Death Knocks: A New Terror on Every Page. - 27 in Hindi Horror Stories by kajal jha books and stories PDF | मौत की दस्तक: हर पन्ने पर एक नई दहशत। - 27

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मौत की दस्तक: हर पन्ने पर एक नई दहशत। - 27

धनबाद की भूतिया हवेली धनबाद के पास एक सुनसान इलाके में खंडहर हवेली खड़ी थी, जिसे गाँव वाले 'भूतिया हवेली' कहते थे। यह कहानी अजय नामक युवा फोटोग्राफर के इर्द-गिर्द घूमती है, जो रोमांच की तलाश में इस रहस्य को सुलझाता है। �हवेली का भयावह इतिहासधनबाद जिले के टंडवा ब्लॉक में बसे इस गाँव में पुरानी हवेली 50 साल से वीरान पड़ी थी। 1970 के दशक में यहाँ ठाकुर परिवार रहता था। मालकिन सुनीता देवी एक सुंदर, धनी विधवा थीं, जिनकी संपत्ति पर उनका दूसरा पति रघुनाथ ठाकुर की नजर थी। गाँव वाले बताते हैं कि रघुनाथ ने संपत्ति हड़पने के लिए सुनीता को धीमा ज़हर दिया। �
उनकी 8 साल की बेटी छोटी को भी गायब कर दिया गया। रातों में हवेली से सिसकियाँ, कदमों की थपथपाहट और घुंघरुओं की आवाज़ें आतीं। कोई साहसी रात न गुज़ारता, क्योंकि कई लोग अंदर घुसकर लौटे ही न। चाय की दुकानों पर कहानियाँ गूँजतीं— "भूतिया औरत संपत्ति का बदला लेती है।" �
स्थानीय लोककथाओं में ऐसी हवेलियाँ आम हैं, जहाँ अन्यायग्रस्त आत्माएँ भटकतीं। �अजय का धनबाद आगमनअजय, 28 साल का फ्रीलांस फोटोग्राफर, दिल्ली से धनबाद कोयला खदानों की तस्वीरें खींचने आया था। उसे भूत-प्रेत की कहानियाँ रोमांचित करतीं। होटल में चेक-इन करते ही स्थानीय चायवाले रामू काका ने सुनाया, "बाबू, भूतिया हवेली मत जाना। सुनीता जी की आत्मा भटकती है। उनके पति ने मार डाला, बेटी को भी।" �
अजय हँसा, "काका, ये सब अंधविश्वास है। मैं फोटो खींचूँगा, वायरल कर दूँगा।" उसके दोस्तों से शर्त लगी—रात गुज़ारो तो 50 हजार। उसने कैमरा, DSLR, टॉर्च, रिकॉर्डर और बैग पैक किया। शाम 6 बजे बाइक पर निकला। रास्ते में जंगल गहरा, कौवों की काँव-काँव। हवेली नज़र आई—काली दीवारें, टूटे झरोखे। �हवेली में प्रवेश और पहला डरजंग लगे दरवाजे धकेलने पर चरमराए। अंदर धूल का तूफान, मकड़ी के जाले, पुराने फर्नीचर पर सफेद चादरें। हवा ठंडी, जैसे फ्रिज से आई। अजय ने पहली मंजिल पर कदम रखा। फर्श चरचराया। अचानक दाहिने कमरे से सिसकी— "बचाओ... मुझे मार दिया..."
दिल धक-धकाया। दरवाजा खोला—खाली कमरा, बीच में बड़ा आईना। आईने में उसकी परछाईं के पीछे सफेद साड़ी वाली औरत, पीला चेहरा, खाली आँखें। अजय पलटा, कोई न। कैमरा क्लिक—फोटो में साया साफ। "ये ट्रिक लाइट की होगी," खुद को समझाया। लेकिन पसीना ठंडा हो गया। आगे बढ़ा। �ऊपरी मंजिल का रहस्यरात 10 बजे ऊपरी मंजिल। लकड़ी की सीढ़ियाँ चरमराईं, जैसे कोई ऊपर भाग रहा। एक कमरे में पुराना लोहे का ट्रंक खुला। अंदर पीली चिट्ठियाँ—सुनीता के handwriting में। "रघुनाथ ने मेरी संपत्ति के लालच में ज़हर दिया। छोटी को जंगल में मार डाला। न्याय दो, वरना भटकूँगी।" तारीख: 1975।
अचानक लाइटें झिलमिलाईं—भले ही बिजली कट 20 साल से। ठंडी हवा चली। सुनीता प्रकट हुई—खून से सना कपड़ा, नाखून लंबे, आँखें काली। "तुम मेरी मदद करोगे?" अजय भागा, लेकिन दरवाजे बंद। चीखी, "सच बताओ दुनिया को!" अचानक विज़न: सुनीता का विवाह, रघुनाथ का विश्वासघात, ज़हर वाली रात, छोटी की चीखें। हवेली गूँजी चीखों से। �भयानक सामना और फ्लैशबैकसुनीता ने गला पकड़ लिया। स्पर्श से हड्डियाँ जम गईं। "मेरी बेटी कहाँ है?" बार-बार पूछा। अजय ने ट्रंक से छोटा लॉकेट निकाला—छोटी का फोटो, पीछे "माँ को न्याय दो"। सुनीता रोई, "अब मुक्ति मिलेगी।" लेकिन बदला अधूरा। हवेली हिली, छत से पत्थर गिरे। दीवारें दरकने लगीं।
फ्लैशबैक में दिखा: रघुनाथ ने छोटी को गला दबाकर मारा, लॉकेट हवेली में छिपाया। पुलिस ने रिश्वत से केस दबाया। अजय चीखा, "मैं सच बाहर लाऊँगा!" सुनीता हँसी, "पहले तुम्हें आज़माओ।" कमरे में आग लगी, लेकिन बिना वजह। कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आई। �गाँव वालों का आगमनबाहर गाँव के मुखिया हरि चाचा और 10-12 आदमी। अजय के दोस्त ने बताया था। दरवाजा तोड़ा। सबने सुनीता को देखा—हवा में लटकी। मुखिया काँपते हुए बोला, "सच है। रघुनाथ ने कत्ल किया। मैंने केस फाइल किया था, लेकिन पैसे से दबा दिया। छोटी का शव जंगल में मिला था।" सुनीता मुस्कुराई, लॉकेट हाथ में लिया, हवा में घुल गई। लॉकेट चमका, हवेली शांत। �नया सवेरा और विरासतसुबह अजय बाहर निकला, थकान से चूर। पुलिस आई, पुराने केस खोदा। रघुनाथ के वंशज भागे। गाँव वालों ने हवेली को मंदिर बना दिया—सुनीता माँ के रूप में। अजय की फोटो और वीडियो वायरल हुए—सच की गवाही। सोशल मीडिया पर लाखों व्यूज़। लेकिन रात में कभी-कभी सिसकियाँ सुनाई देतीं, याद दिलाते—अन्याय कभी मरता नहीं। �