साजन: बेइंतहा इश्क
(Beloved: The Endless Love)
शहर से कुछ दूर, एक छोटे से कस्बे में बसा था पुराना सा मकान। उस मकान की दीवारों पर चढ़ी आइवी की बेलें जैसे समय को थामे रखना चाहती थीं। उसी मकान में रहती थी माही। बाईस साल, खुली जुल्फें, आँखों में सपने और होंठों पर एक नाम—साजन।
साजन कोई नायक नहीं था, न कोई अमीरों का लड़का। वह उसी कस्बे की चाय की दुकान पर काम करता था, लेकिन उसके हाथों में वह सादगी थी, उसकी बातों में वह गहराई थी, जो दिलों को बिना बताए खींच लेती थी। माही से उसकी पहली मुलाकात बारिश में हुई थी। माही कॉलेज से लौट रही थी, और अचानक आई बारिश ने उसे दुकान की छत के नीचे रोक लिया। साजन ने चुपचाप एक गरम चाय का कप उसकी तरफ बढ़ा दिया।
"बारिश में चाय पीना मना है?" उसने मुस्कुराकर पूछा।
माही ने कप लिया, और उस दिन से उसने साजन में वह कुछ ढूँढ़ना शुरू कर दिया, जो वह खुद नहीं जानती थी कि क्या है।
धीरे-धीरे बातें बढ़ीं। पहले चाय के कपों पर, फिर कस्बे की सैर पर, फिर शाम को नदी के किनारे बैठकर सितारों को गिनने पर। साजन उसे कहानियाँ सुनाता—अपनी माँ की, जो अब नहीं थीं, अपने बचपन की, जो गरीबी में बीता था, और उन सपनों की, जो उसने कभी किसी को नहीं बताए थे।
"मैं एक दिन शहर जाऊँगा," साजन ने एक शाम कहा, "फिल्मों में काम करूँगा। माँ कहती थीं, मेरे चेहरे पर नूर है।"
माही हँस पड़ी। "तुम? हीरो?"
"हँसो मत," साजन ने कहा, लेकिन उसकी आँखों में वह चमक थी जो सपने देखने वालों की होती है। "मैं करके दिखाऊँगा।"
माही ने उसकी तरफ देखा। उसे लगा जैसे वह साजन की आँखों में खो रही है। वह जान गई—यह प्यार है। और साजन ने भी उसी रात उसका हाथ पकड़कर कहा, "माही, तुमसे मिलकर लगता है जैसे मुझमें कुछ और हो गया है। कुछ अच्छा।"
वह प्यार बढ़ा। दोनों ने एक-दूसरे में वह पनाह पाई जो दुनिया नहीं दे सकती थी। माही के पिता को पता चला। वह कस्बे के सबसे रूढ़िवादी आदमी थे। उनके लिए साजन सिर्फ एक चाय वाला था, उनकी बेटी के लायक नहीं।
"उस लड़के से बात करके आओ," पिता ने सख्त लहजे में कहा, "या मैं खुद बात करूँ?"
माही ने कहा, "पापा, वह अच्छा है। मैं उससे प्यार करती हूँ।"
"प्यार?" पिता की आवाज़ में तल्खी थी। "प्यार से पेट नहीं भरता, बेटी। चाय बेचकर तुम्हारा भविष्य नहीं संवार सकता वह।"
माही चुप रही। वह जानती थी कि उसके पिता का प्यार भी सच्चा है, लेकिन वह साजन के बिना नहीं रह सकती थी।
एक रात साजन उससे मिला। उसकी आँखें सूजी हुई थीं, जैसे रोया हो।
"माही," उसने कहा, "मैं शहर जा रहा हूँ।"
माही का दिल धक् से रुक गया। "कब?"
"कल सुबह।" साजन ने उसका हाथ पकड़ लिया। "तुम्हारे पापा से मिलकर आया हूँ। उन्होंने कहा—जब तक मेरे पास अपना घर, अपनी गाड़ी, अपना नाम न हो, उनके दरवाज़े पर न आऊँ।"
माही की आँखों से आँसू बहने लगे। "तो तुम जा रहे हो?"
