Waah kya Thappad hai - 1 in Hindi Love Stories by Std Maurya books and stories PDF | वाह! क्या थप्पड़ हैं - 1

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वाह! क्या थप्पड़ हैं - 1

लेखक -एसटीडी मौर्य ✍️

दूरभाष +917648959825

कटनी मध्य प्रदेश (भारत )

एक बार मैं ट्रेन से सफर कर रहा था। कानों में लीड (Earphones) लगाए मैं गानों की धुन में मग्न था। मेरी आँखें बंद थीं और मैं मजे में गुनगुना रहा था। ट्रेन एक स्टेशन पर रुकी और वहाँ से एक लड़की आई, जो मेरे बगल वाली सीट पर आकर बैठ गई।

मैं अपनी ही धुन में पागलपन कर रहा था कि तभी उसने मुझे टोका। मेरी आँखें खुलीं, मैं हड़बड़ा कर चारों तरफ देखने लगा कि मुझे कौन बुला रहा है। तभी मेरी नजर उस सुंदर सी लड़की पर पड़ी। उसे देखते ही मैं जैसे कहीं खो गया। वह मुझसे कह रही थी, “तुम ये क्या कर रहे हो? शांति से बैठ नहीं सकते? क्या मन ही मन गुनगुनाए जा रहे हो?”

मैं फिर भी उसकी आँखों में खोया रहा। मेरी इस हरकत पर उसने मुझे ‘पागल’ कहा और मेरे गाल पर हल्की सी थपकी मारते हुए बोली, “कहाँ खो गए हो?” उसके मारते ही मैं जैसे सपने से बाहर आ गया।

मैं सोचने लगा कि इसने मुझे क्यों मारा? फिर क्या था, मैं उससे लड़ने लगा, “तुमने मुझे क्यों मारा? तुम पागल हो क्या? एक अनजान लड़के पर हाथ उठा दिया, तुम्हारे घर वालों ने संस्कार नहीं सिखाए?”

तभी पास बैठे कुछ लोग मुझे ही समझाने लगे, “अरे भाई! इस लड़की का दोष नहीं है। तुम इसे एकटक देखे जा रहे थे, इसलिए उसने तुम्हें जगाने के लिए मारा है।” फिर भी मैं अपनी बात पर अड़ा रहा, “तुमने मुझे मारा तो यह भी नहीं सोचा कि मुझे चोट लगी होगी या नहीं?”

लड़की बोली, “अरे! मैंने तो बस धीरे से ही मारा है, तुम इतना क्यों चिल्ला रहे हो?” इसी तरह कुछ मिनटों तक हमारे बीच बहस होती रही।

फिर मैंने उस लड़की से पूछा, “तुम कहाँ जा रही हो?”

वह बताने लगी कि वह घर से भाग आई है। उसने कहा, “मेरे घर वाले मेरी पसंद के खिलाफ एक ऐसे लड़के से मेरी शादी करा रहे हैं, जिसे मैं पसंद नहीं करती।”

मैंने कहा, “अच्छा, यह बात है।” फिर मैंने पूछा, “क्या तुम किसी और लड़के को पसंद करती हो?”

उसने जवाब दिया, “नहीं जी! ऐसा कुछ नहीं है। बस मैं लव मैरिज करना चाहती हूँ और वह भी दूसरे समाज (Inter-caste) में। मैं चाहती हूँ कि लड़के के पास भले ही सरकारी नौकरी न हो, लेकिन उसका दिल साफ होना चाहिए।”

मैंने हैरान होकर पूछा, “पर तुम ऐसा क्यों करना चाहती हो?”

लड़की ने बड़े विश्वास से कहा, “मेरी इच्छा है कि मैं दूसरे समाज में शादी करूँ, जो अरेंज मैरिज में मुमकिन नहीं है और न ही घर वाले राजी होंगे।”

मैंने कहा, “यह बात तो सच है, घर वालों को पता चला तो वे कभी राजी नहीं होंगे। तो क्या तुम भागकर शादी करोगी?”

लड़की बोली, “हाँ जी, बिल्कुल! भागकर शादी कर लेंगे, फिर कुछ साल बीत जाने पर घर जाएंगे और उन्हें मना लेंगे। शादी के बाद तो वे मान ही जाएंगे।”

मैंने उससे पूछा, “अगर कोई लड़का भागने को तैयार ही न हो तो? या तुम्हें अभी तक कोई लड़का मिला ही नहीं है, तो फिर लव मैरिज कैसे होगी?”

