Prem n Haat Bikaay - 45 - Last Part in Hindi Love Stories by DrPranava Bharti books and stories PDF | प्रेम न हाट बिकाय - भाग 45 (अंतिम भाग)

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 45 (अंतिम भाग)

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      ये दुख भी कितने-कितने विभिन्न वस्त्राभूषण पहनकर आदमी के सामने आ खड़ा होता है, अचानक ही|आदमी गूंगा-बाहर बनकर देखता रह जाता है कि भाई कहाँ से आए थे, कहाँ ठिठके ?कहाँ मुड़े?और बाद में देखा तो खड़े थे शून्य पर मुँह फाड़े|न डगर समझ में आती है, न ही लक्ष्य और इंसान घुटता रह जाता है अपने ही भीतर ! 

आना को क्या मालूम था कि बासु दीदी चली जाएंगी |वे बोल नहीं रही थीं लेकिन वैसे पूरी तरह स्वस्थ दिखाई दे रहीं थीं | सबकी तरह उनका समय भी तय था, वो भी दुनिया से निकल गईं | 

    विवेक और बासु दीदी का जाना आना को और अकेला कर गया | रीति-रिवाजों के बाद सबको अपने-अपने काम पर लौट ही जाना था | सबके कार्यक्रम तय थे, शीनोदा व रंजु को भी वापिस जापान लौटना था| यूँ तो आना की बेटी की ससुराल पास ही में थी किन्तु  वह परिवार में रहती थी, साथ ही उस पर व्यवसाय की ज़िम्मेदारियाँ भी थीं | हर समय माँ के पास तो नहीं रह सकती थी | उसके पति व वह खुद समय मिलने पर हर दिन उसका हाल-चाल पूछने आ जाते | लेकिन आना सहज नहीं हो पा रही थी |बेटे दृष्टांत को अधिक छुट्टियाँ नहीं मिल पा रही थीं|अनुज ने भी बहन को अपने साथ चलने की कितनी ज़िद की और बेटे दृष्टांत ने भी, दोनों चाहते थे कि अनामिका  उसके साथ चलें जो अनामिका को मंजूर नहीं था | वह उसी घर में रहना चाहती थी जिसे उसने व उसके पति ने मिलकर बनाया था | एक-एक चीज़ कितनी बार देख-भालकर खरीदी जाती | जब तक दोनों की पसंद मिल न जाती कोई चीज़ खरीदी ही न जाती | गार्डन की तो बात ही क्या थी ! पूरे मुहल्ले में उनका गार्डन मशहूर था | जिस किसी को किसी खास फूल की ज़रूरत होती, उसे आना के घर के बगीचे में मिल जाता जबकि आना ने इसके लिए विवेक की नाराज़गी भी बहुत सही क्योंकि आना फूल तोड़कर दे देती थी लेकिन विवेक ने कभी अपने पेड़ों में से फूल तोड़कर देना पसंद नहीं किया| आज सारे फूल वैसे ही मुस्कुरा रहे थे जैसे विवेक के सामने मुस्कुराते थे|विवेक के बाद के अकेलेपन में गुम हुई आना को जब गिरीश का फ़ोन आया था कि डॉ.   रेखा मेहता भी चल दीं, वह और भी असहज हो गई थी |ज़िंदगी में कितने-कितने कष्ट सहे थे रेखा ने|पति के बाद न जाने कैसे-कैसे बच्चों को पाला, पढ़ाया-लिखाया, बड़ा किया|बेटी की शादी की, एक बेटे ने प्रेम-विवाह किया, उसमें भी रेखा बहन ने उसका साथ दिया लेकिन शादी के बाद वह तो ऐसा पलट गया कि माँ कौन?ऐसे रिश्तों को देखकर पीड़ा होती है | अब बताओ, क्या रहा गया शेष ? केवल मन की कटुता ?     

    इंसान कितना ही बड़ा क्यों न बन जाए वह कितना भी अमीर क्यों न हो जाए पीड़ा बेच नहीं सकता और न ही सुकून और शांति खरीद ही सकता है |   

   शीनोदा, रेखा बहन, बासुदी और सभी मित्र अनामिका की ज़िंदगी का ऐसा हिस्सा थे कि जीवन की कोई कहानी हो, जब उसका वर्णन होता तो सबका जिक्र बड़े स्वाभाविक रूप से आ ही जाता जैसे पवन के झौंके के साथ रेती के कण चारों ओर उड़ने लगते हैं |

      सब चले गए तो मन घबराने लगा अनामिका का लेकिन वह यहीं रहकर अपने पिछले दिनोंमें घूमना चाहती थी | गिरीश व अन्य  पारिवारिक मित्र उसके पास आते रहते --

 

      जीवन से युद्ध करते-करते आदमी टूटने लगता है | ये किसी एक के जीवन की बात नहीं है, सबके साथ ही यह वास्तविकता एक मन की कोठर में बंधी रहती है | कोई इसे सरेआम कर देता है तो किसी के मन में यह पोटली बनकर ऐसे पड़ी रहती है जैसे इसकी गाँठ कभी खुलेगी नहीं | आँसुओं से भीगकर वह पोटली और भी कस जाती है जैसे किसी भीगे गट्ठर की कसकर मार दी गई गाँठ !

