एपिसोड 8: गिल्ट, घाव और अनसुनी चीखें
कमरे की खामोशी ज़ोया को काटने को दौड़ रही थी। बाहर पहरा था और अंदर वह खुद के ही खयालों में कैद थी। ज़ोया ने खिड़की की उन लोहे की जालियों को छुआ जो अभी-अभी उसके पिता ने लगवाई थीं। उसे रह-रहकर अज़ीम का वह चेहरा याद आ रहा था जब बुलडोजर उसकी दुकान के सामने खड़ा था।
"यह सब मेरी वजह से हुआ..." ज़ोया ने सिसकते हुए खुद से कहा। उसे एक गहरा गिल्ट (पछतावा) खाए जा रहा था। उसे लग रहा था कि अगर वह अज़ीम की ज़िंदगी में न आती, तो आज वह अपनी छोटी सी दुकान में परिंदों के साथ खुश होता। उसकी एक दोस्ती ने अज़ीम का सब कुछ छीन लिया था—उसका सुकून, उसकी दुकान और उसकी पहचान।
उसे अपनी रईसी से नफरत होने लगी। उसे लगा कि यह ऊँचा महल दरअसल एक कत्लखाना है, जहाँ मासूमों के सपने और अपनों की खुशियाँ कुर्बान कर दी जाती हैं। "डैड ने उसे मिटा दिया और मैं यहाँ सुरक्षित बैठी हूँ? नहीं... ऐसी ज़िंदगी का क्या फायदा जो किसी की तबाही का कारण बने।"
उसका गिल्ट अब एक खतरनाक फैसले में बदल चुका था। उसने अपनी मेज़ पर रखा पेपर-कटर उठाया। उसकी चमकती हुई धार उसे अपनी तरफ खींच रही थी।
ऑफिस का मंज़र:
दूसरी तरफ, शहर के आलीशान बिजनेस सेंटर में मिस्टर खन्ना अपनी अब तक की सबसे बड़ी डील फाइनल कर रहे थे। चारों तरफ तालियों की गूँज थी। उनका फोन मेज़ पर रखा था, जिसकी स्क्रीन बार-बार जल रही थी। घर से लगातार कॉल आ रहे थे, पर मिस्टर खन्ना ने एक नज़र फोन पर डाली और उसे उल्टा रख दिया। उनके चेहरे पर एक घमंडी मुस्कान थी, उन्हें लगा कि घर वाले शायद ज़ोया की पैरवी करने के लिए फोन कर रहे होंगे।
वापस ज़ोया का कमरा:
ज़ोया ने आँखें बंद कीं और अपने हाथ की कलाई पर एक गहरा घाव कर दिया। तीखा दर्द हुआ, पर उसे अज़ीम के टूटे हुए सपनों के दर्द से कम लगा। फर्श पर सुर्ख लाल खून फैलने लगा। वह धीरे-धीरे दीवार के सहारे फर्श पर बैठ गई। उसका सफेद लिबास अब खून से भीग चुका था। उसकी चेतना धीरे-धीरे धुंधली हो रही थी।
तभी...
रात के खाने की ट्रे लेकर घर का पुराना नौकर 'काका' कमरे के पास पहुँचा। उसने दरवाज़ा खटखटाया, "बेटी, खाना खा लो।" कोई जवाब न मिलने पर उसने घबराकर अपनी चाबी से दरवाज़ा खोला।
जैसे ही दरवाज़ा खुला, काका के हाथ से ट्रे गिर गई। फर्श पर खून का दरिया बह रहा था और ज़ोया बेजान पड़ी थी।
"साहब! कोई बचाओ! ज़ोया बेटी!" काका की चीख पूरे बंगले में गूँज गई।
काका ने तुरंत मिस्टर खन्ना को फोन लगाया। एक बार, दो बार, दस बार... पर मिस्टर खन्ना ने मीटिंग के बीच में फोन उठाया ही नहीं। वह हर बार कॉल काट देते। घर के बाकी नौकर और ड्राइवर भी फोन करने लगे, पर मिस्टर खन्ना अपने 'करोड़ों के मुनाफे' की प्रेजेंटेशन में इतने अंधे थे कि उन्हें अपनी बेटी की आखिरी पुकार सुनाई नहीं दी।
बंगले में मातम और अफरा-तफरी का माहौल था, पर उस साम्राज्य का राजा अपने ऑफिस में जीत का जश्न मना रहा था, बेखबर कि उसके घर की रोशनी बुझने की कगार पर है।
ज़ारा की वापसी और रईसी का तमाशा
कमरे में ज़ोया की साँसें अब उखड़ रही थीं। पीए और सुरक्षा अधिकारी अब भी 'साहब के आदेश' की आड़ में अपनी कायरता छुपा रहे थे। काका ने जब देखा कि ज़ोया का शरीर नीला पड़ रहा है और ये लोग उसे अस्पताल ले जाने के बजाय उसकी मौत का इंतज़ार कर रहे हैं, तो उन्होंने एक आखिरी और सबसे बड़ा दांव खेला।
काका चुपके से स्टोर रूम के अंधेरे कोने में गए और कांपते हाथों से एक इंटरनेशनल नंबर डायल किया। यह नंबर 'ज़ारा' का था—ज़ोया की बड़ी बहन। ज़ारा, जो लंदन में खन्ना ग्रुप का इंटरनेशनल बिज़नेस संभालती थी। वह जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही सख्त और उसूलों की पक्की। पूरा शहर जानता था कि मिस्टर खन्ना अगर किसी से डरते हैं, तो वो उनकी बड़ी बेटी ज़ारा है। ज़ोया, ज़ारा की जान थी।
जैसे ही ज़ारा ने फोन उठाया, काका फफक पड़े, "बिटिया... ज़ोया को बचा लो! उसने अपना हाथ काट लिया है। यहाँ साहब मीटिंग के चक्कर में फोन नहीं उठा रहे और गार्ड्स उसे अस्पताल नहीं ले जाने दे रहे। वे कह रहे हैं कि खानदान की बदनामी होगी। तुम्हारी बहन मर जाएगी बिटिया!"
