Prem n Haat Bikaay - 36 in Hindi Love Stories by DrPranava Bharti books and stories PDF | प्रेम न हाट बिकाय - भाग 36

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 36

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     विवाह शानदार तरीके से सम्पन्न हो गया |एक अलग तरह के अंतर्राष्ट्रीय विवाह में सबने खूब आनंद किया | सब संतुष्ट थे, आनंद में थे | अनिल के पिता अभी कोटा में सरकारी नौकरी में थे | सब काम पूरा हो गया तो उन्होंने वापिस जाने की बात की| रंजु के माता-पिता चाहते थे कि रंजु भी उनके साथ चले |एक तरह से उसका पगफेरा हो जाएगा जिसके बारे में दूल्हे राजा को समझाना तो बड़ी टेढ़ी खीर थी | रंजु ने ही पति को समझाया कि जब तक वह उसके जापान जाने की तैयारी कर रहा है, वह अपने पापा के घर रह आए| एक बार जापान जाने के बाद न जाने फिर कब वह अपनी सहेलियों से मिल सकेगी ? 

   जिस शिद्दत से शीनोदा अपनी पत्नी को अपने साथ ले जाने की तैयारी कर रहा था, पूरी संभावना थी कि हफ़्ते भर में रंजु के वीज़ा का काम हो ही जाएगा |एम्बेसी से डायरेक्ट काम हो रहा था उसका, उसके भाई, भाभी ने जापान जाकर माँ को आँखों देखा हाल सुनाया और वह, सगे-संबंधी, मित्रगण, कुलीग्स सब नई दुल्हन का स्वागत करने के उत्साह में उतावले  हो रहे थे |  शीनोदा ने  रंजु को उसके माता -पिता के साथ इस शर्त पर जाने के लिए हाँ कर दी थी कि उसको वहीं से जापान जाने की तैयारी कर लेनी होगी | उसने दिल्ली से जापान जाने का निश्चय किया था और कहा था कि  वह दिल्ली जाते हुए उसे बीच में पिक करके  ले जाएगा |

     रंजु की बड़ी बहन विवाहित थीं, वे भी उत्तर प्रदेश से आईं थीं |उनके पति आई सर्जन थे, वे अपना क्लीनिक कंपाउंडर को सौंपकर आए थे, उनके कई पेशेनट्स की सर्जरी उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं  | बहन डिग्री कॉलेज में अध्यापिका थीं, वे भी छुट्टी लेकर आई थीं | सबको आना था इस इंटरनेशनल विवाह में | फिर न जाने कब मिले बहन ?लेकिन अधिक समय किसी के पास नहीं था सो  शादी के दो दिन बाद वो भी जाने की बात करने लगीं, करने क्या लगीं वे पहले से ही अपनी लौटने की बुकिंग करवाकर आई थीं|आना के  घर में कितना शोर-शराबा था ! धीरे-धीरे सब छँटने लगे और फिर जीवन  पहले जैसे ही उसी ट्रैक पर चलने की कोशिश करने लगा | जीजा जी व बीबी इतनी दूर से आए थे, उनका जल्दी जाने का कोई सवाल ही नहीं था | वैसे वे जब भी आते, दो/तीन महीने तो रहते ही | आख़िर उनका वहाँ भी अब अवकाश के बाद ऐसा क्या काम अटक रहा था ? 

“लो भैया, हो गया बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना –अब चिड़ियाँ तो उड़ जाएंगी फुर्र से, हम सब रह जाएंगे उन्हें ताकते –”भई, जीजाजी को कुछ तो चाहिए था बोलने को | 

“बस, बहुत हो गया शर्मा जी ---” बीबी यानि उनकी पत्नी इस बार तो सचमुच उनसे नाराज़ हो गईं | 

“कहीं भी, कुछ भी ! इतने बड़े अफ़सर रहे, समझ में खाक नहीं आता | इतने ही पराया समझते हो तो आए क्यों थे ?” वे बड़बड़ करने लगीं थीं और जीजा जी विवेक के सामने भोला सा मुँह बनाकर बैठ गए थे | 