वह बोली, “अरे! लड़के तो बहुत हैं। मैं अपनी इंस्टा आईडी बनाऊँगी, अपनी डीपी (DP) लगाऊँगी तो लड़के खुद मैसेज करेंगे। जो लड़का पसंद आएगा, उससे बात करके शादी कर लूँगी।”

मैंने कहा, “ऐसा करने में तो तुम्हें बहुत समय लगेगा।”

वह बोली, “समय तो लगेगा, लेकिन शादी तो मेरी पसंद से ही होगी।”

मैंने दोबारा उससे वही सवाल पूछा, “पर तुम दूसरे समाज में ही शादी क्यों करना चाहती हो?”

उसने बड़ी गंभीरता से जवाब दिया, “मैं चाहती हूँ कि मैं दूसरे समाज में शादी करूँ ताकि मुझे देखकर दूसरी लड़कियाँ भी प्रेरित हों। इससे समाज में जाति-धर्म के नाम पर फैली नफरत खत्म होगी और लोग एक-दूसरे के समाज में जुड़ने लगेंगे।”

मैंने कहा, “यह बात तो बड़ी है! पर क्या इसके लिए कोई और रास्ता नहीं है जो...”

लड़की बोली, “नहीं जी! इसके अलावा कोई रास्ता नहीं। मैं बहुत सोच-समझकर घर से आई हूँ।”

मैंने कहा, “ठीक है! यह तो बताओ कि तुम कहाँ जा रही हो और कहाँ रहोगी?”

लड़की बोली, “मेरी एक सहेली दिल्ली में रहती है। मैं भी वहीं जाऊँगी, कुछ दिन अपनी सहेली के घर पर रहूँगी। और आप कहाँ जा रहे हैं? और आप क्या करते हैं?”

मैंने कहा, “मैं भी दिल्ली जा रहा हूँ काम की तलाश में। और मैं एक लेखक हूँ, जो छोटी-छोटी कविताएँ लिखता है।”

“लेकिन हम सब बातें कर रहे हैं, किन्तु अभी तक एक-दूसरे के नाम भी नहीं जाने। क्या तुम्हारा नाम जान सकता हूँ?”

लड़की बोली, “अच्छा! क्यों नहीं। आप मेरा नाम जान सकते हैं। मेरा नाम अंशिका है। और आपका नाम मैं जान सकती हूँ?”

मैंने कहा, “ज़रूर! मेरा नाम एसटीडी है, जो सबसे ज़्यादा प्रचलित है।”

लड़की बोली, “जी, आपका नाम बहुत ही रोचक है।”

मैंने कहा, “ज़रूर।”

लड़की बोली, “क्या आप अपना नंबर दे सकते हैं? कोई काम होगा तो संपर्क करूँगी।”

मैंने कहा, “ज़रूर, आप मेरा नंबर नोट कर सकती हो।” मैंने अपना नंबर लड़की को बता दिया।

इसी तरह बातें करते-करते हम दोनों दिल्ली पहुँच गए। वह अपनी सहेली के घर चली गई और मैं अपने मामा जी के घर कुछ दिन रहने के लिए चला गया।

घर पहुँचकर मैंने नहाया-धोया। वहाँ मेरे मामा की बेटी और उनका परिवार था। मामा की बेटियों के नाम अदिति और आरोही थे, और लड़के का नाम आरो था। आरो सबसे छोटा था, आरोही बड़ी थी और अदिति छोटी थी।

हम सबने साथ बैठकर खाना खाया और फिर घूमने मार्केट चले गए। मार्केट घूमकर घर आ गए। इसी तरह कुछ दिन बीत गए।

एक दिन मैं मामा के साथ ताजमहल घूमने गया। वहाँ कुछ ऐसा हुआ कि मैं सोच में पड़ गया। जो लड़की ट्रेन में मिली थी, वही लड़की दोबारा मिल गई और बिना शर्माए दौड़कर आई और मुझे गले लगा लिया।

मेरे मामा, मामी और बच्चे देखने लगे कि यह कौन लड़की है जो सीधे आकर गले लग गई।

मैंने उसे अलग करते हुए कहा, “यह क्या कर रही हो? पागल हो गई हो क्या?”

