मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "अरे प्रियांशी, कुछ हुआ तो नहीं मुझे ?"
प्रियांशी बोली, "हाँ, इतना कुछ हो गया और आप पूछ रहे हैं कि क्या हुआ है? चलिए, अब अपनी सीट पर बैठिए।"
मैं अपनी सीट की तरफ बढ़ने लगा।
अंकिता ने पूछा, "भैया, अभी तक कहाँ थे? आपने इतनी देर कर दी!"
मैंने कहा, "कहीं नहीं था, बस एक छोटी बच्ची मिल गई थी। उसी से बातें करते-करते समय का पता ही नहीं चला।"
मैं उस लड़की की बातों में खोया हुआ था। वह नन्ही सी बच्ची थी और उसका कोई नहीं था। (मैंने उदास होकर कहा)
अंकिता बोली, "तो फिर आप उसे अपने साथ क्यों नहीं ले आए? वह बच्ची भी हमारे साथ रह लेती।"
प्रियांशी ने टोकते हुए कहा, "अंकिता, हर बार ऐसा करना ठीक नहीं होता। आजकल लोग अच्छा करने
पर भी उसे गलत समझ लेते हैं।"
"एक बार मैं पंडित दीनदयाल उपाध्याय रेलवे स्टेशन पर थी। वहाँ मेरे पास एक बच्चा आया, जिसके साथ एक औरत भी थी। बच्चे ने मुझसे खाना माँगा, तो मैंने दया भाव से उसे खाना दे दिया।
जैसे ही बच्चे ने खाना खाया, वह अचानक ज़मीन पर गिर गया। यह देखते ही उसके साथ वाली औरत ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगी और मुझ पर आरोप लगाने लगी कि मैंने खाने में कुछ मिला दिया है।
वह चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगी कि अब मुझे बच्चे के इलाज के लिए भारी रकम देनी होगी। मैं समझ गई थी कि मुझे फँसाने की कोशिश की जा रही है।"
मैंने अपनी बात रखते हुए कहा, "लेकिन प्रियांशी, हर कोई तो ऐसा नहीं होता न?"
प्रियांशी ने एक ठंडी आह भरी और बोली, "बेशक हर कोई ऐसा नहीं होता, लेकिन इन मासूम बच्चों से गलत काम करवाए जाते हैं। मैंने खुद देखा है कि कैसे कुछ लोग पैसों के लालच में गरीब और अनाथ बच्चों को उठा ले आते हैं और उनसे भीख मंगवाते हैं। जो बच्चे भीख नहीं मांगते, उन्हें बेरहमी से मारा-पीटा जाता है। वे मासूम बच्चे चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते। उन्हें वक्त पर खाना तक नहीं दिया जाता।"
अंकिता की आँखें नम हो गईं, वह धीरे से बोली, "सच में भाभी... ये तो बहुत बुरा है।"
तभी पास बैठे एक यात्री ने हमारी बातों में दिलचस्पी लेते हुए टोका, "हाँ बेटी, यह बिल्कुल सही कह रही हैं। आजकल कुछ लोगों ने इसे धंधा बना लिया है। वे दिन भर बच्चों से भीख मंगवाते हैं और शाम को उनसे पैसों का हिसाब लेते हैं। लोग भी मासूम चेहरा देखकर तरस खा जाते हैं और दान कर देते हैं, पर उन्हें क्या पता कि यह पैसा उन बच्चों के पास नहीं, बल्कि उनके आकाओं के पास जाता है।"
मैंने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा, "लेकिन सरकार को इस विषय में गंभीरता से सोचना चाहिए और इस समस्या का स्थाई समाधान निकालना चाहिए। जो कमजोर वर्ग के लोग हैं, उन्हें उचित सुविधाएँ देकर आगे बढ़ाना चाहिए और जो लोग मासूमों से गलत काम करवा रहे हैं, उन पर कड़ी रोक लगानी चाहिए।"
प्रियांशी ने एक कड़वी सच्चाई बयां करते हुए कहा, "सुविधाएँ तो सरकार देती है, लेकिन आजकल भ्रष्टाचार इतना बढ़ गया है कि कुछ कर्मचारी दूसरों के हक के पैसों से अपना पेट भरना चाहते हैं। वे यह जानते हुए भी कि यह पैसा एक गरीब का है, उसे लूटने से बाज नहीं आते।"