“यार विवेक, ये तुम्हारी बहन कभी खुश ही नहीं दिखाई देती ---!”और फिर खुद ही ठठाकर हँस पड़े | 

“जीजा जी उम्र भर डाँट खाई न, तो अब भी खा लीजिए चुपचाप वरना ---” दोनों फिर ठठा दिए | 

बीबी कभी-कभी बड़ी कुढ़ जातीं ऐसी बातों से फिर आना के साथ साझा करतीं लेकिन जीजा जी के स्वभाव को भला कौन बदल सकता था !!वैसे भी किसी के मूल स्वभाव को कोई कहाँ बदल सकता है ? 

     शीनोदा के सभी काम बहुत समय से हो गए थे | वह कोटा होता हुआ पत्नी को लेकर जापान निकल गया था | जापान में उसके माता –पिता अपनी भारतीय पुत्र वधू के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे | वह शिंतो धर्म को मानने वाला परिवार है | यह धर्म विश्व  के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है व जापान का मूल धर्म है इसमें कई  देवी-देवता भी  हैं जिन्हें ‘कामी’ कहा जाता है |इसमें बौद्ध धर्म के कई सिद्धांतों का मिलाप है | इन सिद्धांतों के मिल जाने के बाद ही ‘झेन संप्रदाय’ की स्थापना हुई |

     वैसे तो आज का आधुनिक जापानी वर्ग भी पश्चिमी पद्धति से प्रभावित होता जा रहा है किन्तु शीनोदा अपनी माँ व अपने से जुड़े हुए लोगों  की इच्छा का मान  रखना चाहता था इसलिए भारतीय परंपराओं के अनुसार विवाह करने के बावज़ूद भी वह अपनी माँ की खुशी  व परिवार के आनंद व संतुष्टि के लिए जापानी पारंपरिक विवाह करने के लिए तैयार हो गया था | 

      जापानी शिंतो विवाह की रस्म वहाँ के पुजारियों के द्वारा करवाई जाती है लेकिन यह किसी मंदिर मरण न होकर अक्सर होटलों या शादियों के लिए बनाए गए विशेष स्थानों पर की जाती है जैसे भारत में बैनक्वेट हॉल या किसी पार्टी प्लेस में विवाह के लिए पहले से ही बुकिंग की जाती  है |पहले के जमाने में घर के बाहर शामियाना लगाकर सड़क पर ही सब इंतजाम हो जाते थे | एक घर की बेटी पूरे मुहल्ले की बेटी मानी जाती, पास-पड़ौस हर समय किसी भी परिस्थिति में सामने खड़ा रहता लेकिन अब यहाँ भी बदलाव आ चुके हैं | इसी प्रकार  जापान में भी  समय के बदलने के साथ शिंतो शादियाँ कम होने लगी हैं | युवा अपनी परंपरा छोड़कर पश्चिमी तरीके से विवाह करने लगे हैं लेकिन शीनोदा ठहरा पारंपरिकता का विश्वासी, वह अपने से जुड़े हुए सब लोगों के साथ आनंद की अनुभूति करना चाहता था और अपनी पत्नी व सभी  को अपनी शादी में आनंद कराना चाहता था | 

    शीनोदा के माता व भाई, भाभी ने मिलकर उसके पहुँचने से पहले ही शादी के लिए भव्य स्टार होटल, शिंतो पुजारी, दुल्हन के व उसके लिए शादी के समय पहने जाने वाला किमोनो तथा भोजन आदि सबकी तैयारियाँ कर लीं, सबकी बुकिंग हो गई थी, उसे तो बस अपनी भारतीय दुल्हन के साथ उस विशेष होटल में प्रस्तुत होना भर था जहाँ शिन्तो पुजारी उसकी रस्में करवाने वाले थे  | उसकी माँ ने अपनी बहू के लिए विवाह के जोड़े के साथ ही दुल्हन के लिए  ‘सूनोककुशी’ भी तैयार करवा लिया था |  