"मैं जा रहा हूँ," साजन ने कहा, "लेकिन इसलिए नहीं कि मैं तुमसे दूर होना चाहता हूँ। इसलिए कि मैं तुम्हारे लायक बनकर लौटना चाहता हूँ।"
"मुझे लायक-वायक कुछ नहीं चाहिए," माही फफक पड़ी, "मुझे सिर्फ तुम चाहिए।"
साजन ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया। उसने उसके बालों को सहलाया, उसके माथे पर एक बार चूम लिया।
"सुन, माही," उसकी आवाज़ धीमी थी लेकिन पक्की, "हमारा प्यार बेइंतहा है। खत्म नहीं होता। चाहे दूरियाँ हों, चाही मुश्किलें हों, यह प्यार रहेगा। मैं तुमसे वादा करता हूँ—एक दिन लौटूँगा। और जब लौटूँगा, तो सिर ऊँचा करके तुम्हारे घर आऊँगा।"
माही ने अपने आँसू पोंछे। "कब तक?"
"जितना वक्त लगेगा। लेकिन तुम इंतजार करोगी?"
"मैं जनम जनम का इंतजार करूँगी," उसने कहा, "बस तुम वापस आना।"
अगली सुबह साजन चला गया। उसने मुड़कर नहीं देखा, क्योंकि उसे पता था कि अगर देख लिया तो रुक जाएगा। माही अपनी खिड़की से उसे जाते देखती रही, जब तक वह धूल में मिल नहीं गया।
साल बीत गए। पहला साल—माही को हर दिन साजन की याद आती। वह चाय की दुकान पर जाती, उस कप को हाथ लगाती जहाँ से साजन ने उसे पहली बार चाय दी थी। दूसरा साल—साजन का कोई खबर नहीं। उसके पिता ने रिश्ते लाने शुरू कर दिए। माही ने सब ठुकरा दिए। तीसरा साल—पिता ने अल्टीमेटम दे दिया। "या तो उस चाय वाले को भूल जा, या मेरा मुँह मत दिखा।"
माही ने घर छोड़ दिया। वह शहर चली गई, एक छोटे से कमरे में रहने लगी, एक स्कूल में पढ़ाने लगी। उसने साजन को ढूँढ़ा—फिल्म सिटी के चक्कर लगाए, ऑडिशन हालों के बाहर घंटों खड़ी रही। कहीं उसका कोई पता नहीं था।
चौथा साल। एक दिन माही को एक पुराने अखबार में एक छोटी सी तस्वीर दिखी। एक नई फिल्म का पोस्टर था, और उसमें एक चेहरा था—साजन। छोटा सा रोल था, नाम भी नहीं छपा था, लेकिन वह वही था। उसकी आँखें, उसकी मुस्कान।
माही उसी दिन फिल्म सिटी पहुँची। वहाँ पता चला कि साजन अब 'साजन' नहीं, बल्कि 'समीर' बन चुका था—एक उभरता हुआ अभिनेता। उसकी पहचान छुपा ली गई थी, क्योंकि फिल्म वालों ने कहा—"तुम्हारा नाम साजन बहुत कस्बाई है। समीर रख लो।"
माही ने उससे मिलने की कोशिश की, लेकिन सुरक्षा के पहरेदारों ने रोक दिया। उसने पत्र लिखा, पुराने दिनों की बातें लिखीं, नदी के किनारे वाली शामें लिखीं, वह चाय का पहला कप लिखा। कोई जवाब नहीं आया।
पाँचवाँ साल। समीर एक जाना-माना नाम बन चुका था। उसकी तस्वीरें हर जगह थीं, उसके चाहने वालों की भीड़ थी। माही ने देखा—एक पत्रिका में उसकी तस्वीर थी, एक खूबसूरत अभिनेत्री के साथ। कैप्शन था—"समीर की नई फिल्म, नई जोड़ी, नया प्यार?"