उसने अपनी बात का उदाहरण देते हुए आगे कहा, "जैसे सरकार गरीब को घर बनाने के लिए ₹1.20 लाख की सहायता देती है, लेकिन असल में उस गरीब के हाथ में मुश्किल से ₹1 लाख ही आ पाते हैं। बाकी के ₹20 हजार तो बीच के कर्मचारी ही डकार जाते हैं।"
प्रियांशी ने उन कर्मचारियों के बात करने के तरीके को दोहराते हुए कहा, "वे गरीब लोगों को डराते हैं कि— 'अगर आप हमें हिस्सा नहीं देंगे, तो आपको आवास योजना का लाभ नहीं मिल पाएगा। फॉर्म भरने में ही ₹5 हजार लग जाएंगे और फिर मेरे साहब को भी तो कुछ खर्चा-पानी देना होगा।' इस डर और मजबूरी में गरीब आदमी अपने हक का पैसा भी उनके हाथों में सौंप देता है।"
आसपास बैठे यात्री हमारी इन बातों को बड़े ध्यान से सुन रहे थे। कुछ लोग सिर हिलाकर हमारी बातों का समर्थन कर रहे थे, तो कुछ अपनी ही सोच में डूबे थे। बाहर अंधेरा गहरा रहा था और ट्रेन अपनी ही मस्त चाल में पटरियों पर दौड़ रही थी।
अंकिता ने प्रियांशी की बात का समर्थन करते हुए कहा, "हाँ भाभी, यह बिल्कुल सच है। मेरी सहेली के घर में भी ठीक ऐसा ही हुआ था। उसके परिवार वालों ने भी इसी डर से कि कहीं उन्हें आवास न मिले, कर्मचारियों को बीस हज़ार रुपये दे दिए थे। वे लोग बहुत गरीब हैं, पर मजबूरी में उन्हें अपना हक पाने के लिए भी रिश्वत देनी पड़ी।"
ट्रेन की खड़खड़ाहट के बीच अंकिता की आवाज़ में एक बेबसी थी, जो शायद वहाँ बैठे हर यात्री के मन की बात थी।
पास बैठे एक बुजुर्ग यात्री हमारी बातें सुनकर मुस्कुराए और बोले, "बेटा, तुम तीनों क्या करते हो? अक्सर तुम्हारी उम्र के लड़के-लड़कियाँ प्यार-मोहब्बत और इश्क की बातें करते हैं, लेकिन आज पहली बार मैं कम उम्र के युवाओं को इतनी गंभीर सामाजिक बातें करते हुए देख रहा हूँ। मुझे बहुत खुशी हुई।"
मैंने विनम्रता से जवाब दिया, "नहीं अंकल जी, ऐसी बात नहीं है कि सिर्फ हम ही ऐसी बातें कर रहे हैं। असल में मैं एक लेखक हूँ और हमेशा समाज की नई-नई सच्चाइयों की तलाश में रहता हूँ। मेरा मानना है कि बदलाव के प्रति हम युवाओं की भी कुछ जिम्मेदारी होनी चाहिए।"
यात्री जी की आँखों में एक चमक आ गई, वे बोले, "सच कह रहे हो बेटा, तुम तीनों जो कह रहे हो, वो सीधे दिल से निकल रही बातें हैं। अगर देश का हर युवा तुम्हारी तरह सोचने लग जाए, तो हमारा देश जरूर विकसित और समृद्ध हो जाएगा।"
प्रियांशी ने आत्मविश्वास के साथ सिर हिलाया और कहा, "बेशक अंकल जी! अगर हम अपनी छोटी-छोटी जिम्मेदारियाँ समझने लगें, तो हमारा देश जरूर एक दिन पूरी तरह विकसित होगा।"
ट्रेन की रफ्तार के साथ-साथ अब हमारे विचारों में भी एक नई ऊर्जा महसूस हो रही थी।
कुछ ही देर में ट्रेन एक अगले स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर जाकर रुकी। अंकिता ने जैसे ही खिड़की से बाहर झांका, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
उसने तुरंत हमें पुकारते हुए कहा, "भैया, भाभी! इधर देखिए... कितनी छोटी बच्ची है और यह क्या बेच रही है?"
उसकी आवाज़ में हैरानी और दुख साफ झलक रहा था। हमने देखा कि एक नन्ही सी बच्ची, जिसकी उम्र शायद स्कूल जाने की थी, प्लेटफॉर्म पर घूम-घूमकर नशीले पदार्थ और गुटका बेच रही थी। वह मासूमियत से अनजान उन चीजों का सौदा कर रही थी, जो समाज के लिए ज़हर हैं। अंकिता उसे देखकर सुबकने लगी, उसकी आँखों में उस बच्ची के भविष्य को लेकर डर और चिंता साफ दिख रही थी।
यात्री बोले -