते हुए या ऊगते हुए। इससे दिनचर्या के बारे में मालूम चलता है कि कितना व्यस्त जीवन है। आजकल किताबों की जगह स्मार्टफोन पर सब लगे रहते है। गाडियों में स्टेशन के नाम का अनाऊन्स ड्राइवर के द्वारा होता रहता है। जिससे कौनसा स्टेशन आया है आसानी से मालूम चल जाता है।
गाडियां सब समय से आती जाती है। अगर आप एक मिनट या एक बाण की भी देरी कर दी तो समझो आपकी ट्रेन गई।
मेरे शहर छोटा है वहां हर 20 मिनिट में ट्रेन आती है। लेकिन टोकियो को लिंक करने वैाले बडे स्टेशनों पर हर तीन मिनट पर गाडियां आती जाती है वो भी समय पर। टोकियो में तो लाइनों के जाल बिछे हुए है। कुछ ऊपर है तो कुछ जमीन के नीचे। पहली सब-वे ट्रेन 1919 में चली थी। जमीन कम होने के कारण सब-वे लाइन जाता है। टोकियो में 278 सब-वे स्टेशन ओर 13 सब-वे लाइन है।
इतनी प्रगति देखते हुए मुझे अहसास हुआ जापान भारत से 20 साल आगे चल रहा है।
अगर कभी एक या दो ही मिनट के लिए गाडी देर हो जाये तो ड्राइवर अनाउंस करके बार-बार माफी मांगता रहता है।
पहले-पहले तो मुझे बहुत आश्चर्य होता था एक-दो मिनिट ही तो देर हुई है। उसका कारण ड्राइवर का बताना और वारंट माफी मांगना। सब अपने काम को बहुत जिम्मेदारी से करते है। समय की किमत बहुत ज्यादा है इसलिए किसी को परेशानी न हो बहुत ध्यान रखते है।
धीरे-धीरे यहां रहते हुए मालूम चला कि गाडियां का समय पर चलना ड्राईवर और कन्ट्रोल रूम के विशेषज्ञ को किसी कडी ट्रेनिंग दी जाती है। इसलिए कभी गाडी 1-2 मिनट देरी से हो तो मैं सोचती हूं कोई बात नहीं चलेगा। लेकिन एक दिन मुझे टोकियो जाना था अपनी दोस्त से मिलने अपने स्टेशन से गाडी में बैठी। हमारे जगह से 1 घंटे 40 मिनिट लगते है और एक बार ट्रेन को बदलना पडता है। बदलने वाले स्टेशन तक पहुंचने से पहले गाडी दो बार अचानक रुकी उसका कारण था क्रॉसिंग पर कोई आदमी खडा था। इस कारण से कुछ मिलाकर 5 मिनट की देरी हो गई इसलिए ड्राइवर बार-बार अनाउंस करके माफी मांग रहा था। गाडी के देर होने से आप सबको बहुत तकलीफ हुई उसके लिए क्षमा चाहता हूं।
यह सुनकर मुझे लगा ड्राइवर की इसमें क्या गलती है और पांच मिनट ही तो देरी हुई है। उसके कारण बार-बार माफी मांगने की जरूरत है क्या? हा इसी कारण मेरी टोकियो जाने वाली एक गाडी छुट गई थी। लेकिन टोकियो जाने के लिए बडे शहरों से हर दो-तीन मिनट में गाडियां है। मैं दूसरी गाडी से चली जाऊंगी। पर मुझे यहां रहते हुए समय की किमत और भी मालूम है, इसलिए मैंने तुरंत ही स्मार्टफोन से अपने दोस्त को सूचना दी माफ करना 5 मिनट देर से पहुंचेगी क्योंकि गाडी लेट हो गई।
यह संदेश लिखने के बाद मुझे लगा मैं भी उस ड्राइवर जैसे माफी मांग रही हूं पर मेरी गलती नहीं है।
मुझे एहसास हुआ यह गलती की बात नहीं, एक दूसरे के समय की कीमत का एहसास है। इसलिए क्षमा मांगते है।
गाडियों में सफर करते हुए आप उस देश की संस्कृति से परिचित हो सकते है। जैसे यहां की गाडियों के कोच में विज्ञापन के पोस्टर बहुत लगे होते है.
