Prem n Haat Bikaay - 28 in Hindi Love Stories by DrPranava Bharti books and stories PDF | प्रेम न हाट बिकाय - भाग 28

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 28

28—

    उन दिनों विवेक व अनामिका एक घर की तलाश में थे | फूल-पौधों को प्यार करने वाले विवेक को बगीचे का बड़ा शौक था | उनके पैतृक घर देहरादून में खूब बड़ा बगीचा था | केले के पेड़ लगे थे और अनामिका ने केले के दहीबड़े वहीं के पेड़ों के केलों से बने हुए खाए थे जो उसकी छोटी नन्द ने बगीचे के पीछे के भाग में लगे केले के पेड़ से  बड़ा सा चरखा(गुच्छा) तुड़वाकर सबके लिए बनाए थे |तब अनामिका को पता चला था कि केलों के बहुत से उपयोग होते हैं | वरना उसे कहाँ कुछ आता था !

विवेक को फ्लैट पसंद न आता, कितने ही घर तलाशे गए, वैसे कुछ पसंद न आते और पसंद आते तो बजट में न आते | विवेक को गार्डन बनाना था, चाहे छोटा सा ही क्यों न हो इसीलिए एक ऐसे घर ली तलाश रही जहाँ बेशक कम सही लेकिन  घर के आगे-पीछे ज़मीन तो हो | आना और विवेक को लगता कि बहुत दिन हो गए उस फ्लैट में रहते जहाँ गीता जैसे परिवार थे, अब बच्चे बड़े हो रहे थे, वहाँ से मुक्ति चाहिए थी | खैर एक मकान मिल गया जिसे घर बनाने में दोनों पति-पत्नी ज़ोर –शोर से लग गए |जिसमें आगे-पीछे ज़मीन थी और विवेक ने उसमें फूलों वाले पौधे लगाने कि अपने सपने को पूरा कआरन शुरू कर दिया था | अभी आना की पीएच.डी का अंतिम समय था और उन्हें उस घर में शिफ्ट होना पड़ा था | शिनोदा का कितना मन था कि एक ऐसा घर लिया जाए जहाँ दोनों परिवार रहा सकें लेकिन विवेक को वह व्यवहारिक न लगता |    

  

     सच्ची !उसे बहुत बार लगा है कि वह बहुत फूहड़ है !पर क्या करे-?अब जैसी थी, वैसी थी, जन्मजात स्वभाव का बदलना नामुमकिन है जबकि आदतों में मुश्किल से ही सही, बदलाव  किया जा सकता है| विवेक ने उसे बहुत कुछ सिखाया, कुछ आदतें भी बदलने  की कोशिश कीं |स्वभाव वही रहा अनामिका का !वही खिलंदड़ा, खिलखिलाने वाला!शुरू शुरू में तो विवेक  को भी अजीब लगता था, बाद में समझ में आ गया, उनकी पत्नी ऐसी ही है |जब भाई आ जाता तब तो दोनों भाई-बहन जैसे पागल ही हो जाते, बच्चों की सी हरकतें करने लगते |             

      वैसे वह विदेश से कम ही आ पाता था | नानी के बाद जब माँ परलोक सिधारीं थी तब वह सपत्नीक आया था उसके बाद पापा को ज़बरदस्ती अपने साथ ले गया था, उन दिनों वह लंदन में था |उसने सोचा था पापा को बदलाव मिलेगा लेकिन पापा दो  माह भी उसके साथ न रह पाए | अनुज पीड़ा से भर उठा, कितनी मुश्किल से पापा उसके साथ आने को तैयार हुए थे किन्तु---!

        उसे लगता, आना दीदी उन्हें अपने साथ ले जाने के लिए ज़िद कर रही थीं, उसने ही पापा से ज़बर्दस्ती की | काश !वह पापा को आना दीदी के साथ जाने देता !लेकिन सब कुछ व्यवस्थित है तो ---?आना और विवेक ने उसे बहुत समझाया | बहुत दिनों के बाद उसका गिल्ट कुछ कम हुआ, फिर भी अक्सर फ़ोन पर रो पड़ता था |ईश्वर ने उसे बच्चे से भी महरूम रखा था | बहुत मुश्किल से अब वह एक दो बार आना दीदी के पास आ सका था | भारत की ज़मीन छूते ही उसे अपना शहर, गलियाँ, मित्र जैसे दूर से ही पुकारने लगते और वह झूम उठता, अपनी मिट्टी में लोटने को !उसकी आँखों में नूर के साथ पानी भर जाता और हृदय की धड़कनें चीख-चीखकर उस पर मलामतें बरसाने लगतीं |

     चले तो जाते हैं विदेश लेकिन मन पर किलो-किलो के पत्थर बँधे रहते हैं|ख़्वाबों, ख़यालों में अपने देश की मिट्टी की सुगंध से तन-मन सुवासित रहते हैं और विदेशों में रहकर अपने को 'सुपीरियर' दिखाते हुए एडजस्ट करने की कला में निपुण होते चले जाते हैं लोग!   