माही का दिल टूट गया। उसने सोचा—शायद साजन भूल गया। शायद शहर ने उसे बदल दिया। शायद वह वादा सिर्फ हवा में उड़ गया।
उसने फिर कभी उसे ढूँढ़ने की कोशिश नहीं की। वह अपने कस्बे लौट आई, फिर से पढ़ाने लगी। पिता से मिली, लेकिन उनकी बातें अब और भी कड़वी हो गई थीं। "देखा, वह लड़का तो शहर में सितारा बन गया। तुम्हें भूल गया।"
माही ने कुछ नहीं कहा। उसने अपने दिल में साजन को दफना दिया।
सातवाँ साल। एक दिन कस्बे में हलचल मच गई। पता चला कि कोई फिल्म की शूटिंग कस्बे में आ रही है। और उस फिल्म का हीरो था—समीर। लोग उत्साहित थे, लेकिन माही के लिए यह खबर एक सूली की तरह थी। उसने ठान लिया कि वह उस दिन घर से बाहर नहीं निकलेगी।
शूटिंग के दिन पूरा कस्बा सज गया। स्कूल बंद था। माही अपने कमरे में बैठी किताब पढ़ रही थी, तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। उसने खोला तो सामने एक आदमी खड़ा था—साजन। उसने शेव कर रखी थी, बाल छोटे थे, कपड़े महँगे थे। लेकिन वही आँखें थीं, वही मुस्कान का कोण था।
"माही," उसने कहा।
माही ने दरवाज़ा बंद करने की कोशिश की, लेकिन साजन ने हाथ रोक दिया।
"सुन तो ले," उसने कहा।
"सुनने को क्या बचा है?" माही की आवाज़ काँप रही थी। "तुम तो समीर बन गए। तुम्हारी तस्वीरें अखबारों में हैं, तुम्हारी प्रेमिकाएँ हैं। मैं तो बस एक पुरानी याद हूँ।"
साजन ने उसका हाथ पकड़ लिया। "वह सब झूठ था। वह अभिनेत्री सिर्फ फिल्म की सह-कलाकार थी। मैंने तुम्हें हज़ारों पत्र लिखे, लेकिन तुम्हारा पता नहीं मिला। मैंने हर महीने यहाँ आने की कोशिश की, लेकिन फिल्मों ने मुझे जकड़ लिया। मैं जानता था कि अगर बीच में आ गया, तो वापस नहीं जा पाऊँगा, और मैंने तुम्हारे पिता से वादा किया था—जब तक कुछ न बन जाऊँ, वापस नहीं आऊँगा।"
माही की आँखों से आँसू बहने लगे। "सात साल... सात साल में एक खबर नहीं?"
"मैं डर गया था," साजन ने कहा, "डर गया था कि तुम मुझे भूल जाओगी। डर गया था कि तुम्हारे पिता ने तुम्हारी शादी कर दी होगी। डर गया था कि तुम मुझसे नाराज़ होगी।"
"तो अब क्यों आए?"
