"ख़ामोश ज़िंदगी के बोलते जज़्बात"
भाग 19: “डायरी का राज़… और मौत का सच” रचना: बाबुल हक़ अंसारी
पिछले खंड से…
“नाम ही नहीं…
पूरा सच है।”
डायरी का खुलासा
कॉलेज के एक सुनसान कमरे में चारों बैठे थे —
अनया, आर्या, नीरव… और शेखर दत्त।
कमरे में खामोशी इतनी गहरी थी कि पन्ने पलटने की आवाज़ भी भारी लग रही थी।
शेखर दत्त ने डायरी खोली और धीमे स्वर में पढ़ना शुरू किया —
“अगर ये डायरी कभी बाहर आई, तो समझ लेना…
मेरी हार मेरी हार नहीं थी,
और मेरी मौत… एक हादसा नहीं।”
अनया के हाथ काँपने लगे।
“मौत… हादसा नहीं?”
साज़िश का असली चेहरा
शेखर दत्त ने अगला पन्ना पलटा।
“उस रात, जब रघुवीर को मंच से हटाया गया,
उन्हें धमकी दी गई थी —
या तो चुप रहो… या हमेशा के लिए खामोश कर दिए जाओ।”
नीरव की आँखों में गुस्सा भर गया —
“मतलब… उन्हें जान से मारा गया?”
शेखर ने सिर झुका लिया —
“हाँ… उनकी गाड़ी का ‘एक्सीडेंट’ नहीं हुआ था,
ब्रेक पहले से काटे गए थे।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आर्या की आवाज़ काँप उठी —
“ये सब… किसने किया?”
शेखर ने धीरे से कहा —
“मंत्री कैलाश पांडे…
और उनके साथ कुछ बड़े नाम…
जिनके लिए सच सबसे बड़ा खतरा था।”
अनया का टूटना… और बनना
अनया वहीं ज़मीन पर बैठ गई।
उसकी आँखों से आँसू बहते रहे।
“मेरे पापा… सच के लिए मारे गए…?”
नीरव उसके पास बैठ गया —
“हाँ… लेकिन अब वो सच जिंदा है… तुम्हारे अंदर।”
अनया ने आँसू पोंछे।
उसकी आँखों में अब दर्द नहीं… आग थी।
“अब ये लड़ाई किताब की नहीं रही…
ये इंसाफ़ की लड़ाई है।”
सत्ता का जाल
उसी वक्त बाहर अचानक शोर हुआ।
कुछ लोग दरवाज़ा तोड़ने की कोशिश कर रहे थे।
आर्या घबरा गई —
“ये लोग यहाँ तक पहुँच गए?”
नीरव ने तुरंत डायरी उठाई और कहा —
“हमें यहाँ से निकलना होगा… अभी!”
शेखर दत्त ने एक पीछे का रास्ता दिखाया —
“जल्दी जाओ… ये लोग मुझे ढूंढने आए हैं।”
अनया ने उनका हाथ पकड़ लिया —
“नहीं! हम आपको अकेला छोड़कर नहीं जाएंगे!”
शेखर मुस्कुराए —
“बेटी… मेरी उम्र सच छुपाने में बीती है,
अब उसे बचाने में खत्म हो जाए तो अफ़सोस नहीं होगा।”
दरवाज़ा ज़ोर से टूटने लगा।
भागती सच्चाई
नीरव, आर्या और अनया पीछे के रास्ते से भाग निकले।
उनके हाथ में अब सिर्फ़ पांडुलिपि नहीं…
पूरे सच का सबूत था।
दूर सड़क पर दौड़ते हुए अनया ने कहा —
“अब ये सच छुपेगा नहीं… चाहे कुछ भी हो जाए।”
नीरव ने दृढ़ स्वर में कहा —
“अब हम भाग नहीं रहे…
हम सच को दुनिया तक पहुँचाने जा रहे हैं।”
पीछे छूटा तूफ़ान
उधर कमरे के अंदर दरवाज़ा टूट चुका था।
नकाबपोश अंदर घुसे।
शेखर दत्त अकेले खड़े थे।
एक आदमी गरजा —
“डायरी कहाँ है?”
शेखर मुस्कुराए —
“अब वो वहाँ है… जहाँ तुम्हारी पहुँच नहीं।”
अगले ही पल एक ज़ोरदार आवाज़ गूँजी…
और कमरा फिर से खामोश हो गया।
(जारी रहेगा… भाग 20 में)
अगले भाग में आएगा:
शेखर दत्त के साथ क्या हुआ?
अनया का बड़ा कदम — सच को सार्वजनिक करने की योजना
और सत्ता का अंतिम जाल… जिसमें सब कुछ दांव पर होगा
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ख़ामोश ज़िंदगी के बोलते जज़्बात" का भाग 19 आपको कैसा लगा? शेखर दत्त का बलिदान और अनया की आँखों में जलती 'इंसाफ़ की आग' क्या रंग लाएगी?
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क्या शेखर दत्त का पीछे रुकना सही फैसला था?
अनया का अगला कदम क्या होना चाहिए?
खास बात: जिन पाठकों का कमेंट सबसे बेहतरीन होगा, उन्हें अगले भाग में उनके नाम के साथ विशेष स्थान दिया जाएगा।