Vruksh Vaani - 3 in Hindi Spiritual Stories by Prashanth B books and stories PDF | वृक्ष वाणी : पर्यावरण सिद्धों का उदय - 3

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वृक्ष वाणी : पर्यावरण सिद्धों का उदय - 3

स्कूल की घंटी बजी। अर्जुन और किरण स्कूल के बाहर आइसक्रीम की दुकान के पास खड़े थे। शांतप्पा की दुकान—जो मलनाड में अपनी मशहूर कुल्फी के लिए जानी जाती थी।

"दो मैंगो कुल्फी," किरण ने कहा।
अर्जुन ने अपनी स्केचबुक निकाली और पेड़ की छांव में बैठकर कुछ उकेरने लगा। पिछले दो दिनों से वह बहुत चिंतित था। विक्रम की वह जिज्ञासु नज़र... उसे कितना पता चल गया था?

"ओए, क्या मैं तुम लोगों को जॉइन (Join) कर सकता हूँ?"
दोनों ने सिर उठाकर देखा। विक्रम वहां खड़ा था, एक दोस्ताना मुस्कान के साथ। उसके हाथ में बैडमिंटन रैकेट था—लगता था वह खेल कर आ रहा है।

"विक्रम भैया!" किरण ने आश्चर्य से कहा। "हाँ, बिल्कुल!"

विक्रम उनके पास बैठ गया। अर्जुन थोड़ा तनाव में था, लेकिन विक्रम का व्यवहार बहुत स्वाभाविक था। उस दिन की घटना के बारे में कोई बात नहीं हुई।

"शांतप्पा, एक बादाम कुल्फी," विक्रम ने कहा, फिर अर्जुन की ओर मुड़ा। "तुम क्या बना रहे हो?"
"वह बरगद का पेड़," अर्जुन ने धीरे से उत्तर दिया।

विक्रम ने स्केचबुक में झांका। उसकी आँखें फैल गईं। "यह... यह तो अद्भुत है, अर्जुन! देखो, पेड़ की एक-एक जड़, एक-एक पत्ता... तुम बहुत प्रतिभाशाली (Talented) हो।"
अर्जुन शर्म से मुस्कुराया। "शुक्रिया।"

"वैसे, तुम दोनों क्रिकेट खेलते हो?" विक्रम ने विषय बदलते हुए पूछा।
"किरण खेलता है। मैं उतना अच्छा नहीं खेल पाता," अर्जुन ने कहा।
"अर्जुन को खेल से ज्यादा चित्रकला में दिलचस्पी है," किरण ने जोड़ा।

तीनों कुल्फी खाते हुए स्कूल, खेल और फिल्मों के बारे में बातें करने लगे। विक्रम बहुत सहज और दोस्ताना तरीके से बात कर रहा था। उस दिन की घटना का कोई ज़िक्र नहीं था।
अर्जुन को धीरे-धीरे एहसास हुआ—विक्रम केवल एक लोकप्रिय सीनियर छात्र ही नहीं था। वह एक सच्चा और ईमानदार इंसान भी था।

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शनिवार की दोपहर। गाँव के बाहरी इलाके में नदी किनारे। यह बच्चों के तैरने और खेलने की पसंदीदा जगह थी।

तीनों लड़के पानी में कूद रहे थे, तैर रहे थे।
"देखो, मैं कितनी देर पानी के अंदर रह सकता हूँ!" किरण ने चुनौती दी।
उसने गहरी सांस ली और डुबकी लगाई। तीस सेकंड बाद वह ऊपर आया, हांफते हुए।
"अब मेरी बारी!" अर्जुन ने हंसते हुए कहा।

उन्होंने गोता लगाने की प्रतियोगिता की, पानी में खेले और नदी पर तैरते हुए बातें कीं।
"यह सचमुच बहुत शांतिपूर्ण जगह है," विक्रम ने आसमान की ओर देखते हुए कहा। "मैं इतने दिनों तक यहाँ क्यों नहीं आया?"
"हम बचपन से यहाँ आते हैं," अर्जुन ने कहा, अब वह थोड़ा सहज हो गया था।

किरण अपने सबसे अच्छे दोस्त को एक नई दोस्ती करते देख खुश था। अर्जुन आमतौर पर नए लोगों के साथ धीरे-धीरे खुलता था। लेकिन विक्रम के साथ... यह स्वाभाविक रूप से हो रहा था।

"तुम्हें पता है," विक्रम ने आगे कहा, "तुम दोनों सच्चे दोस्त हो। ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है।"
"हम पाँच साल की उम्र से साथ हैं," किरण ने कहा।
विक्रम मुस्कुराया। "अद्भुत। ऐसी दोस्ती असली दौलत है।"

अगले दिन रविवार। तीनों फिर से नदी किनारे मिले। इस बार केवल बातें करने और समय बिताने के लिए।
किरण अचानक खड़ा हो गया। "क्या हम अपना 'अड्डा' दिखाएं?"
अर्जुन थोड़ा हिचकिचाया। "वह पुराना खंडहर मंदिर?"

