भाग 3: खून की विरासत (Extended Version)
अंधेरा…
सिर्फ अंधेरा नहीं…
जैसे कोई जिंदा चीज़ हो, जो धीरे-धीरे राहुल को अपने अंदर निगल रही हो।
हवेली की दीवारें ठंडी हो चुकी थीं।
हवा में नमी थी… और एक अजीब सी सड़न की गंध।
राहुल के चारों तरफ सन्नाटा फैला हुआ था।
इतना गहरा सन्नाटा कि उसकी अपनी सांसों की आवाज भी उसे अजनबी लगने लगी।
उसने हिलने की कोशिश की…
लेकिन उसका शरीर जैसे जम गया था।
तभी—
एक ठंडी हवा का झोंका उसके चेहरे से टकराया।
उसकी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।
और उसी पल—
लाइट अपने आप जल उठी।
राहुल की आँखें चौंधिया गईं।
उसने धीरे-धीरे सामने देखा…
और उसका दिल रुक सा गया।
वो औरत…
वहीं थी।
उसके सामने।
इतनी करीब कि राहुल उसकी साँसों की ठंडक महसूस कर सकता था।
उसकी आँखें…
पूरी तरह लाल थीं।
लेकिन सिर्फ लाल नहीं…
उनमें कुछ और भी था—
दर्द…
गुस्सा…
और एक ऐसी भूख… जो इंसानी नहीं थी।
> “तुम…”
उसने धीमी, भारी आवाज में कहा,
> “तुम्हें अभी भी समझ नहीं आया… है ना?”
---
राहुल का गला सूख गया।
उसके होंठ काँप रहे थे।
“त… तुम… क्या चाहती हो?”
उसकी आवाज इतनी धीमी थी कि जैसे खुद उसे भी सुनाई नहीं दे रही।
औरत ने हल्का सा सिर झुकाया…
जैसे किसी मासूम सवाल पर मुस्कुरा रही हो।
फिर उसने अपनी आँखें राहुल की आँखों में डाल दीं—
> “तुम्हारा खून…”
---
अतीत की झलक
अचानक—
राहुल का सिर तेज़ी से घूमने लगा।
जैसे कोई उसके दिमाग को तोड़कर अंदर घुस रहा हो।
उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया…
और फिर—
एक नया दृश्य उभरने लगा।
वो अब हवेली में नहीं था।
वो… 1923 में था।
एक पुराना गांव।
चारों तरफ कच्चे घर…
मिट्टी की गंध…
और लोगों की भीड़।
बीच में—
एक औरत खड़ी थी।
उसके हाथ बंधे हुए थे।
उसके कपड़े फटे हुए थे।
बाल बिखरे हुए…
चेहरे पर आँसू…
और आँखों में डर।
लोग उसे घेरकर खड़े थे।
उनकी आवाजें गूंज रही थीं—
“इसे खत्म कर दो!”
“ये अपशगुन है!”
“इसने हमारे जमींदार को फँसाया है!”
औरत रो रही थी…
> “मैंने कुछ नहीं किया…! मैं निर्दोष हूँ…!”
लेकिन भीड़ को सच नहीं चाहिए था।
उन्हें बस… किसी को दोष देना था।
---
भीड़ के बीच से एक आदमी आगे आया।
उसकी चाल में घमंड था।
चेहरे पर कोई भावना नहीं।
वो था—
जमींदार।
उसने औरत की तरफ देखा…
जैसे वो इंसान नहीं, सिर्फ एक चीज़ हो।
और ठंडी आवाज में बोला—
> “इसे कुएँ में डाल दो।”
---
वो रात…
औरत चीखी।
“नहीं! मुझे छोड़ दो!”
लेकिन किसी ने नहीं सुना।
दो आदमी आगे बढ़े।
उन्होंने उसके बाल पकड़ लिए…
उसे घसीटते हुए ले जाने लगे।
उसके नाखून जमीन पर रगड़ खा रहे थे…
उसकी चीखें रात में गूंज रही थीं।
लेकिन गांव…
खामोश था।
उसे कुएँ के पास लाया गया।
पूर्णिमा की रात थी।
चाँद की रोशनी कुएँ के अंदर जा रही थी…
लेकिन नीचे—
सिर्फ अंधेरा था।
गहरा… अंतहीन अंधेरा।
और शायद…
कुछ और भी।
उसने आखिरी बार आसमान की तरफ देखा।
उसकी आँखों में एक सवाल था—
“क्यों?”