सात समंदर पार उठा तूफान:
ज़ारा के कानों में जैसे बिजली गिर गई। एक पल के लिए वह सुन्न हो गई, फिर उसका गुस्सा ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। उसने एक सेकंड बर्बाद किए बिना घर के सिक्योरिटी हेड के पर्सनल नंबर पर वीडियो कॉल किया।
जैसे ही सिक्योरिटी हेड ने ज़ारा मैम का नाम स्क्रीन पर देखा, उसके पसीने छूट गए। उसने कांपते हाथों से फोन उठाया।
ज़ारा की आवाज़ फोन से किसी शिकारी शेरनी की तरह कड़की— "राणा! अगर अगले पाँच मिनट के अंदर मेरी बहन अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में नहीं पहुँची, तो याद रखना, मिस्टर खन्ना तुम्हें बचाएँ या न बचाएँ, मैं तुम्हारी पुश्तें तबाह कर दूँगी! इज्जत की बात कर रहे हो? अगर ज़ोया को कुछ भी हुआ, तो मैं खुद बीबीसी और सीएनएन को बुलाकर खन्ना साम्राज्य की धज्जियाँ उड़ा दूँगी। गेट खोलो और अभी ज़ोया को बाहर निकालो! मैं पहली फ्लाइट से इंडिया के लिए निकल रही हूँ!"
महल में मची भगदड़:
ज़ारा का आदेश मिलते ही घर का मंज़र बदल गया। जो गार्ड्स रास्ता रोके खड़े थे, वे अब खुद ज़ोया को उठाकर गाड़ी की तरफ भागने लगे। ज़ारा के खौफ ने मिस्टर खन्ना के आदेशों को कागज़ की तरह फाड़ दिया था। काका ने जल्दी से ज़ोया का हाथ अपने दुपट्टे से बांधा और उसे गोद में लेकर पिछली सीट पर बैठ गए।
गाड़ी तेज़ रफ़्तार में मेंशन का गेट तोड़ती हुई बाहर निकली। टायर की चीख और सायरन की आवाज़ से पूरा इलाका दहल उठा।
ऑफिस में बवंडर की दस्तक:
इधर, मिस्टर खन्ना अपनी मीटिंग खत्म करके डील साइन कर ही रहे थे कि उनके निजी नंबर पर ज़ारा का कॉल आया। जैसे ही उन्होंने फोन कान से लगाया, ज़ारा की आवाज़ में छिपी नफरत ने उन्हें हिला दिया।
"डैड! मुबारक हो आपकी ये नई डील! लेकिन याद रखिएगा, अगर ज़ोया को कुछ हुआ, तो आप अपनी जिस 'साख' के लिए आज उसे मरने के लिए छोड़ आए थे, मैं उस पूरी दौलत को बाज़ार में नीलाम कर दूँगी! मैं एयरपोर्ट पहुँच चुकी हूँ। आप अपना जश्न मनाइये, मैं अपनी बहन के गुनहगारों का हिसाब करने आ रही हूँ!"
मिस्टर खन्ना के हाथ से उनकी कीमती कलम छूटकर गिर गई। स्याही कागज़ पर फैल गई, जैसे उनकी किस्मत पर दाग लग गया हो। उन्हें पहली बार अहसास हुआ कि उन्होंने क्या खो दिया है। वह पागलों की तरह अपनी गाड़ी की तरफ भागे, पर अब बहुत देर हो चुकी थी।
अस्पताल की ओर एक तरफ ज़ोया की एम्बुलेंस दौड़ रही थी,
दूसरी तरफ मिस्टर खन्ना की गाड़ी,