वह बोली, “आप मुझे भूल गए? मैं वही लड़की हूँ जो आपसे ट्रेन में मिली थी।”

यह सब देखकर मेरी मामी आँखों से इशारा करने लगीं, “अच्छी तो है, तुम्हारी जोड़ी फिट है!”

मुझे उनके इशारे पर बहुत हँसी आ रही थी। मेरे मामा भी कम नहीं थे, वे भी यही बोल रहे थे। मेरी बहनें तो उसे सीधे ‘भाभी’ कहकर पुकारने लगीं।

और तो और, मेरी मामी ने उस लड़की का नंबर ले लिया और घर आने के लिए बुला लिया। वह भी घर आने के लिए तैयार हो गई।

मैं कुछ कहना चाहता था, मगर कह नहीं पाया। उस समय मेरा कुछ नहीं चल रहा था। लड़की जो कह रही थी, वही सब मान रहे थे। वह मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी और मैं फँस गया था, क्योंकि उसने यह भी बता दिया कि मेरा नंबर उसके पास है और सबको दिखा भी दिया।

ज़्यादा कुछ बोलता तो मामा-मामी और उनके बच्चे मुझे ही डाँटते, इसलिए मैं चुप हो गया और सिर्फ सिर हिलाता रहा।

घर पहुँचते ही मेरी मामी ने मेरी मम्मी को फोन कर कहा, “बहू मिल गई!”

मेरी मम्मी बोलीं, “अच्छा? तो ठीक है!”

यह सब सुनकर मुझे हँसी भी आ रही थी और गुस्सा भी।

सारी बातें मेरी मामी ने मम्मी को बता दीं। फिर मेरी शादी की भी बात होने लगी। लड़की भी होशियार थी। वह अपने घर वालों को भी राजी कर चुकी थी।

वह मेरे घर आकर अपने घर वालों से बात करवाने लगी। मेरी मामी ने अंशिका की मम्मी से बात की और शादी की चर्चा होने लगी।

अंशिका ने मेरे बारे में सब कुछ पता कर लिया था। मेरा नाम सोशल मीडिया पर मौजूद था। मेरे बारे में एक-एक बात सोशल मीडिया और गूगल सर्च पर मिल जाती थी। वहीं से उसने मेरी सारी जानकारी ले ली थी।


जब यह बात समाज में पता चली कि मेरी शादी दूसरे समाज की लड़की से हो रही है, तो पूरा समाज हमारा मज़ाक उड़ाने लगा कि यह क्या देखने को मिल रहा है। लोग तरह-तरह की बातें करने लगे।

लेकिन मैं लड़की की कुछ बातों पर फिदा भी हो गया था, क्योंकि उसके अंदर साहस था। उसे यह फर्क नहीं पड़ता था कि दूसरा व्यक्ति क्या कह रहा है। वह ऐसी लड़की थी जिसे समाज से नहीं, सिर्फ अपनी खुशी और अच्छे जीवनसाथी से मतलब था।

मुझे भी ऐसी ही लड़की की जरूरत थी। अंशिका की बातों से मैं बहुत प्रभावित हुआ था। उसे देखकर मेरे अंदर का डर भी खत्म हो गया था। मैं भी यही सोचने लगा कि समाज तो अच्छा करो तब भी बोलेगा, बुरा करो तब भी बोलेगा।

हम दोनों के अंदर एक ही भावना थी कि अब हम दोनों एक-दूसरे से ही शादी करेंगे।

मैं अंशिका की इस बात से भी प्रभावित था कि अगर उसे मैं पसंद था, तो वह उसी दिन, यानी ट्रेन में ही प्रपोज कर देती। मगर ऐसा न करके वह पहले अपने घर वालों को राजी करके आई, फिर मुझे अपना बनाने की बात की।

मुझे यह बात अच्छी लगी कि उसने पहले घर वालों को राजी किया, फिर मुझसे शादी की बात की।

और तो और, वह समाज को एक नया संदेश भी देना चाहती थी कि समाज में एक-दूसरे से रिश्ता कर जाति की नफरत की भावना को तोड़ना चाहिए।

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