अध्याय 4: खामोशियाँ और कड़वा सच
ज़ोया के जाने के बाद, अज़ीम की दुकान पर सन्नाटा पसर गया। परिंदे अब भी आते थे, पर अज़ीम उन्हें दाना डालना भूल जाता। वह दिन भर दुकान के कोने में बैठा रहता, अपनी खाली हथेली को देखता जहाँ कभी ज़ोया की दी हुई चाय का प्याला होता था। उसे अपनी कड़वी बातों पर पछतावा था, पर उसकी 'खुद्दारी' उसे फोन करने या माफ़ी मांगने की इजाज़त नहीं दे रही थी। वह अंदर ही अंदर एक घुटन महसूस कर रहा था—ऐसी घुटन जो दुकान छिनने के डर से भी ज़्यादा गहरी थी।
उधर ज़ोया ने खुद को काम में झोंक दिया था। वह देर रात तक ऑफिस की फाइलें देखती, बड़ी-बड़ी मीटिंग्स करती, पर जैसे ही शोर खत्म होता, उसे अज़ीम की वो बेबसी याद आ जाती। उसे अहसास हुआ कि उसने अज़ीम को नहीं, बल्कि उस 'सुकून' को खो दिया है जो उसे उस दरिया के किनारे मिलता था।
कुछ दिनों बाद...
शाम का वक्त था। अज़ीम दुकान बढ़ाने ही वाला था कि उसे वही पुरानी खुशबू महसूस हुई। उसने सिर उठाया तो देखा ज़ोया खड़ी थी। वह पहले जैसी सजी-धजी रईस लड़की नहीं लग रही थी, उसकी आँखों के नीचे हल्के काले घेरे थे और चेहरा उतरा हुआ था।
अज़ीम कुछ कहने ही वाला था कि ज़ोया ने हाथ के इशारे से उसे रोक दिया।
ज़ोया: (बहुत धीमी आवाज़ में) "मत कहो कि मैं यहाँ क्यों आई हूँ। मैंने बहुत कोशिश की अज़ीम... मैं अपनी महंगी दुनिया में वापस चली गई थी, मैंने खुद को काम में दफना दिया था। पर मुझे वहां वो सुकून नहीं मिला जो तुम्हारी इस टूटी हुई दुकान की चाय में है।"
उसकी आवाज़ में एक अजीब सा टूटना था।
ज़ोया: "मुझे तुम्हारी डाँट मंज़ूर है, तुम्हारा गुस्सा मंज़ूर है... पर मुझे अपनी इस बनावटी दुनिया से थोड़ी देर के लिए रिहाई चाहिए। क्या मुझे फिर से यहाँ बैठने का हक मिल सकता है?"
अज़ीम की आँखों में नमी तैर गई। उसका सारा गुस्सा, सारा तनाव उस एक पल में बह गया। उसने चुपचाप वही पुरानी बेंच साफ़ की और ज़ोया के बैठने का इंतज़ार करने लगा।
अज़ीम: "साहिबा... माफ़ी तो मुझे मांगनी चाहिए थी। मैंने अपनी तकलीफ का बोझ आप पर डाल दिया। सच तो यह है कि इन पिछले कुछ दिनों में परिंदों ने भी दाना नहीं चुगा, शायद वो भी आपकी बातों का इंतज़ार कर रहे थे।"
उस शाम पहली बार उनके बीच कोई रईस और कोई गरीब नहीं था। दोनों बस दो इंसान थे जो दुनिया के शोर से थक चुके थे। अज़ीम ने फिर से चाय बनाई, और इस बार उन्होंने दुकान या नोटिस की बात नहीं की। उन्होंने बात की—बचपन की, उन सपनों की जो कहीं खो गए थे, और उन छोटी-छोटी खुशियों की जो मुफ्त में मिलती हैं।
यहीं से उनकी एक सच्ची और गहरी दोस्ती की शुरुआत हुई। एक ऐसी दोस्ती जिसमें शब्दों से ज़्यादा खामोशियों की अहमियत थी।
पूरे तीन दिन बीत चुके थे। ज़ोया ने उन तीन दिनों में खुद को हज़ारों कामों में उलझाया, मीटिंग्स अटेंड कीं, और कई बार अपने फोन को उठाकर अज़ीम का नंबर (जो उसके पास था ही नहीं) खोजने की कोशिश की। उसे अज़ीम पर गुस्सा था। उसे याद आ रहा था कि कैसे उसने उसे अपनी दुकान से जाने के लिए कह दिया था। ज़ोया खन्ना को आज तक किसी ने 'जाने' के लिए नहीं कहा था।
लेकिन चौथी शाम, ज़ोया का सब्र जवाब दे गया। शहर के शोर और घर की बनावटी रौनक से तंग आकर वह अपनी गाड़ी खुद ड्राइव करते हुए उसी दरिया के किनारे पहुँची।
गाड़ी से उतरते ही ठंडी हवा ने उसका स्वागत किया। उसने देखा, अज़ीम हमेशा की तरह अपनी छोटी सी दुकान के बाहर बैठा था, लेकिन आज उसके पास परिंदे नहीं थे। वह बस दरिया की लहरों को देख रहा था। उसका चेहरा पहले से थोड़ा उतरा हुआ था, जैसे वह भी इन तीन दिनों के सन्नाटे से थक गया हो।
ज़ोया तेज़ कदमों से उसके पास पहुँची। उसकी सैंडल की आवाज़ सुनकर अज़ीम ने सिर उठाया। उसकी आँखों में एक पल के लिए चमक आई, पर उसने फौरन अपनी नज़रें झुका लीं।
ज़ोया: (नाराज़गी भरी आवाज़ में) "तुम्हें क्या लगा था? तुम मुझे उस दिन बदतमीज़ी से जाने के लिए कहोगे और मैं कभी वापस नहीं आऊँगी? तुम्हें अंदाज़ा भी है कि तुमने मेरा कितना अपमान किया था?"