   सूनोककुशी (जापान में शिंतो विवाह में दुल्हन के द्वारा पहना जाने वाला एक प्रकार का पारंपरिक साफ़ा होता है  जो कपड़े का एक आयताकार टुकड़ा होता है और शादी में विशेष रूप से दुल्हन के द्वारा पहनी जाने वाली विग को कवर करता है | यह प्रथा 20वीं शताब्दी में क्राउन प्रिंस योशीहितो और उनकी दुल्हन राजकुमारी कुजो सदाको की शादी के बाद  लोकप्रिय हुई थी |जिसे बाद में परंपरा के रूप में स्वीकारा भी गया किन्तु अब जब से युवाओं पर पश्चिमी प्रभाव का रंग चढ़ने लगा था, पहनावे में भी पश्चिमी लिबास आने लगा था | शीनोदा ने अपनी जापानी शादी की एक-एक रस्म की तस्वीरें भेजी थीं जिनको  देखकर सबको सच में बड़ा मज़ा आया | रंजु का इतना सुंदर मेकअप हुआ था, दरसल मेकओवर किया गया था कि अगर बताया न जाता तो पता ही नहीं चलता कि वह रंजु है अथवा कोई जापानी लड़की !

    अक्सर दोनों पति-पत्नी फ़ोन पर बातें करते रहते |ऐस लगता मानो छोटा भाई अनुज फ़ोन कर रहा हो |अनुज का विवाह में शामिल न हो पाने से शीनोदा उदास हुआ था | उसने काफ़ी दिन पहले ही अनुज से बात करके उसे शादी का निमंत्रण दे दिया था लेकिन बहुत चाहते हुए भी वह अपने प्रोजेक्ट में फँसा होने के कारण नहीं आ पाया था | शीनोदा आना के परिवार का हिस्सा ही था लेकिन उसका वास्तविक परिवार और काम-धाम तो जापान में था सो उसको वहीं रहना भी था ही | यह सन 1982 की बात थी जब वह भारत में विद्यापीठ में आना व अन्य मित्रों से मिला था |1986में में उसकी शादी हुई और इसी वर्ष यूनिवर्सिटी में उसे नौकरी भी मिल गई  और जापान में उसकी गृहस्थी की गाड़ी चलने लगी|कहावत है न ‘जहाँ चाह, वहाँ राह’ शीनोदा को भारत में रहना था, उसे भारत इतना पसंद था कि उसका वश चलता तो वह अपने पूरे परिवार को, विशेषकर माँ को लेकर भारत आ जाता और यहीं बस जाता लेकिन बस वही है न जीवन में प्रत्येक वस्तु, घटना सुव्यवस्थित होती है | हम केवल हाथ-पैर मारते रहते हैं और जो होना होता है, हो जाता है |नौकरी उसे ऐसी मिली कि प्रत्येक वर्ष भारत आना उसकी अनिवार्यता थी | 

     अब इसे क्या कहा जाए?योग?सुयोग?संयोग? जीवन की इस भूल भुलैया में जिन मोड़ों पर से गाड़ी का गुजरना होता है।मनुष्य उससे अनजान रहता है। जब जीवन की गाड़ी गुजरने लगती है तब स्टेशनों को देखकर वह चौंकता है | अरे ! कुछ ऐसी ही तो कल्पना की थी उसने, सपना देखा था कि वह भारत में ही रहना चाहता था और बिना किसी प्रयास के वह संभव भी हो गया ! वह चाहता था कि भारत के परिवारों की भाँति माँ उसके साथ, उसके घर रहें लेकिन उसका वह सपना पूरा नहीं हो पाया | जापान में माँ उससे मिलने आतीं ज़रूर लेकिन दो दिनों के लिए, वह भी होटल में रुकतीं एक बार बहू के पास लंच या डिनर के लिए  जातीं|बाकी समय उन दोनों को अपने होटल में बुला लेती या शॉपिंग करने चली जातीं|