such love in Hindi Love Stories by aakanksha books and stories PDF | ऐसा प्यार

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ऐसा प्यार

एक ऐसा प्यार…
जो शादी के मुकाम तक नहीं जा सकता था,
बस साथ निभा सकता था आख़िरी साँस तक।
ऐसी ही एक कहानी है अक्षिता और अनुराग की।
दोनों एक-दूसरे से बेहद प्यार करते थे।
पर कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं,
जो शादी नहीं कर सकते…
बस अपने प्यार को अपने तक ही रख लेते हैं।
अक्षिता और अनुराग भी एक ही परिवार के थे।
उनका मिलना सिर्फ़ फैमिली फंक्शन में ही होता था।
दूरी बहुत थी —
जैसे एक #LongDistanceRelationship,
जहाँ मिलने का इंतज़ार ही सबसे बड़ी खुशी होता है।
इस बार अनुराग खुद अक्षिता को लेने आया था।
दोनों के मन में हजारों सवाल थे —
कैसे मिलना है?
कैसे बात करनी है?
पहली नज़र में क्या कहना है?
दोनों ने एक-दूसरे के लिए तोहफा भी लिया था।
अनुराग ट्रेन से आ रहा था,
और अक्षिता उसे लेने स्टेशन पहुँची।
अनुराग की ट्रेन लेट हो गई।
उधर अनुराग भी वही सब सोच रहा था —
कैसे होगा मिलना…
क्या कहूँगा…
कैसा होगा वो पल…
इन्हीं ख्यालों में ट्रेन आ गई।
जैसे ही दोनों की नज़रें मिलीं,
सारी बेचैनी एक मुस्कान में बदल गई।
अनुराग ने अक्षिता को गिफ्ट दिया,
फिर दोनों स्टेशन से बाहर चले गए।
एक अच्छे से रेस्टोरेंट में खाना खाया…
एक-दूसरे को अपने हाथों से खिलाया भी।
फिर बस पकड़ी और अपनी मंज़िल की तरफ चल पड़े।
सफर में दोनों एक-दूसरे में खो गए थे।
उनकी बातें…
उनका अलिंगन…
बालों को सहलाना…
एक-दूसरे के करीब आना…
वो मासूम सा रोमांच…
सब कुछ बहुत सुंदर था।
दोनों जानते थे
कि उनका प्यार शायद शादी तक नहीं पहुँच पाएगा…
लेकिन उस पल में,
वो पूरी दुनिया से बेखबर
सिर्फ एक-दूसरे में खोए हुए थे।धीरे-धीरे दोनों अपनी मंज़िल की तरफ पहुँच गए।
सफर खत्म हो रहा था, लेकिन साथ बिताए पल अभी भी उनके दिल में चल रहे थे।
वहाँ पहुँचकर दोनों ने साथ में नाश्ता किया।
हल्की-हल्की बातें, कभी मुस्कान, कभी खामोशी —
जैसे हर पल को यादों में बदल लेना चाहते हों।
फिर दोनों घर की तरफ चल दिए।
घर पहुँचकर दोनों अपने-अपने परिवार से मिले।
हँसी-मज़ाक हुआ, बातें हुईं,
जैसे सब कुछ सामान्य हो…
पर उनके दिलों में जो चल रहा था,
वो सिर्फ वही दोनों जानते थे।
रात को सबने साथ में खाना खाया।
साधारण सी रात थी,
पर उनके लिए बहुत खास।
खाना खाकर दोनों अपने-अपने कमरों में सोने चले गए।
नींद तो आ गई,
पर दिल अब भी उसी दिन के पलों को दोहरा रहा था…रात गहरी हो चुकी थी।
घर में सब सो चुके थे।
चारों तरफ सन्नाटा था…
पर उनके दिलों में हलचल अभी भी बाकी थी।
कमरे की खिड़की से आती हल्की चाँदनी
जैसे उन अधूरे एहसासों को और साफ़ कर रही थी।
कुछ देर बाद दोनों धीरे से मिले —
बस कुछ पल साथ बैठने के लिए।
बातें कम थीं,
पर आँखें बहुत कुछ कह रही थीं।
अनुराग ने धीरे से अक्षिता का हाथ थाम लिया।
उस स्पर्श में अपनापन था,
