Love amidst enmity (Part 9) in Hindi Love Stories by Shivraj Bhokare books and stories PDF | दुश्मनी के दरमियान इश्क (भाग-9)

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दुश्मनी के दरमियान इश्क (भाग-9)

Part 9: दूरियाँ जो पास ले आईं

कुछ वादे ऐसे होते हैं…
जो निभाए जाते हैं, मगर जीने नहीं देते।

उस रात के बाद सब कुछ बदल गया था।
कबीर और Myra… दोनों अपने-अपने रास्तों पर लौट गए थे।
मगर दिल… दिल वहीं अटका हुआ था, उसी मोड़ पर जहाँ उन्होंने एक-दूसरे को खो दिया था।
---

तीन दिन बीत चुके थे।

कबीर ने उस गली का रुख नहीं किया।
ना ही Myra ने कोई कोशिश की।

मगर दोनों के बीच जो खामोशी थी…
वो किसी चीख से कम नहीं थी।

कबीर अपने कमरे में था।

फोन उसके सामने पड़ा था…
मगर वो उसे छू भी नहीं रहा था।

उसके दिमाग में सिर्फ एक बात गूंज रही थी—

“मत आना अब… कभी नहीं…”

उसने आँखें बंद कीं।

“Myra…”

नाम उसके होंठों से फिर निकल गया।

उसने खुद से वादा किया था कि वो उसे परेशान नहीं करेगा…
मगर ये वादा हर पल उसे तोड़ रहा था।

“कितना आसान था ना…”
उसने खुद से कहा,
“कह देना कि मत आना…”

मगर उसके लिए ये इतना आसान नहीं था।
---
उधर…

Myra अपनी खिड़की के पास खड़ी थी।

वही जगह…
जहाँ से वो अक्सर बाहर देखा करती थी।

मगर आज उसकी नजरें खाली थीं।

उसने खुद को रोक लिया था…
मगर उसका दिल नहीं मान रहा था।

“तुम्हें जीना है, कबीर…”

उसने वही शब्द दोहराए।

मगर हर बार ये कहते हुए…
उसका अपना दिल थोड़ा और टूट जाता।

उसने अपने फोन को उठाया।

कबीर का नंबर उसके पास नहीं था…
फिर भी वो स्क्रीन को देखती रही।

जैसे किसी चमत्कार का इंतज़ार कर रही हो।

मगर चमत्कार कहानियों में होते हैं…
हकीकत में नहीं।

---
शाम…

कबीर अपने दोस्त अर्जुन के साथ बैठा था।

“तू ठीक है?”
अर्जुन ने पूछा।

कबीर ने सिर हिलाया।
“हाँ।”

“झूठ मत बोल,” अर्जुन ने सीधा कहा।
“तेरा चेहरा सब बता रहा है।”

कबीर चुप रहा।

कुछ पल बाद…
उसने धीरे से कहा—

“अगर कोई चीज़ तुम्हें खुद से ज्यादा जरूरी लगने लगे…
तो क्या करना चाहिए?”

अर्जुन ने उसे देखा।

“तू प्यार में है,” उसने बिना सोचे कहा।

कबीर हल्का सा मुस्कुराया…
मगर उसकी आँखों में दर्द था।

“और अगर वो प्यार गलत हो?”
उसने पूछा।

अर्जुन कुछ पल चुप रहा।

फिर उसने कहा—

“प्यार कभी गलत नहीं होता…
बस हालात गलत हो सकते हैं।”

कबीर ने उसकी तरफ देखा।

“तो क्या हालात बदल सकते हैं?”
उसने पूछा।

अर्जुन ने कंधे उचकाए।

“अगर तू चाहे… तो शायद,” उसने कहा।

ये शब्द कबीर के दिल में कहीं गहरे उतर गए।

---
उधर…

Myra के घर में माहौल अलग था।

हर तरफ सख्ती थी…
हर कदम पर नजर रखी जा रही थी।

जैसे उसे खुद से भी बचाया जा रहा हो।

विक्रम वर्मा अपने कमरे में बैठे थे।

उनके सामने कुछ लोग खड़े थे।

“वो लड़का फिर से नजर नहीं आना चाहिए,”
उन्होंने सख्त आवाज़ में कहा।

“अगर वो आसपास भी दिखे…”
उन्होंने आगे कहा,
“तो इस बार कोई गलती नहीं होनी चाहिए।”

