Monalisa Smile - 2 in Hindi Horror Stories by Sanjay Kamble books and stories PDF | Monalisa Smile - 2

Featured Books
Categories
Share

Monalisa Smile - 2

Monalisa smile part 2


रात का सन्नाटा पूरे मानसिक अस्पताल पर गहरा चुका था। बारिश की तेज़ बौछारें खिड़कियों से टकराकर डरावनी ध्वनि पैदा कर रही थीं, और हर कुछ मिनटों में कड़कती बिजली की सफेद चमक, गलियारों की परछाइयों को अस्थिर कर रही थी।

सुनीता, अस्पताल की नाइट शिफ्ट कर्मचारी, अपने रूटीन चक्कर पर थी। अंधेरे गलियारों में जलती-मिटती ट्यूबलाइट की झपकती रोशनी माहौल को और भी भयावह बना रही थी। कुछ मरीज गहरी नींद में थे, तो कुछ बड़बड़ाते हुए अपने बिस्तरों पर बैठे झूल रहे थे। दूर किसी कोने में एक बूढ़ी महिला धीमी आवाज़ में कुछ मंत्र बुदबुदा रही थी, जैसे किसी अदृश्य शक्ति से संवाद कर रही हो।

सुनीता के कदम धीरे-धीरे वार्ड के अंतिम छोर पर स्थित कमरा नंबर 313 के करीब पहुँचे। उसके भीतर अजीब-सी घबराहट थी, मगर उसने खुद को संयत रखा।

दरवाजे के ऊपर बने छोटे होल से भीतर झाँकते ही उसका कलेजा काँप गया।

बेड पर वही लड़की पड़ी थी, जिसका कुछ घंटों पहले ही शॉक ट्रीटमेंट हुआ था। लेकिन...

उसकी आँखें अब भी खुली थीं।

सीधे छत की ओर टकटकी लगाए।

कोई पलक झपकना नहीं। कोई हलचल नहीं। कोई सांस नहीं।

सुनीता का गला सूखने लगा। उसने खुद को तसल्ली देने के लिए एक गहरी सांस ली और सोचने लगी—शायद यह सिर्फ संयोग हो। शायद वह सोते हुए भी आँखें खुली रखती हो, जैसा कि कई मानसिक रोगियों के साथ होता है।

लेकिन फिर भी... कुछ अजीब था।

कमरे के भीतर घुप अंधेरा था। रोशनी बस बाहर गलियारे की हल्की ट्यूबलाइट से छनकर आ रही थी, जिससे लड़की का चेहरा और भी सफेद और भयावह लग रहा था।

सुनीता ने हिम्मत जुटाकर दरवाजे का लॉक खोला और धीरे-धीरे अंदर कदम रखा।

कमरे में घुसते ही एक अजीब-सी ठंडक महसूस हुई। खिड़कियाँ बंद थीं, फिर भी हवा में एक अजीब-सा भारीपन था, जैसे कोई अनदेखी ताकत वहाँ मौजूद हो।

लड़की अब भी वैसी ही थी—

बिल्कुल जड़, बिल्कुल निर्जीव।

सुनीता ने धीरे-धीरे कदम बढ़ाए और बेड के करीब जाकर उसके चेहरे को ध्यान से देखा।

उसकी पुतलियाँ जमी हुई थीं। उसकी त्वचा सफेद और नीलापन लिए हुए थी, जैसे सारा खून खिंचकर कहीं और चला गया हो।सुनीता की धड़कन तेज़ हो गई। उसने हल्के काँपते हाथों से लड़की के कंधे को हिलाया

कोई हलचल नहीं।

उसने और ज़ोर से हिलाया—

फिर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं।

अब उसका गला पूरी तरह सूख चुका था। उसने अपनी दो उंगलियाँ लड़की की नाक के पास रखीं।

कोई सांस नहीं।

अब वह कांपने लगी थी। उसने जल्दी से लडकी की कलाई थामी, उसकी नब्ज टटोलने लगी।

कुछ नहीं।

कोई स्पंदन नहीं। कोई हलचल नहीं।

वो मर चुकी थी!

सुनीता ने घबराकर हाथ पीछे खींच लिया। उसकी हथेली ठंडी हो गई थी, जैसे लड़की के मृत शरीर की ठंडक ने उसकी त्वचा को भी छू लिया हो।

उसने कांपते हाथों से मोबाइल निकाला और डॉक्टर शर्मा का नंबर डायल किया।

घंटी बजी।

"हेलो..."

डॉक्टर शर्मा की भारी, नींद से भरी आवाज़ सुनाई दी।

"ड... डॉक्टर!" सुनीता की आवाज़ थरथरा रही थी। "वो... वो पेशेंट... जिसकी आज शॉक ट्रीटमेंट हुआ था... वो..."

"क्या हुआ?"

"वो... वो मर चुकी है!"

लाइन के दूसरी तरफ कुछ सेकंड के लिए सन्नाटा छा गया।

फिर...

"क्या बकवास कर रही हो ? वो अभी कुछ घंटे पहले तो ठीक थी!"