सालों का प्यार था,
और एक डर भी…
कि ये पल शायद बार-बार न मिलें।
अक्षिता ने सिर उसके कंधे पर रख दिया।
दोनों चुप थे,
पर उस खामोशी में भी धड़कनों की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी।
बालों को हल्के से सहलाना,
एक-दूसरे के और करीब आना,
बस इतना ही काफी था
उनके लिए उस रात को यादगार बनाने के लिए।
वो रात किसी वादे की नहीं थी,
न किसी मंज़िल की।
बस दो दिलों की थी,
जो जानते थे
कि उनका प्यार शायद मुकम्मल न हो,
पर अधूरा भी कभी कम नहीं होगा।थोड़ी देर साथ बैठने के बाद
दोनों ने एक-दूसरे को देखा…
जैसे आँखों ही आँखों में सब कह दिया हो।
रात अब और गहरी हो चुकी थी।
हवा ठंडी थी,
और दिल थोड़े शांत।
अनुराग ने धीरे से कहा,
“अब चलो… सुबह फिर मिलेंगे।”
अक्षिता ने हल्की सी मुस्कान के साथ सिर हिला दिया।
दोनों अपने-अपने कमरों में लौट गए।
बिस्तर पर लेटे तो आँखें बंद थीं,
पर यादें जाग रही थीं।
आज का दिन
उनके लिए एक खूबसूरत याद बन चुका था।
धीरे-धीरे सोचते-सोचते
दोनों को नींद आ गई…
और वो उसी एहसास के साथ सो गए
कि चाहे दुनिया कुछ भी कहे,
उनका प्यार उनके दिल में हमेशा रहेगा।रात गहरी हो चुकी थी।
घर में सब सो चुके थे।
चारों तरफ सन्नाटा था…
देर रात दोनों फिर मिले।
आज शब्द कम थे, एहसास ज्यादा।
वो साथ बैठे… फिर धीरे-धीरे एक-दूसरे के करीब आ गए।
इस बार वो खड़े नहीं थे —
बल्कि साथ लेटे थे,
चुपचाप…
अनुराग ने अक्षिता का हाथ थाम लिया।
अक्षिता ने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया।
दिल की धड़कनें तेज थीं,
पर उस पल में अजीब सा सुकून भी था।
वो एक-दूसरे के पास लेटे रहे,
बातें धीमी आवाज़ में करते हुए,
कभी हल्की मुस्कान,
कभी चुप्पी।
उस रात में कोई शोर नहीं था,
सिर्फ दो दिल थे
जो जानते थे कि उनका साथ सीमित है,
इसलिए हर पल को महसूस करना ज़रूरी है।
कुछ देर बाद
थकान और सुकून दोनों ने मिलकर
उन्हें नींद दे दी…
और वो यूँ ही एक-दूसरे के पास
शांत होकर सो गए।अगली सुबह भी दोनों साथ थे।
सुबह की हल्की धूप में कुछ आख़िरी पल चुपचाप साथ बिताए।
दोनों जानते थे कि शाम को अनुराग की ट्रेन है।
दिन जैसे-तैसे बीता।
शाम आई… और जाने का समय भी।
लेकिन अक्षिता उसे स्टेशन छोड़ने नहीं गई।
शायद इसलिए कि वो खुद को संभाल नहीं पाती…
शायद इसलिए कि विदाई का वो दृश्य देखना उसके लिए बहुत भारी था।
अनुराग चला गया।
बिना शोर, बिना किसी बड़े अलविदा के।
अक्षिता घर पर ही थी।
दिल बेचैन था।
वो रोकना चाहती थी…
कहना चाहती थी “मत जाओ”…
पर अब कहने को कुछ बचा ही नहीं था।
जब उसे पता चला कि ट्रेन चल पड़ी है,
तो उसका दिल जैसे थोड़ा और खाली हो गया।
रात को उसने घरवालों से थोड़ी बातें कीं,
सामान्य रहने की कोशिश की।
फिर अपने कमरे में जाकर लेट गई।
आज कमरा कुछ ज्यादा ही शांत था।
यादें बहुत थीं…
पर साथ नहीं।
आख़िरकार आँखे बंद हुईं,
और वो सो गई।
सुबह उठकर
वो भी अपने घर चली आई।
दूरी फिर से वही थी…
बस इस बार दिल थोड़ा और भारी था।