तभी संपूर्णा आलोक से धिरे से कहती है--
> मैं अब संतुष्ट होने वाली हूँ ।
जिसे सुनकर आलोक की रफतार और तैज हो जाती है । संपूर्णा अपनी मुट्टा को कसके भीच लेती है और अपनी दौनो हाथो को आलोक के कमर पर कस के बांध दैती हे़ै।
तभी आलोक भी कहता है।
> संपूर्णा मैं भी चरम सिमा तक पहूँच चुका हूँ।
आलोक के इतना कहते ही संपूर्णा आलोक को कस के पकड़ लेती है। और एक लम्बी चीख के साथ आलोक के होंट को चुमने लगती है तभी आलेक के मुह से भी एक चिख निकलता है और आलोक संपूर्णा को कस के पकड़ लेता है और दोनो ही संतुष्ट हो जाता है।
कुछ दैर तक दोनो एक दुसरे को कसके पकड़कर रखता है। फिर धिरे धिरे दोनो का सरीर ढीला पड़ने लगता है। आलोक संपूर्णा से अलग हो जाता है और कहता है--
> संपूर्णा आई लव यू।
जिसे सुनकर संपूर्णा आलोक के होंट पर एक कीस करती है। और दोनो ऐसे ही एक दुसरे बाहों मे नग्ग ही रहता है। संपूर्णा आलोक से कहती है--
> आलोक हमने जो अभी संम्भोग किया उसमे तो तुमने कोई प्रोटेक्सन यूज नही किया ?
आलोक कहता है --
> नही पर तुम अभी ये सब क्यो पूछ रही हो ?
संपूर्णा कहती है--
> अगर बच्चा रह गया तो ?
आलोक कहता है --
> तो क्या ये तो अच्छी बात होगी ना । हमारे प्यार की निसानी होगी।
संपूर्णा हंसते हूए कहती है--
> पागल एक नम्बर का।
इतना बोलकर संपूर्णा उठती है और अपने अंतर वस्त्र पहनने लगती है । तभी आलोक संपूर्णा का हाथ पकड़कर कहता है--
> इतनी जल्दी भी क्या है। रूको ना। क्यों ना एक बार और हो जाए।
संपूर्णा कहती है--
अच्छा! टाईम दैख रहे हो कुछ ही दैर मे सुबह होने वाली है। और अगर हमे यहां कोई दैख लिया तो पता है ना क्या होगा।
आलोक संपूर्णा को अपनी और खिचं कर कहता है--
> क्या होगा । जो होगा सो दैखा जाएगा।
इतना बोलकर आलोक संपूर्णा को वक्ष को फिर से नग्न कर देता है और संपूर्णा को लिटा कर उसके उपर आ जाता है और संपूर्णा के होंट को चुमने लगता है। जिससे संपूर्णा की काम ईच्छा फिर से जागने लगती है। पर संपूर्णा अपने आपको संभालते हूए कहती है--
> आलोक जी अपने काम वासना पर काबु रखिये आजके लिए बस ईतना ही बाकी अब शादी के बाद ।
आलोक मुह बनाते हुए कहता है --
> तुम हो ही इतनी प्यारी के तुम्हारे से दिमाग ही नही
हटता।
इतना बोलकर आलोक उठ जाता है अपने कपड़े पहने लगता है। संपूर्णा भी अपने कपड़े पहन लेती है आलोक कहता है--
> फिर कब आऊ तुमसे मिलने ?
आलोक की बात सुनकर संपूर्णा आलोक से कहती है--
> अच्छा जी । ये उस दिन जो बाकी रह गया था उसके लिए था। अब जो भी होगा सब शादी के बाद।
आलोक संपूर्णा को अपने गौद मे उटाकर कहता है--
> अब तो शादी करनी पड़ेगी क्यों की ये नशा अब छुटने वाली नही है।
संपूर्णा हंसते हूई कहती है--
> अच्छा सही है। मैं भी अब तुमसे दुर नही रह सकती।
इतना बोलकर संपूर्णा आलोक के होंट को चुमने लगती है और फिर कहती है--
> अब तुम जाओ किछ ही दैर मे सुबह हो सकती है। आलोक कहता है--
> ठीक है मैं चलता हूँ। तुम अपना ख्याल रखना ।
इतना बोलकर आलोक वहां से हॉस्पिटल की और चला जाता है। इधर एकांश सुंदरवन पहूँच जाता है। एकाश के मन मे सिर्फ एक ही चिंता थी और वो थी वर्षाली की।
सुंदरवन पहूँचने के बाद एकांश अपनी गाड़ी को जंगल के बाहर खड़ी करके जल्दी से जंगल के अंदर चला जाता है। जंगल के अंदर जौर अंधेरा होने के कारण भी एकाश इन सब की परवाह किये बिना ही जल्दी जल्दी अपना कदम वर्षाली के घर की और बड़या रहा था।
घोर अंधेरा होने केलकारण एकांश अपना मोबाईल का टॉर्च निकालकर जलाता है। जिससे उसे मुस्किल़़ से सामने का रास्ता दिखाई दे रहा था। पर भी किसी चिज की परवाह किये बिना ही एकाश अपने कदम बड़ाये जा रहा था जिससे एकांश को कंटीले झाड़यो से खरोंचे भी आती है ।
पर इन सब चिजो की परवाह किये बिना एकांश बेसुध होकर आगे बड़ रहा था। जल्दी जल्दी चलने के कारण एकांश हांफने लगता है। और उसके चेहरे से पसीना की बूंदे गिरने लगती है। हांफते हांफते ऐकांश उसी जगह पर पहूँच जाता है।
जहां पर वर्षाली रहती है। पर एकांश को वहां पर कुछ भी नही दिखता। ना ही वहां कोई झरना था और ना ही वर्षाली का महल।
वर्षाली की महल को ना दैखकर एकांश की चिंता और भी बड़ जाता है । एकांश अपने चारों और नजरे घुमाकर दैखता है पर वहां उसे सिवाय अंधेरे के कुछ और दिखाई नही देता है। एकांश सोचने लगता है।