यहां के निवासियों में कितना अनुशासन है। गाडियों में मोबाइलफोन से बाते नहीं करते, दूसरे यात्रियों को परेशानी हो सकती है। दूसरा शायद धक्का हो उसको सोना हो या किसी को पढना हो इसलिए जोरजोर से देर तक बाते करना मेनर नहीं है।
प्रोहवर सीट पर मोबाइल साइलेन्ट पर (शांत अवस्था) रखते है। क्योंकि उस सीट पर बैठा यात्री हृदयरोगी भी हो सकता है और किसी
किसी ने पेसमेकर लगा रखा हो तो इलेक्ट्रोनिक वेव से उसके ऊपर असर हो सकता है। सब नियमों का ईमानदारी से पालन करते है। एक सिक्के के दो पहलू होते है। प्रोहेवर सीट का होना अच्छा नहीं है लेकिन इसके कारण अगर दूसरी जगह कोई वृद्ध या गर्भवती महिला खडी हो तो बैठने के लिए फीट कम नहीं देते है। इसी कारण गर्भवती महिलाये अपने बैग पर बच्चे का मार्कटेड लगाकर रखती है जिससे उन्हें सीट मिल सके। आजकल तो हार्ट के मरीज ओर जिससे थकावन रहने से तबीयत ठीक न हो उनके लिए भी मार्केटड है वो अपने बेग पर लगा कर रखते है अगर वो खडे है तो उन्हें बैठने के लिए सीट जी जाए। छोटे बच्चे को बच्चा गाडी में लेकर आने वाली माओ को भी काफी तकलीफ होती है। कभी-कभी गाडी में रश होने से बच्चा गाडी को फोल्डिंग करके हाथ में पकडना पडता है। नीचे उतर समय और चढते समय कोई उनकी मदद भी नहीं करता है।
सब अपने में ज्यादा व्यस्त होते है।
सुबह की गाडियों में लडकियां कोच में मेकअप (श्रृंगहार) करती हुई दिखाई देगी। अधिकार विश्वविद्यालय की छात्राएं होती है। घर पर साथ नहीं मिला तो गाडी में करती है। उन्हें कोई नहीं देखता ओर नहीं टोकता है। सब अपने काम से मतलब रखते है। शनिवार ओर रविवार को गाडियों में हाईस्कूल के विद्यार्थी स्पोर्टस की यूनिफार्म में बहुत मिलेंगे। वैसे तो प्रतिदिन स्कूल के विद्यार्थी गाडियों से जाते है। गाडियों की सुविधा बहुत अटकी है इसलिए स्कूल जाने के लिए गाडियों के द्वारा ही जाते है।
जापान में स्कूल के विद्यार्थियों के लिए छुट्टियां नहीं होती शनिवार रविवार वो स्पोर्टस करने स्कूल जाते है। खेलकूद का टूर्नामेन्ट आदि शनिवार रविवार को होता है।
प्राइमरी स्कूल के छोटे-छोटे बच्चे भी अकेले गाडियों के द्वारा स्कूल जाते है। गले में आईडी और मोबाइल लटका रखा होता है। अपने आप स्टेशन पर उतरना चढना आदि अपने आप करते है। यह देखकर जान सकते है कि गाडियों की सुविधाएं और जापान कितना सुरक्षित देश है। लोकल ट्रेन तीन प्रकार की होती है। धीमी गति की मध्यम गति की और तेज गति की 75 से 150 कि.मी. की रफ्तार रहती है।
बुलेट ट्रेन तेज रफ्तार की गाडी जिसे जापानी भाषा में शिनकान सेन कहते है। इनकी गति 250 से 310 कि.मी. की होती है। ये ज्यादातर लम्बी दूरी तय करने की ट्रेन है टोकियो से ज्यादातर चलती है।
टोकियो स्टेशन से ओसाका स्टेशन लगभग 397 मी. दूर है। इन ट्रेनों से 2.30 मिनट में दूरी तय की जा सकती है। दो से चार घंटे के बीच में आप जापान को एक कौने में दूसरे कौने तक जा सकते हो।
शिनकान सेन में सफर करने का एक दूसरा ही आनंद है। टोकियो स्टेशन पर शिनकान के प्लेटफार्म अलग बने होते है। गली में बैठने से पहले सब स्टेशन पर ओबेन्तो खरीदते है। इसका भी अपना एक कल्चर है। अलग-अलग स्टेट के खानो के लन्च बॉक्स मिलते है। यात्रा उन्हें खरीद कर अपनी सीट पर खाते है और यात्रा का आनन्द लेते है।
शिनकाशन सेन में भी लन्च बॉक्स बेचने के लिए काजी तो 10 हजार से भी ज्यादा है पर स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तकरीबन 4 हजार तक सीखाई जाती है।
प्राइमरी स्कूल के बच्चों ने अभी पूरी काजी नहीं सीखी इसलिए उनकी किताबों में हिरागाना का ज्यादा प्रयोग होता है। जैसे-जैसे उच्चस्तर पर जाते है। काजी बढती जाती है। हिरागाना कम होता जाता है।
काजी को याद करना और पढना बहुत मुश्किल होता है। क्योंकि यह सिम्बोल जैसे लिखा जाता है। एक करेक्टर (चिह्न) को दूसरे करेक्टर के साथ जोड कर लिखेंगे तो उसका अर्थ बबल जाता है। ऐसे ही कई कोम्बीनेशन याद करने पढते है।
ग्रामर हिन्दी से मिलती है इसलिए बोलने में ज्यादा कठिनाई नहीं हुई। हिन्दी में ीलींग पुरुषलिंग आदि और एक वचन बहुवचन होते है। जापानी भाषा में नहीं होते। दैनिक बोलचाल में कोई कठिनाई नहीं है पर यहां अपने ऊपर के उम्र या अपने शिक्षक कम्पनी के बोस आदि से बात करते समय उन्हें आदर देना चाहिए तो कुछ शब्द बदल जाते है. इसलिए पहली मुलाकात में सब उम्र पूछते है। पहले तो सुन कर अटका नहीं लगता था बाद में मालूम चला कि जापान में अपनी उम्र से बडा या छोटा हो तो उसके साथ बोलन का तरीका बदल जात))
कुछ दिनों के बाद अनामिका व विवेक वापिस लौट आए और उन्हें यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि बच्चों को कोई परेशानी नहीं हुई थी और बच्चों की दिनचर्या पहले से भी बेहतर हो गई थी | रामी भी बड़ी खुश थी, उसने बताया कि आधा काम तो भाई ही कर लेते थे | बच्चे इतने खुश रहे थे उसके साथ जितनी इन दोनों ने कल्पना भी नहीं की थी | शीनोदा के घर से जाने के बाद बच्चों ने उसे बहुत मिस किया |