“जी, साहब,”
आदमियों ने एक साथ कहा।

दरवाज़े के बाहर खड़ी Myra ने ये सब सुन लिया।

उसका दिल एक पल के लिए रुक गया।

“तो ये सब खत्म नहीं हुआ…”
उसने सोचा।

उसने समझ लिया था—
कबीर अब भी खतरे में है।

और ये खतरा खत्म होने वाला नहीं।

---
रात…

बारिश शुरू हो चुकी थी।

शहर की सड़कों पर पानी बह रहा था…
और उसी पानी के साथ जैसे कुछ एहसास भी बह रहे थे।

कबीर अपनी कार में बैठा था।

उसकी नजरें सामने थीं…
मगर उसका मन कहीं और।

“Myra…”

उसने फिर से नाम लिया।

तीन दिन हो गए थे।

तीन दिन… बिना उसे देखे… बिना उसकी आवाज़ सुने।

उसने गहरी सांस ली।

“बस एक बार…”
उसने खुद से कहा।

“बस एक बार देख लूं…”

उसने इंजन स्टार्ट किया।

कार धीरे-धीरे आगे बढ़ी…

और फिर वही रास्ता…
वही गली…

जैसे उसके कदम खुद-ब-खुद उसे वापस वहीं ले जा रहे थे।


---

उधर…

Myra अपने कमरे में थी।

बारिश की आवाज़ खिड़की से टकरा रही थी।

उसने बाहर देखा…

और उसी पल…

उसका दिल जोर से धड़का।

गली के मोड़ पर…
एक कार खड़ी थी।

वो कार…

वो पहचान गई।

“कबीर…”

उसके होंठों से नाम खुद-ब-खुद निकला।

उसकी सांसें तेज़ हो गईं।

“नहीं… उसे नहीं आना चाहिए था…”

मगर दिल…
दिल उसे रोक नहीं पा रहा था।

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गली के उस सन्नाटे में…

कबीर कार से बाहर निकला।

बारिश उसकी शर्ट को भिगो रही थी…
मगर उसे उसकी परवाह नहीं थी।

उसकी नजरें सिर्फ उस दरवाज़े पर थीं।

वही दरवाज़ा…
जहाँ उसने उसे आखिरी बार देखा था।

वो धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

हर कदम…
जैसे उसे उसके करीब ले जा रहा था…
और साथ ही खतरे के भी।

---
खिड़की के पीछे खड़ी Myra…

उसे देख रही थी।

उसका दिल जोर से धड़क रहा था।

“कबीर… मत आओ…”
उसने फुसफुसाया।

मगर उसकी आवाज़ उस तक नहीं पहुंच सकती थी।

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कबीर दरवाज़े के सामने आकर रुक गया।

उसने हाथ उठाया…

दस्तक देने के लिए।

मगर उसी पल…

पीछे से कुछ आवाज़ें आईं।

कदमों की आवाज़।

कबीर ने पलटकर देखा।

अंधेरे में कुछ परछाइयाँ उसकी तरफ बढ़ रही थीं।

उसकी सांसें रुक गईं।

उसे समझ आ गया—

ये जाल है।

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Myra की आँखों में डर भर गया।

“नहीं…”

उसने तुरंत दरवाज़ा खोला…
और बाहर भागी।

“कबीर, भागो!”
उसने पूरी ताकत से चिल्लाया।

कबीर ने उसकी तरफ देखा।

एक पल के लिए उनकी नजरें मिलीं।

और उसी पल…

सब कुछ बदल गया।

अंधेरे में छुपे लोग अब सामने आ चुके थे।

बारिश और तेज़ हो गई।

और उस बारिश में…

एक बार फिर
इश्क और दुश्मनी आमने-सामने खड़े थे।