> ये वर्षाली का महल को तो यही होना चाहिए था पर वो मुझे दिखाई क्यों नही दे रहा है।
एकांश इतना कुछ सौच ही रहा था तभी एकांश को वर्षाली की बात याद आती है के ये जगह उसी को दिखाई देती है जिसका मन साफ हो। एकांश कहता है--
> ये क्या हो रहा है । इससे पहले तो मुझे ये महल
दिखती थी पर अब क्यों नही दिख रही है।
एकांश कहता है--
> हे जादुई जगह में वर्षाली के लिए यहां आया हूँ।
आपने मुझे यहां मुझे बहुत बार दैखा होगा। हे दिव्य झरना मैं वर्षाली के लिए बहुत चितां मे हूँ क्योकीं मेने अभी एक बहुत ही बुरा सपना दैखा इसिलिए मैं इस वक्त यहां पर आया हूँ । कृपया मुझे अंदर आने दें । मैं ये दैखकर चला जाऊगां के वर्षाली सुरक्षीत है।
इतना बोलकर एकांश चुप हो जाता है। तभी वहां पर एक रोशनी दिखने लगती है। रोशनी इतनी तैज है जिसमे एकांश की आंखे चौंधिया जाती है। एकांश अपनी आंखो को अपने हाथ से ढक लेता है और फिर धिरे धिरे रोशनी कम होने लगती है तो एकांश को पानी की आवाज आने लगती है।
एकांश आंखो से अपने को हचा लेता है। तो दैखता है के वह उसी धरने पास ही खड़ा था। एकांश के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आ जाती है। एकांश इधर उधर वर्षाली को ढुंढने लगता है और ढुंढते हूए झने के पिछे महल की और चला जाता है। और वर्षाली को पुकारने लगता है।
पर वहा वर्षाली को ना दैखकर एकांश बहुत घबरा जाता है। एकांश वर्षाली को सभी कमरे मे जाकर ढुंढने लगता है पर उसे वहां वर्षाली कही भी दिखाई नही देती है। एकांश को अब सपना सच लगने लगता है। एकांश के चेहरे पर घबराहट साफ साफ दिख रहा था । एकांश को समझ मे नही आ रहा था के वो क्या करे ।
तभी एकांश की नजर एक कमरे पर जाता है जिसका दरवाजा अपने आप बंद और खुल रही थी। एकांश कहता है--
> ये दरवाजा अपने आप क्यो बंद और खुल रही है।
जबकी यहां पर हवा भी नही है। कहीं वर्षाली उसी कमरे पर तो नही है।
इतना बौलकर एकांश उस कमरे की बड़ने लगता है। कमरे के अंदर जाकर एकांश दैखता है के वहां पर वर्षाली सोई हुई थी। वर्षाली को कमरे मे दैखकर एकाश के जान मे जान आती है। एकांश एक गहरी सांस लेता है और हल्की मुस्कान के साथ एकांश वर्षाली के पास जाकर बैठ जाता है। एकांश वर्षाली के पास बैठकर कहता है--
> अच्छा मेरी निंद और चेन चुराकर कितनी आराम से सो रही है।
एकांश वर्षाली के चेहरे को दैखकर कहता है--
> कितनी खुबसूरत हो तुम वर्षाली । वर्षाली तुम समझ नही सकती के तुम्हें यहां पर दैखकर मुझे कितनी सुकुन मिला है। तुम्हें नही पता के मेने एक बहुत ही बुरा सपना दैखा जिसे दैखकर मैं बहुत घबरा गया था और यहां भागकर चला आया। पता नही क्यों पर वर्षाली मैं बहुत जर गया था। मुझे ऐसा सग रही था जैसे तुम्हें मुझसे कोई दुर लेकर जा रहा है। मुझे ... मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरे सिने से कोई मेरा दिल
निकालकर ले जा रहा हो। जिससे मैं बहोत ही घबरा गया था।
एकांश धिरे से कहता है--
> वर्षाली मैं ... मैं तुम्हारे बिना नही रह सकता । पता नही क्यूं मुझे तुमसे अलग होने का मन नही करता है। जब तुम पास होती हो तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। पर जब तुम मुझसे दूर रहती हो तो मेरा दिल हर समय बेचने रहने लगता है हर समय मन मे तुम्हारा ही ख्याल आता रहता है। वर्षाली मुझे लगता है के मैं ..... ! मैं तुमसे प्यार करने लगा हूँ पर तुम्हें बताने से डरता हूँ ताकी तुम मुझसे मिलना बंद ना कर दो। मैं जानता हूँ वर्षाली के एक परी हो और तुम मुझसे कभी भी प्यार नहीं करोगी। ये सब जानते हूए भी पता नही फिर भी तुमसे प्यार हो गया। वर्षाली क्या नही हो सकती के तुम्हें भी मुझसे प्यार हो जाए और तुम मुझसे कभी दुर ही ना जाओ और हम हमेशा साथ ही रहे। काश के कभी ऐसा होता तो कितना अच्छा होता ।
एकांश वर्षाली के हाथ को पकड़कर जैसे ही कुछ कहने वाला होता है। के एकांश को पता चलता है के वर्षाली के हाथ एकदम ठडीं हो चुकी थी । एकांश ये दैखकर हैरान था। तभी एकांश वर्षाली सको आवाज देने लगता है। एकांश वर्षाली को पुकारता है--
> वर्षाली ..! वर्षाली !
To be continue....970