और फिर—
उसे धक्का दे दिया गया।
छपाक!
पानी की आवाज गूंजी…
और फिर…
सब कुछ शांत।
--
लेकिन…
वो मरी नहीं।
---
अचानक—
दृश्य टूट गया।
राहुल वापस हवेली में था।
वो जोर-जोर से सांस ले रहा था।
उसका दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि जैसे बाहर आ जाएगा।
“ये… ये सब क्या था…?”
उसकी आवाज कांप रही थी।
औरत ने उसे देखा।
अब उसकी आँखों में पहले से ज्यादा गहराई थी।
> “याद आ गया?”
राहुल चुप था।
उसकी आँखों में डर साफ दिख रहा था।
औरत धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ी।
हर कदम के साथ हवा और ठंडी हो रही थी।
> “तुम्हारे खून में… उसी आदमी का खून है…”
राहुल की आँखें फैल गईं।
“क्या…?”
औरत ने उसकी छाती की तरफ इशारा किया—
> “तुम… उसी जमींदार के वंशज हो…”
---
पहली मौत
उसी समय—
गांव के एक छोटे से घर में…
एक आदमी गहरी नींद में सो रहा था।
बाहर हवा चल रही थी।
दरवाजा धीरे-धीरे हिल रहा था।
क्रीईक…
दरवाजा अपने आप खुल गया।
ठंडी हवा कमरे में भर गई।
आदमी की आँख अचानक खुल गई।
“क… कौन है?”
उसने डरते हुए पूछा।
कोई जवाब नहीं।
सिर्फ अंधेरा।
फिर—
एक साया…
धीरे-धीरे कमरे में दाखिल हुआ।
वो औरत थी।
काली माँ।
उसकी आँखें अंधेरे में चमक रही थीं।
वो आदमी पीछे हटने लगा।
लेकिन उसके पैर जैसे जमीन से चिपक गए थे।
औरत उसके पास आई…
और एक ही झटके में—
उसकी गर्दन पकड़ ली।
उस आदमी की चीख पूरे गांव में गूंज गई।
लेकिन कोई नहीं आया।
कुछ ही पलों में…
सब खत्म।
---
सुबह—
जब गांव वाले वहाँ पहुँचे—
तो वो आदमी जमीन पर पड़ा था।
उसका शरीर सूख चुका था।
चेहरा डर से जड़ा हुआ।
और ऐसा लग रहा था जैसे—
उसके शरीर का सारा खून गायब हो चुका हो।
--
राहुल जमीन पर बैठा था।
उसका दिमाग सुन्न हो चुका था।
विक्रम… जा चुका था।
अब वो अकेला था।
और सच्चाई—
अब उसके सामने थी।
तभी—
काली माँ फिर उसके सामने प्रकट हुई।
इस बार—
वो दूर खड़ी थी।
लेकिन उसकी मौजूदगी पहले से ज्यादा भारी थी।
> “हर पीढ़ी… तुम्हारे खून का हिसाब होगा…”
राहुल ने कांपते हुए पूछा—
“तुम मुझे क्यों नहीं मारती?”
औरत के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।
उसकी आँखें चमक उठीं—
> “क्योंकि…
तुम आखिरी नहीं हो…
तुम शुरुआत हो…”
---
अचानक—
कुएँ की तरफ से एक आवाज आई।
गहरी… डरावनी…
जैसे कोई बहुत नीचे से बुला रहा हो—
> “आओ…”
राहुल और औरत दोनों ने कुएँ की तरफ देखा।
कुएँ के अंदर से लाल रोशनी निकल रही थी।
पहले से ज्यादा तेज।
जैसे कुछ… जाग चुका हो।
राहुल को महसूस हुआ—
उसका शरीर खुद-ब-खुद आगे बढ़ रहा है।
वो रोकना चाहता था…
लेकिन नहीं रोक पा रहा था।
हर कदम के साथ—
वो कुएँ के करीब जा रहा था।
औरत मुस्कुरा रही थी।
> “समय आ गया है…”
To be Continued..
अगर आपको डरावनी कहानियां पसंद हैं, तो मुझे फॉलो जरूर करें…
क्योंकि असली खौफ अभी बाकी है 😈