       विवाह के बाद का लंबे पचास वर्षों का जीवन भोगने में अनामिका ने क्या खोया, क्या पाया ? उसे खुद खुछ पता नहीं चला |शायद इसका हिसाब-किताब रखना कोई आसान काम नहीं होता | हम अक्सर उन चीज़ों को याद करते हैं जो हमें नहीं मिलीं लेकिन उनका  हिसाब अक्सर भूल ही जाते हैं जो हमारी झोली में न जाने कैसे आ गईं, जिन्होंने  हमें  सराहा, समेटा, खुलकर हँसने-रोने के अवसर दिए | 

      आज भी अनामिका को पापा की बातें याद आती रहती हैं| पापा के अनुसार बेकार का कचरा खाने से अच्छा फल खाना होता था | जब भी अवसर होता वो दोनों बहन-भाइयों को पास बैठकर फल खिलाते यदि संतरा या मौसमी होते उनके छिलके चुपके से मौका देखकर दोनों की आँखों में डालने का प्रयत्न करते | कभी वो अपने इस प्रयत्न में सफ़ल होते तो कभी बच्चे भाग जाते | पापा हँसते हुए कहते ;

“देखो, ये देखो मैं डाल रहा हूँ अपनी आँखों में, ज़रा आँखें मिचमिचा लो, थोड़ी सी चिरमिराहट लगेगी पर आँखों का गंदा पानी निकल जाएगा ---ये देखो ---”वो अपने एक हाथ से आँख चौड़ी करके दूसरे से छिलके को अपनी आँखों में डालते और दोनों भाई-बहन दूर खड़े उनकी आँखों से बहते आँसू देखते रहते | 

“हमें नहीं रोना, आप ही रोइए ----”उनकी प्यारी बिटिया आना ठुनकती |

“मैं लाऊँ पापा, इसे पकड़कर –आजा दीदी, तेरी आँखों की रोशनी हमेशा बढ़िया रहेगी, तुझे चश्मा नहीं पहनना पड़ेगा ---”उसकी ओर पकड़ने को बढ़ते हुए अनुज कहता | 

“तू बढ़ा ले न, आँखों की रोशनी ---लाऊँ मैं इसे पकड़कर पापा ?”

       छोटी-छोटी बातों में ज़िंदगी निकल जाती है और हम अपने पीछे निशान छोडते चले जाते हैं ये निशान एक दिन के तो होते नहीं हैं, ये हम ताउम्र दिल पर लकीर खींचकर रखते रहते हैं | अनामिका बेशक अकेली रह गई थी लेकिन जीवन भर की स्मृतियों से भरे ये सारे संवेदन  उसका जीवन महकाते रहे हैं! ये सारे लोग, ये सारी घटनाएँ, ये सारे रिश्ते |

अनामिका अपना जीवन अब उन स्मृतियों की छाँह तले ही गुजारेगी | जितने दिन भी जीना है, उसके पास काफ़ी रिश्ते हैं जो बरसों से उसके साथ जुड़े हुए हैं | वह सोचती रह गई कि ये रिश्ते किसी एक कोख से नहीं निकले हैं, न ही किसी एक जमीन पर और न ही किसी एक वातावरण की देन  हैं लेकिन ये रिश्ते हैं जो दिल के करीब हैं | जो कुछ भी देकर खरीदे नहीं जा सकते |ये प्रेम के वे रिश्ते हैं जो किसी बाज़ार, हाट में नहीं मिलते हैं | ये रिश्ते ताउम्र उसके दिल के दरवाज़े के भीतर हैं जिन्हें वह कभी भी मिल सकती है, कभी भी जिनसे बात कर सकती है | जो उसके भीतर उगने वाले वे महकते फूल हैं जो कभी चमेली बन जाते हैं, कभी पारिजात तो कभी रात की रानी | ये उसकी पूरी उम्र भर उसे महकाते रहेंगे | इसका उसे पूरा विश्वास था | 

   

डॉ. प्रणव भारती 

pranavabharti@gmail.com