"नहीं सर! उसकी सांसें बंद हो चुकी हैं। शरीर ठंडा पड़ चुका है। 

" ठीक है, मैं आ रहा हूं।"

कहते हुए डॉक्टर ने फोन रख दिया।

 सुनीता ने फोन कट कर पीछे मुड़कर बेड की ओर देखा। लड़की अब भी उसी अवस्था में थी। लेकिन अब कुछ बदल चुका था...उसकी आँखें अब छत की बजाय...सीधे सुनीता की ओर देख रही थीं। और यह देख फोन सुनीता के हाथ से गिर पड़ा।



*****



रात के 1:30 बज चुके थे। आसमान से बरसती मूसलाधार बारिश, टीन की छतों पर पड़ती बूँदों की बेमियादी थपथप, और रह-रहकर गूँजती कड़कती बिजली—पूरा शहर गहरी नींद में डूबा था। लेकिन इस रात की निस्तब्धता के बीच एक अनदेखा भय छिपा था।

डॉक्टर शर्मा की कार की हेडलाइट्स बारिश की धार को चीर रही थीं। वाइपर लगातार सामने का दृश्य साफ़ कर रहे थे, मगर उनके भीतर की बेचैनी इतनी तीव्र थी कि उन्हें रास्ता धुंधला लग रहा था। सड़कें सुनसान थीं। पूरा शहर सो रहा था, लेकिन एक जगह ऐसी थी जो कभी नहीं सोती। मेंटल असायलम।

जैसे ही डॉक्टर शर्मा असाइलम के पास पहुँचे, वहाँ की पुरानी, भुतहा-सी इमारत अंधेरे में डूबी नज़र आई। सड़क किनारे लगे लैंपपोस्ट्स की हल्की पीली रोशनी में वह जगह और भी डरावनी लग रही थी। भारी लोहे के गेट को जकड़ती बेलें, टूटी-फूटी दीवारें और चारों ओर पसरा भयानक सन्नाटा—सब कुछ जैसे किसी डरावनी कहानी का हिस्सा हो।

डॉक्टर ने गाड़ी रोकी।

गेट के पास तीन लोग खड़े थे—दो पुरुष कर्मचारी और एक महिला नर्स, सुनीता। उनके चेहरे पर गहरी दहशत थी। डॉक्टर तेज़ी से कार से उतरे और उनकी ओर बढ़े।

महिला नर्स काँपती आवाज़ में बोली—

"डॉक्टर साहब… मोनालिसा... उसने शायद ट्रीटमेंट बर्दाश्त नहीं किया। उसकी साँसें... बंद हो चुकी हैं।"

डॉक्टर ने गहरी साँस ली, अपनी भीगी जैकेट झटकी और दोनों पुरुष कर्मचारियों को इशारा किया—

"हमें खुद देखना होगा।"

मेंटल असाइलम का लंबा, सुनसान गलियारा अजीब सन्नाटे में डूबा था। दीवारों पर जगह-जगह नमी के गहरे धब्बे थे, और हवा में ब्लीच और पुरानी दवाइयों की तीखी गंध घुली हुई थी। हर कदम के साथ जूतों की चिर्र-चिर्र की आवाज़ गूँज रही थी, मानो किसी अदृश्य चीज़ को जगा रही हो।

जब वे कमरा नंबर 13 के पास पहुँचे, तो दरवाजे के बाहर जलता बल्ब हल्के-हल्के टिमटिमा रहा था।

महिला नर्स सुनीता एकाएक रुक गई। उसकी आँखों में भय तैर रहा था।

"मैं... मैं अंदर नहीं जाऊँगी..." उसने धीमे स्वर में कहा।

डॉक्टर ने उसकी ओर तीखी नज़र डाली और बिना कुछ कहे दरवाजे का हैंडल घुमा दिया।

दरवाजे के खुलते ही अंदर से बर्फीली ठंडक का एक झोंका बाहर निकला।

मोनालिसा की लाश ठंडी फ़र्श पर पड़ी थी।

कमरे में अजीब-सी नमी और सड़ांध भरी गंध थी। कहीं से पानी टपकने की धीमी आवाज़ भी आ रही थी।

डॉक्टर धीरे-से आगे बढ़े, मोनालिसा की निर्जीव देह के पास घुटनों के बल बैठ गए और उसकी नब्ज़ टटोलने लगे। कुछ पल बाद उन्होंने गहरी साँस ली और उठते हुए कहा—

"मर चुकी है..."

डॉक्टर ने दोनों कर्मचारियों को इशारा किया और हल्के स्वर में कहा—

"इसका सिर दीवार पर दे मारो। लोगों को लगे कि इसने पागलपन में अपना सर दीवार पर पटक दिया है।"

कर्मचारी एक-दूसरे को देखने लगे।

डॉक्टर दोबारा कहा—

"मैं जा रहा हूँ। कोई दिक्कत हो तो फोन करना।"

डॉक्टर उसे कमरे से निकले और अपने कार की तरफ जाते हुए उन्होंने जब से मोबाइल निकला। एक नंबर डायल करते हुए उन्होंने फोन लगाया । एक ही रिंग में सामने वाले इंसान ने फोन रिसीव किया। डॉक्टर ने मजाकिया अंदाज में कहां।

" क्या बात है ? लगता है मेरा फोन आने वाला है यह तुम्हें पहले से ही पता था !"



"अपनी बकवास छोड़ो और काम की बात करो."



" काम हो गया है, मेरे पैसे भेज देना।"



और डॉक्टर की कार उस घनघोर बारिश में सड़क पर दौडने लगे।