     शीनोदा अनामिका और विवेक के परिवार से बहुत प्रभावित था | उसको भारत में अब तीसरा साल था |पिछले बार जब वह जापान गया था उसने अपने पिता को खो दिया था| उस बार वह अपने काम से छुट्टी लेकर एक माह के लिए  कई स्थानों पर चक्कर मारकर आया था | यूरोप के कई स्थानों पर गया था वह अपने चेंज के लिए | तभी वह जर्मनी भी गया जहाँ उन दिनों बर्लिन में अनामिका का भाई अनुज व भाभी ख्याति भी थे |

      पिता के हादसे के बाद अनुज लंदन में नहीं रहना चाहता था | इसलिए उसने अपना व ख्याति का तबादला करवा  लिया था | उनके पास दो दिन रहने में ही उसकी अनुज व ख्याति से घनिष्ठ मित्रता हो गई |परिचित तो दोनों पति-पत्नी पहले से ही थे उससे | इन दोनों के व्यवहार व अतिथि सत्कार से शीनोदा और भी बहुत प्रभावित हुआ|ख्याति का स्वभाव भी अनामिका के जैसा ही था|स्पष्ट, सरल, सहज, अपनेपन से भरा हुआ| उसके मन में यह बात उतरने लगी कि शादी करने के लिए भारतीय लड़की से अधिक अच्छी कोई नहीं |  

      शीनोदा ने टेगेल हवाई अड्डे के पास ही बर्लिन में होटल ‘मेरिओट’ में चैक-इन करके अनुज को मिलने आने की सूचना दी|उनको पहले से ही मालूम था कि वह आने वाला है | आश्चर्य ! दोनों पति-पत्नी ने उसे आने के लिए मना कर दिया | वह सोच में पड़ गया, उसे लगा, वह बेकार ही अनामिका के भाई से मिलने आया लेकिन कोई दो घंटे बाद ही पति-पत्नी उसके सामने थे | शीनोदा का कुम्हलाया चेहरा फूल सा खिल उठा | 

 “हमारे यहाँ होते हुए आप यहाँ होटल में रहेंगे ? चलिए –प्लीज़ पैक युअर बैग ---”

“ओह ! नो –नो –इट्स ओ.के  –आइ एम कम्फर्टेबल ---दिस इज़ नॉट--–”

     शीनोदा संकोच में था, अपनी संस्कृति से उसने किसीको परेशान न करना सीखा था, उधर अनुज अपने संस्कारों से पीछे हटने के मूड में नहीं था |

“नो, इट्स नॉट ओ.के ---” कितनी नानुकर करने के बाद भी अनुज उसको होटल से यह कहकर उठा ही लाया कि दो दिनों बाद वे लोग उसे एयरपोर्ट छोड़ने आ जाएँगे| उसका एडवांस भी बेकार ही गया| 

    लगभग दो घंटे की दूरी तय करके पहुँचे थे अनुज और ख्याति उसको लेने | कमाल है ! यह भारतीय संस्कृति भी अलौकिक ही है | अतिथि सच में ही इनके लिए देव होता है !शीनोदा को अनामिका और विवेक का परिवार भी याद आया | एक से ही संस्कार दोनों भाई–बहनों  के !आख़िर एक ही माता-पिता की संतानें थीं दोनों –लेकिन ख्याति भी उनमें ऐसी मिली थी जैसे पवन के साथ सुगन्धित बयार का झौंका !

    दो दिनों में जैसे शीनोदा अनुज के परिवार का ऐसा हिस्सा बन गया मानो कहीं छूट गया था और अब फिर से जुड़ गया हो| 

“अब तो पक्का इंडियन लड़की से ही शादी करनी है –” उसने अनुज और ख्याति से भी अपने मन की बात साझा की |       

“शीनोदा !शादी के लिए एक लड़की की ज़रूरत भी होती है, कोई तलाश कर ली है क्या?”ख्याति भी काफ़ी खुल गई थी उससे !

      न देश, न जात-पात, न बिरादरी –यहाँ तक कि भाषा भी बिलकुल अलग ! फिर भी एक ही बगीचे के रंग-बिरंगे सुरभित पुष्प से ! मुस्कान की कोई भाषा नहीं होती, बस—वह  खिलती और खिलखिलाती है | 

“इसीलिए मैंने अनामिका को बोला था, मेरे लिए लड़की देखे –वो तो मज़ाक समझते हैं न !”

शीनोदा की इस सादगी पर अनुज और ख्याति खुलकर हँस पड़े |

“अरे ! आप लोग हँसते हैं ---?मैं इतना खराब लगता हूँ क्या ?मेरे साथ कोई लड़की शादी नहीं करेगी, आपको ऐसा लगता है ?”

“ऐसा क्यों कहते हैं ?चलिए, अब आपके लिए लड़की तलाश करनी शुरू करते हैं |”ख्याति ने उसे हौसले की घुट्टी पिलाई | सब जानते थे, आसान नहीं होता ऐसे ही शादी के लिए योग्य  साथी की तलाश करना |

      बहुत आनंद किया शीनोदा ने दो दिन, वो लोग उसके जाने वाले दिन उसे हवाई अड्डे पर छोड़ गए थे |शीनोदा ने ऐसा स्नेह भारत में ही पाया था जिसके लिए कोई शर्त नहीं थी, अंकंडीशनल रिश्ते !भारतीयता की सुगंध में सराबोर  वह जापानी लड़का अब अपने भारतीय जीवन-साथी के बारे में गंभीरता से सोचने लगा था |