I will come secretly - Part 6 in Hindi Love Stories by Std Maurya books and stories PDF | चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 6

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चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 6

लेखक -एसटीडी मौर्य ✍️


जैसा कि पिछले भाग में हुआ था, प्रियांशी के पापा मुझसे कई बातें पूछ चुके थे—मेरे घर-परिवार के बारे में, पढ़ाई के बारे में और मैं क्या करता हूँ उसके बारे में। मैं भी शांत होकर उनके हर सवाल का जवाब दे रहा था। तभी उन्होंने मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा और एक और सवाल पूछा, जो मेरे लिए थोड़ा अलग था।

उन्होंने कहा— “बेटा, क्या मैं तुम्हारा पूरा नाम जान सकता हूँ?”
यहीं से आगे की बात शुरू होती है…
फिर प्रियांशी के पापा मुस्कुराते हुए कहने लगे—
“बेटा, तुमने मेरा दिल जीत लिया। मैं तुमसे बहुत प्रभावित हूँ, क्योंकि तुम इंसानियत से प्रेम करना सिखा रहे हो। तुम्हारी बात बिल्कुल सही है। किसी से प्रेम जाति-धर्म देखकर नहीं, बल्कि उसके स्वभाव और व्यवहार को देखकर किया जाता है।
अक्सर समाज के लोग ऐसी बातों की बुराई करते हैं, लेकिन हम ऐसा नहीं करेंगे। हम अपनी बेटी की शादी तुम्हारे साथ ही करेंगे।”
मैंने कहा—
“अंकल जी, कोई इंसान बुरा नहीं होता, बस लोगों की सोच अलग-अलग होती है। जिस तरह कोई फिल्म हो—अगर उसमें सिर्फ बुरी बातें ही हों और प्रेम की बातें न हों, तो लोग उससे क्या सीखेंगे और कैसे प्रभावित होंगे?”
यह बात सुनकर प्रियांशी की आँखों में आँसू आ गए और दादी ताली बजाने लगीं।
दादी कहने लगीं— “मैं तुम्हें पहले से ही जानती थी कि तुम सबसे भिन्न हो। जब पहली बिल्ली को हमारे यहाँ पहुँचाने आए थे, तभी से।”
और मज़ाक में यह भी कहने लगीं—
“बेटा, तुम झूठ भी बड़े प्यार से बोलते हो।”
दादी फिर मुस्कुराते हुए बोलीं—
“और झूठ भी बोलकर दिल जीत लेते हो।”
मैंने कहा—
“नहीं दादी जी, ऐसा कुछ नहीं है। मैं सिर्फ किसी को बचाने के लिए ही झूठ बोलता हूँ।”
फिर मैंने कहा—
“ठीक है अंकल जी और दादी जी, अब मैं चलता हूँ। अभी मुझे अपने घर कटनी जाना है। पापा का कॉल आया था कि मम्मी बीमार हैं, इसलिए मुझे जाना पड़ेगा। मेरे साथ मेरी बहन अंकिता भी जाएगी।”
तभी अंकिता का कॉल आ जाता है। अंकिता की बात सुनकर मैं घबरा गया और बिना कुछ बोले ही जल्दी से वहाँ से निकल पड़ा।
लेकिन पीछे से प्रियांशी भी आ रही थी। दादी यह देखकर सोच में पड़ गईं कि आखिर अचानक क्या हो गया। उन्होंने अपनी नातिन को मेरे कमरे में भेजते हुए कहा—
“जाओ, पता करके आओ क्या बात है। हम भी चलते हैं देखने।”
जब मैं अपने कमरे में गया तो मेरी छोटी बहन अंकिता जल्दी-जल्दी बैग भर रही थी।
मैंने कहा—
“अंकिता, बताओ मुझे इतनी जल्दी क्यों बुलाया है?”
अंकिता बोली—
“भैया, हमें जल्दी घर चलना होगा। मम्मी बहुत बीमार हैं। उन्हें ब्लड की जरूरत है। उनका ब्लड ग्रुप O+ है, इसलिए जल्द से जल्द इंतज़ाम करना होगा।”
प्रियांशी दरवाज़े पर खड़ी होकर यह सब सुन रही थी। फिर वह थोड़ा पास आकर बोली—