"खंडहर मंदिर?" विक्रम ने उत्सुकता से पूछा।
किरण ने उत्साह से कहा। "हाँ! यहाँ से करीब एक किलोमीटर दूर। प्राचीन मंदिर के अवशेष। बहुत ही शानदार जगह है।"
"हम बचपन से वहाँ जा रहे हैं," अर्जुन ने धीरे से कहा। "वह... वह हमारा अड्डा है।"

विक्रम की आँखें चमक उठीं। "क्या मैं आ सकता हूँ? मतलब, अगर वह तुम्हारी निजी जगह है तो..."
अर्जुन और किरण ने एक-दूसरे को देखा। एक मूक संवाद। फिर अर्जुन मुस्कुराया।
"हाँ, चलो। तुम अब हमारे दोस्त ही तो हो।"

वे नदी का किनारा छोड़कर जंगल के रास्ते चल पड़े। रास्ता संकरा था, दोनों ओर घनी हरियाली। पेड़ों की शाखाएं ऊपर से एक छतरी की तरह फैली थीं।

"क्या यह प्राचीन मंदिर है?" विक्रम ने चलते हुए पूछा।
"हाँ," किरण ने उत्तर दिया। "मेरे दादाजी कहते थे, यह करीब पांच सौ साल पुराना है। होयसला काल का।"
"लेकिन अब कोई पूजा नहीं करता," अर्जुन ने जोड़ा। "मंदिर ठीक हालत में नहीं है। केवल कुछ खंभे और दीवारें बची हैं।"

जैसे-जैसे वे आगे बढ़ रहे थे, अर्जुन को कुछ महसूस होने लगा। आसपास के पौधों से निकलने वाली रंगीन आभा (Aura)... वह और तीव्र हो रही थी। जैसे ही वे मंदिर के करीब पहुंचे, चमक और बढ़ गई।

"लो, आ गया," किरण फुसफुसाया।
रास्ता खुला, और उनके सामने वह दृश्य था।

प्राचीन मंदिर के अवशेष। पत्थर के खंभे, जो हरी काई से ढके थे। टूटी दीवारों के बीच से पीपल के पेड़ उग आए थे, उनकी जड़ें पत्थरों को जकड़े हुए थीं। सूर्य की किरणें पेड़ों के बीच से छनकर आ रही थीं, जिससे पूरी जगह एक जादुई रोशनी में नहाई हुई लग रही थी।

लेकिन अर्जुन के लिए... उसे कुछ और ही दिख रहा था।
पूरी जगह विभिन्न रंगों की आभा से सराबोर थी। हरा, नीला, बैंगनी, सुनहरा... हर पौधा, हर पेड़, हर लता अपनी रोशनी से चमक रही थी। यह इतना तीव्र था जितना उसने पहले कभी नहीं देखा था।
उसने अपनी सांस रोक ली।

"अद्भुत है, है न?" किरण ने कहा, विक्रम की प्रतिक्रिया का इंतज़ार करते हुए।
विक्रम धीरे-धीरे आगे बढ़ा, उसकी नज़रें चारों ओर घूम रही थीं। "यह... यह अविश्वसनीय रूप से सुंदर है," वह फुसफुसाया। "यहाँ इतिहास महसूस होता है। शांति महसूस होती है।"

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शाम का समय। तीनों पुराने मंदिर के बीच में बैठे थे। सूरज पश्चिम में ढल रहा था, और पेड़ों के बीच से रोशनी छन रही थी।

किरण एक पुराने पत्थर पर लेटा हुआ था, आंखें बंद करके आराम कर रहा था। अर्जुन अपनी स्केचबुक में कुछ बना रहा था। विक्रम इधर-उधर घूम रहा था, पौधों और पत्थरों को ध्यान से देख रहा था।
अड्डे में शांति छाई थी...

फिर विक्रम वापस आया और अर्जुन के पास बैठ गया।
"अर्जुन," उसने धीरे से कहा। "मुझे तुमसे कुछ पूछना है।"
अर्जुन का हाथ रुक गया। उसने विक्रम की ओर देखा, थोड़ी घबराहट के साथ। "क्या?"

विक्रम ने अपना चश्मा ठीक किया। "उस दिन... वह पानी जो तुमने मुझे दिया था। उसके बारे में।"
अर्जुन तनाव में आ गया। उसने अपनी स्केचबुक बंद कर दी।
किरण ने आंखें खोलीं और उत्सुकता से उठकर बैठ गया। "पानी के बारे में क्या?"