अज़ीम चुपचाप खड़ा हो गया। उसने अपनी पुरानी बेंच के कोने को अपने गमछे से साफ़ किया और ज़ोया की तरफ देखा। उसकी आवाज़ में वही पुराना ठहराव था, पर आज उसमें थोड़ी नमी भी थी।
अज़ीम: "साहिबा, अपमान करना मेरा मकसद नहीं था। मेरा मकसद सिर्फ अपनी उस 'ज़मीन' को बचाना था जिस पर मैं खड़ा हूँ। जब आप उस दिन फोन उठाकर अपने डैड से बात करने लगीं, तो मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी दुकान लकड़ियों की नहीं, कागज़ की बन गई है, जो आपकी एक सिफारिश से उड़ जाएगी। मैं अपनी गरीबी से नहीं डरता साहिबा, मैं किसी के अहसान के नीचे दबने से डरता हूँ।"
ज़ोया की आँखों में गुस्सा तो था, पर अज़ीम की बातों ने उसके दिल की कड़वाहट को कम कर दिया। वह गुस्से में ही सही, पर उसी बेंच पर बैठ गई।
ज़ोया: "तुम बहुत ज़िद्दी हो अज़ीम। लोग अपनी जान बचाने के लिए दूसरों के पैर पकड़ते हैं, और तुम मेरी मदद तक लेने को तैयार नहीं? क्या तुम्हारी इज़्ज़त उस दुकान से बड़ी है जो कल शायद यहाँ रहे भी न?"
अज़ीम मुस्कुराया—एक ऐसी मुस्कान जिसमें दर्द और सुकून दोनों थे। उसने केतली में चाय चढ़ाई और आग सुलगाते हुए बोला।
अज़ीम: "दुकान तो चली जाएगी साहिबा, पर अगर मैंने खुद को बेचना शुरू कर दिया, तो मैं इन परिंदों की आँखों में आँखें डाल कर कैसे देखूँगा? ये मेरे पास इसलिए आते हैं क्योंकि मैं आज़ाद हूँ। जिस दिन मैं किसी का कर्जदार हो गया, मेरी आज़ादी खत्म हो जाएगी।"
उसने मिट्टी के प्याले में कड़क चाय छानी और बड़े सलीके से ज़ोया की तरफ बढ़ाया। चाय की गर्माहट और इलायची की खुशबू हवा में घुल गई।
अज़ीम: "चाय पीजिये। तीन दिन से केतली बस आपके इंतज़ार में ही चढ़ रही थी।"
ज़ोया ने प्याला पकड़ा। उसकी उंगलियाँ अज़ीम की उंगलियों से छुईं। उस एक पल के स्पर्श (Touch) में जैसे बिजली सी दौड़ गई। ज़ोया ने महसूस किया कि अज़ीम का हाथ थोड़ा कांप रहा था। वह समझ गई कि अज़ीम जितना कठोर दिखने की कोशिश कर रहा था, अंदर से उतना ही टूटा हुआ था।
ज़ोया: (धीमे स्वर में) "अज़ीम... अगर वो लोग फिर से आए, तो मुझे बता देना। मैं अहसान नहीं करूँगी, मैं बस एक दोस्त की तरह खड़ी रहूँगी। क्या तुम मुझे दोस्त मान सकते हो?"
अज़ीम ने दरिया की ओर देखते हुए एक लंबी साँस ली।
अज़ीम: "दोस्ती बराबरी वालों में होती है साहिबा। आप आसमान का चाँद हैं और मैं मिट्टी का दीया।"
ज़ोया: (मुस्कुराते हुए) "तो क्या हुआ? चाँद को भी तो रात के अंधेरे में एक दीये की रोशनी अच्छी लगती है।"
अज़ीम ने पहली बार ज़ोया की आँखों में गहराई से देखा। उस शाम दरिया किनारे कोई रईसी नहीं थी, कोई गरीबी नहीं थी। वहाँ बस दो रूहें थीं जो एक-दूसरे की खामोशी को पढ़ रही थीं। ज़ोया ने चाय का आखिरी घूँट पिया और महसूस किया कि दुनिया का सारा सुख इस छोटे से मिट्टी के के प्याले में सिमट आया है।"