“अरे! चिंता की बात नहीं है। मैं अपना ब्लड डोनेट कर दूँगी। मेरा ब्लड ग्रुप भी O+ है। मैं रक्त दे सकती हूँ।”
मैंने कहा—
“नहीं प्रियांशी, तुम्हारे घर वाले मुझे गलत समझेंगे। उन्हें लगेगा कि मैं तुम्हारा इस्तेमाल कर रहा हूँ। तुम रहने दो, मैं कहीं और से इंतज़ाम कर दूँगा।”
अंकिता भी बोली—
“हाँ भैया, यह बात सही है। भाभी, आप भैया की बात मान लीजिए, नहीं तो आपके घर वाले हम दोनों को गलत समझेंगे।”
यह सारी बातें प्रियांशी की दादी सुन रही थीं। वह भी बीच में बोल पड़ीं—
“अरे बेटा, हम क्यों गलत सोचेंगे? अगर मेरी नातिन की वजह से तुम्हारी मम्मी ठीक हो जाती हैं तो इसमें गलत क्या है? हम बिल्कुल भी गलत नहीं सोचेंगे। तुम इसे साथ ले जाओ।”
प्रियांशी बोली—
“नहीं, मेरी बात आपको माननी ही पड़ेगी। मैं आपकी मम्मी को ब्लड दूँगी। अगर आप मुझे मदद नहीं करने दोगे तो आपको मेरी कसम।”
मैंने कहा—
“अरे, मुझे कसम मत दो। मुझे ऐसा करना अच्छा नहीं लगता।”
प्रियांशी बोली—
“इसमें अच्छा-बुरा क्या है? मैं तो सिर्फ इंसानियत के नाते ब्लड दूँगी। आप ही तो कहते हो कि इंसानियत सबसे बड़ा उपहार है और सबको एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए।”
मैंने कहा—
“ठीक है, फिर जल्दी तैयार हो जाओ। नहीं तो ट्रेन छूट जाएगी। हमें रेलवे स्टेशन पहुँचना होगा। अभी तो एक बजे हैं और ट्रेन ढाई बजे है। तुम जल्दी तैयार हो जाओ।”
प्रियांशी बोली—
“आप पाँच मिनट रुकिए, मैं अभी तैयार होकर आती हूँ।”
प्रियांशी अपने कमरे में गई और थोड़ी ही देर में तैयार होकर वापस आ गई।
फिर हम तीनों लोग ट्रेन पकड़ने के लिए निकल पड़े।
हमारे कमरे से रेलवे स्टेशन लगभग 10 किलोमीटर दूर था, इसलिए हम बस स्टैंड के पास रुककर बस का इंतज़ार करने लगे। कुछ समय बाद बस आ गई और हम तीनों उसे रुकवाकर उसमें बैठ गए।
लेकिन रास्ते में ही हमारा समय खराब हो गया, क्योंकि बस अचानक पंक्चर हो गई।
ट्रेन आने में अब सिर्फ 40 मिनट ही बाकी थे।
हम तीनों एक-दूसरे की ओर देखने लगे और सोच में पड़ गए कि अब क्या करें।
तभी प्रियांशी बोली—
“अगर हम यहाँ रुक गए तो ट्रेन छूट जाएगी। हमें पैदल ही निकलना होगा।”
मैंने कहा—
“हाँ, तुम सही कह रही हो। हम यहाँ रुककर समय बर्बाद नहीं कर सकते। हमें किसी भी तरह स्टेशन पहुँचना होगा।”
अंकिता भी घबराते हुए बोली—
“हाँ भैया, हमें अभी निकलना ही पड़ेगा। अगर आज हम नहीं पहुँच पाए तो मम्मी को समय पर ब्लड नहीं मिल पाएगा। डॉक्टर ने कहा है कि उन्हें छह घंटे के अंदर ब्लड चाहिए।”
यह सुनकर हम तीनों बिना देर किए तेज़ कदमों से रेलवे स्टेशन की ओर चल पड़े।

धीरे धीरे चलने लगे  रास्ते में एकछोटा किल था और वह किल मेरे पैरो में लग गया जिस ब्लेंड निकलने लगा मगर मै किसी को नहीं बताया 
मगर प्रियांशी देख ली 
वह मुझे डांटने लगी की आप के पैरो में किल लगा फिर भी बता नहीं रहे हो 
तुरत अपनी दुपट्टा का एक टुकड़ा फाड़ी और मुझे बैठने को बोली 
उसने मेरे पैरो में  किल वाली जगह पर अपनी दुपट्टा बँधी आँखों में आँशु लिए 
उसके बाद धीरे धीरे चल दिये 
कुछ देरी के बाद हम रेलवे स्टेशन पर पहुंच गए 
वहा मुझे कुर्सी पर बैठा दी