विक्रम ने अपनी आवाज़ कोमल रखी। "मैं तुम पर कोई आरोप नहीं लगा रहा, अर्जुन। मुझे बस... जानना है।"
"क्या जानना है?" अर्जुन ने थोड़ी घबराहट से पूछा।
"तुम्हें ठीक-ठीक पता था, है न?" विक्रम ने कहा। "कि मुझे क्या चाहिए। मुझे पता है कि वह कोई संयोग नहीं था।"

विक्रम अर्जुन की ओर देखता रहा। "उस पानी में कुछ अलग था। कुछ ऐसा जिसने मेरी मदद की, जो साधारण पानी नहीं कर सकता था।"

अर्जुन ने कहा, "मुझे समझ नहीं आ रहा," लेकिन उसकी आवाज़ में बेचैनी थी।

विक्रम थोड़ा आगे झुका। उसकी आवाज़ में जिज्ञासा थी। "अर्जुन, मैंने नोटिस किया है। तुम जिस तरह से पौधों को देखते हो... वह बाकी सबसे अलग है। तुम्हारे चित्रों में भी वह दिखता है।"
"मेरे चित्रों में?" अर्जुन ने आश्चर्य से पूछा।

"हाँ," विक्रम ने अर्जुन की स्केचबुक की ओर इशारा किया। "जब तुम पौधों को बनाते हो... उनमें कुछ खास लगता है। हर पत्ता, हर जड़... तुम उन्हें केवल देख नहीं रहे हो। तुम उन्हें समझ रहे हो।"

अर्जुन ने सिर झुका लिया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहे।
"और उस दिन," विक्रम ने जारी रखा, "जब मुझे अस्थमा अटैक आया था... तुम्हें ठीक-ठीक पता था कि क्या करना है। कौन सा पौधा, कौन सी पत्तियां। यह कैसे संभव है?"

किरण अब पूरी तरह ध्यान से सुन रहा था। "अर्जुन, यह क्या चक्कर है?"

अर्जुन ने अपनी स्केचबुक को कसकर पकड़ लिया। उसका मन उलझन में था। विक्रम... वह अब दोस्त था। लेकिन यह रहस्य... अगर बता दिया तो क्या होगा?

"मैंने... मैंने बस मदद करने की सोची," उसने धीरे से कहा।
"अर्जुन," विक्रम उसकी ओर मुड़ा। "मैं तुम्हारा दोस्त हूँ। तुम मुझे बता सकते हो। मैं कुछ गलत नहीं सोचूंगा। मुझे बहुत जिज्ञासा है।"

कुछ पल की खामोशी...
अर्जुन ने आसमान की ओर देखा। शाम की रोशनी धीरे-धीरे कम हो रही थी। आसपास के पौधों की आभा टिमटिमा रही थी।

"कभी-कभी," उसने अंत में कहा, उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, "मैं पौधों को, दुनिया को, अलग तरह से देखता हूँ।"
"अर्जुन?" किरण चिंतित हो गया।
"खासकर पौधों के आसपास," अर्जुन ने आगे कहा। "वे... वे बाकियों को दिखने की तुलना में कहीं अधिक जीवंत दिखते हैं।"

विक्रम की आँखें फैल गईं, दिलचस्पी के साथ। "किस तरह की चीजें?"
अर्जुन ने अपने हाथों को देखा। "मैं ठीक से समझा नहीं सकता। ऐसा लगता है जैसे... जैसे वे कभी-कभी चमकते हैं।"

"चमकते हैं?" किरण ने आश्चर्य से पूछा।
"नहीं, साधारण रोशनी नहीं," अर्जुन ने कहा। "एक अलग तरह की रोशनी। विभिन्न रंगों की आभा। ऐसी रोशनी जो किसी और को नहीं दिखती।"

"और जब मैं बीमार था?" विक्रम ने धीरे से पूछा।
अर्जुन ने गहरी सांस ली। "कुछ... कुछ ने मुझे बताया। कि कौन सा पौधा इस्तेमाल करना है। कौन सी पत्तियां। मुझे कैसे पता चला, यह मुझे खुद समझ नहीं आ रहा।"

"तूने मुझे यह कभी नहीं बताया!" किरण ने आश्चर्य और थोड़े दुख के साथ कहा।
अर्जुन ने अपने सबसे अच्छे दोस्त की ओर देखा। "क्या तू यकीन करता?"
किरण ने मुंह खोला, लेकिन कुछ नहीं कहा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहे।

विक्रम ने धीरे से कहा। "मैं यकीन करता हूँ, अर्जुन। मैंने उसे महसूस किया है। तुम्हारी मदद को महसूस किया है। वह किसी चमत्कार जैसा था।"

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शाम ढल रही थी। तीनों पुराने मंदिर से निकले और गाँव की ओर चल पड़े।
किरण चुप था, अपने दोस्त के बारे में अभी-अभी जानी बातों को पचाने की कोशिश कर रहा था। अर्जुन ज़मीन देखते हुए चल रहा था, चिंतित।
विक्रम उनके बगल में चल रहा था, लेकिन उसका दिमाग कहीं और था। अर्जुन की बातें... पौधों के चारों ओर रोशनी दिखना... किसी का कुछ बताना...