"क्योंकि आज वह दिन है।" साजन ने अपनी जेब से एक चाबी निकाली। "मैंने शहर में घर ले लिया है। अपना घर। अपनी गाड़ी। अपना नाम। और आज मैं तुम्हारे पिता के सामने सिर ऊँचा करके खड़ा हो सकता हूँ।"
माही ने उसकी तरफ देखा। वही साजन था—लेकिन उसकी आँखों में अब एक और चीज़ थी: थकान, संघर्ष, और सात साल की तड़प।
"तुमने कभी किसी से प्यार नहीं किया?" माही ने पूछा।
साजन ने उसके सामने घुटने टेक दिए। "मैंने सिर्फ एक से प्यार किया है। तुमसे। और यह प्यार बेइंतहा है, माही। सात साल दूर रहा, लेकिन हर रात तुम मेरे सपनों में आती थीं। हर फिल्म के सेट पर मैं तुम्हें ढूँढ़ता था। हर डायलॉग मैं तुम्हारे लिए बोलता था।"
माही रो पड़ी। वह उसके सामने बैठ गई, उसके हाथों को अपने हाथों में ले लिया।
"साजन," उसने कहा, "मैंने भी कभी किसी से प्यार नहीं किया। सिर्फ तुमसे। और मैंने इंतजार किया। हर दिन, हर महीना, हर साल।"
साजन ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया। वहीं, उसी छोटे से कमरे में, सात साल की दूरियाँ पिघल गईं।
उसी शाम साजन माही के पिता के पास गया। उसके हाथ में शहर के घर के कागज़ात थे, बैंक की पासबुक थी, और एक छोटा सा डिब्बा था जिसमें उसने सात सालों में लिखे सारे पत्र रखे थे—जो कभी भेजे नहीं जा सके।
"मैंने वादा किया था," साजन ने पिता से कहा, "जब तक अपना कुछ न बना लूँ, नहीं आऊँगा। आज मैं आया हूँ। और मैं आपसे आपकी बेटी का हाथ माँगने आया हूँ।"
पिता ने उसे देर तक देखा। उनकी आँखों में पहले सख्ती थी, फिर धीरे-धीरे वह पिघली। उन्होंने साजन के कंधे पर हाथ रखा और कहा, "सात साल... तूने सात साल इंतजार किया। मैंने सोचा था तू भूल जाएगा।"
"मैं भूल सकता था सब कुछ," साजन ने कहा, "लेकिन उसे नहीं।"
शादी कस्बे में हुई। पूरा कस्बा शामिल हुआ। वही चाय की दुकान, वही नदी का किनारा, वही सितारे। लेकिन इस बार साजन ने माही का हाथ पकड़ा और कहा, "अब कोई दूरी नहीं।"
शादी के बाद वे शहर चले गए। साजन की फिल्में चलती रहीं, लेकिन अब हर फिल्म के टाइटल में 'समीर' नहीं, बल्कि 'साजन' नाम होता। उसने अपना पुराना नाम वापस ले लिया था।
माही ने शहर में भी पढ़ाना जारी रखा। उसने एक छोटा सा स्कूल खोला, उन बच्चों के लिए जो सपने देखते थे लेकिन साधन नहीं रखते थे।
एक शाम, जब दोनों अपनी बालकनी में बैठे थे, माही ने पूछा, "साजन, इतने सालों में कभी लगा कि यह प्यार बेवजह था?"
साजन ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में वही चमक थी जो उस दिन चाय की दुकान पर थी।
"बेवजह?" उसने कहा, "माही, प्यार कभी बेवजह नहीं होता। लेकिन अगर बेवजह भी हो, तो भी मैं करता। तुमसे प्यार करना मेरी जरूरत है, कोई सौदा नहीं।"
माही ने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। "सात साल इंतजार... बेइंतहा वक्त था वह।"
"बेइंतहा वक्त," साजन ने कहा, "लेकिन बेइंतहा प्यार भी। और अब यह प्यार और भी गहरा हो गया है। क्योंकि अब मुझे पता है—दूरियाँ इसे कम नहीं कर सकतीं।"
सालों बाद, जब लोग साजन से उनकी प्रेम कहानी पूछते, तो वह मुस्कुराकर कहता—
"हमारी कहानी में कोई जलवा नहीं, कोई एक्शन नहीं, कोई गीत-संगीत नहीं। बस एक चाय का कप था, एक नदी का किनारा था, और सात साल का इंतजार था। लेकिन जो प्यार सात साल का इंतजार कर सके, वह बेइंतहा है।"
और माही हमेशा उसके बगल में बैठी मुस्कुराती, उसका हाथ थामे।
क्योंकि उनका प्यार सचमुच बेइंतहा था—बिना किसी हद के, बिना किसी अंत के। जैसे आसमान, जैसे समंदर, जैसे वह चुप्पी जो दो दिलों के बीच होती है, जहाँ शब्दों की जरूरत नहीं होती।
समाप्त