"अर्जुन," विक्रम ने धीरे से कहा। "मुझसे साझा करने के लिए शुक्रिया।"
अर्जुन ने उसकी ओर देखा। "तुम मुझे पागल तो नहीं समझ रहे न?"
"नहीं," विक्रम ने सिर हिलाया। "मैं ऐसा नहीं सोच रहा। मुझे लगता है... इस दुनिया में ऐसी बहुत सी विशाल चीजें हैं जो हमें समझ नहीं आतीं।"

वे गाँव के मुख्य रास्ते पर आ गए। वहां से उनके रास्ते अलग होने थे।
"कल स्कूल में मिलते हैं," किरण ने कहा, अभी भी थोड़ी उलझन में।
"हाँ," अर्जुन ने धीरे से उत्तर दिया।
विक्रम अपने घर की ओर बढ़ा, लेकिन उसका मन विचारों से भरा था।

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विक्रम अपने कमरे में आया। उसने अपना बैग फेंका और खिड़की के पास खड़ा हो गया। बाहर शाम का अंधेरा छा रहा था।
वह कमरे में इधर-उधर टहलने लगा। अर्जुन की बातें उसके दिमाग में गूंज रही थीं।
"पौधे चमकते हैं... विभिन्न रंगों की आभा... किसी ने मुझे बताया..."

उसने अपनी मेज पर रखी किताबों को देखा। औषधीय पौधों पर किताबें। प्राचीन ज्ञान पर। लेकिन किसी में भी ऐसी बात नहीं थी।
"कोई न कोई स्पष्टीकरण (Explanation) तो होना चाहिए," वह अपने आप बड़बड़ाया। "कुछ न कुछ पुरानी विरासत में होना चाहिए।"

वह अचानक रुका।
उसके परदादा का संग्रह!

उसके परदादा—उस समय के विद्वान थे। वे प्राचीन ग्रंथों और ताड़पत्र (Palm leaf) की पांडुलिपियों का संग्रह करते थे। उनके पास पारंपरिक ज्ञान का खजाना था।
वे सारी किताबें अब अटारी (Attic) में थीं!

विक्रम अपने कमरे से बाहर आया। घर में सब नीचे थे—पापा टीवी देख रहे थे, माँ रसोई में थीं।
उसने सीढ़ियों के अंत में बना छोटा दरवाजा खोला। अटारी की ओर जाने वाली संकरी सीढ़ियां। वह सावधानी से ऊपर चढ़ा।

अटारी में अंधेरा और धूल थी। बत्ती जलाने पर पुराने बक्से, कंबल और कोने में—एक बड़ा लकड़ी का संदूक दिखाई दिया। परदादा की किताबों का संदूक।

विक्रम संदूक के पास घुटनों के बल बैठ गया। उसे खोलते ही पुराने कागज की गंध आई। अंदर ताड़पत्र की पांडुलिपियां, पुरानी कन्नड़ और संस्कृत की किताबें थीं।
उसने सावधानी से एक-एक किताब निकालकर देखना शुरू किया।

"आयुर्वेद संग्रह" — नहीं, यह नहीं।
"वृक्ष आयुर्वेद" — यह पेड़ों की सेहत के बारे में है, इंसानों की नहीं।
"प्राचीन औषध पद्धति" — यहाँ भी वैसी कोई बात नहीं।

वह संदूक के तल में रखी किताबों की ओर गया। पुरानी ताड़पत्र की पांडुलिपियां, जो सबसे प्राचीन थीं।
तभी उसका हाथ एक विशेष बंडल पर पड़ा।

यह अजीब था। उस ताड़पत्र की किताब को छूते ही, विक्रम को कुछ महसूस हुआ। एक गर्माहट। जैसे कोई चीज़ उसे बुला रही हो।
उसने सावधानी से उस किताब को बाहर निकाला। पुराने ताड़ के पत्ते, धागे से बंधे हुए थे। ऊपर के पत्ते पर प्राचीन कन्नड़ और संस्कृत लिपि थी।

उसने रोशनी के नीचे लाकर उसे पढ़ने की कोशिश की।

"वनस्पति विद्या"

उसकी धड़कन तेज हो गई...
ताड़पत्र की वह किताब चमक रही थी...