Love amidst enmity (Part 10) in Hindi Love Stories by Shivraj Bhokare books and stories PDF | दुश्मनी के दरमियान इश्क (भाग-10)

Featured Books
Categories
Share

दुश्मनी के दरमियान इश्क (भाग-10)

Part 10: भागते कदम, पीछा करती मौत

बारिश अब तेज़ हो चुकी थी।
सड़क पर गिरती हर बूंद जैसे किसी आने वाले तूफान की गवाही दे रही थी।

“Myra… भागो!”
कबीर ने जोर से कहा।

मगर इस बार…
वो खुद भी भागने वाला था।

अंधेरे से निकलती परछाइयाँ अब साफ दिखाई दे रही थीं।
चार… पाँच… शायद उससे भी ज्यादा लोग।

सबकी नजरें सिर्फ एक इंसान पर थीं—कबीर।

Myra उसके पास आकर रुक गई।
उसकी सांसें तेज़ थीं, और आँखों में साफ डर।

“तुम यहाँ क्यों आए?”
उसने कांपती हुई आवाज़ में पूछा।

“तुमसे मिलने,”
कबीर ने बिना सोचे जवाब दिया।

“ये वक्त नहीं है—”
Myra कुछ कहती, उससे पहले—

“पकड़ो उसे!”
पीछे से एक आवाज़ गूंजी।

और अगले ही पल…

सब कुछ तेजी से हुआ।

कबीर ने Myra का हाथ पकड़ा।
“चलो!”

दोनों दौड़ पड़े।

बारिश की वजह से सड़क फिसलन भरी थी।
मगर उनके कदम रुकने के लिए नहीं बने थे।

पीछे से आते लोगों की आवाज़ें…
उनके करीब आती जा रही थीं।

“Myra, इस तरफ!”
कबीर ने एक संकरी गली की तरफ इशारा किया।

दोनों उस तरफ मुड़े।

साँसें तेज़…
दिल की धड़कन उससे भी तेज़।

“Myra…”
कबीर ने दौड़ते-दौड़ते कहा,
“तुमने कहा था… कभी नहीं आना…”

Myra ने उसकी तरफ देखा।

“और तुमने कभी मेरी बात मानी है?”
उसने जवाब दिया।

एक पल के लिए…
इस डर के बीच भी, दोनों के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई।

मगर ये पल ज्यादा देर नहीं टिक पाया।

पीछे से आवाज़ आई—

“वो उधर गए हैं!”

कदमों की आवाज़ फिर तेज़ हो गई।

“तेज़ भागो!”
कबीर ने कहा।

Myra की सांसें जवाब देने लगी थीं।

“मैं… और नहीं…”
वो लड़खड़ाई।

कबीर तुरंत रुका।
उसने उसे संभाला।

“सुनो,”
उसने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,
“हिम्मत मत हारो… अभी नहीं।”

Myra ने सिर हिलाया।

दोनों फिर दौड़े।

आगे एक बंद रास्ता था।

कबीर रुक गया।

“Myra…”
उसने चारों तरफ देखा।

“अब?”
Myra की आवाज़ में घबराहट थी।

कबीर ने दीवार की तरफ देखा।

“उपर चढ़ना होगा,”
उसने कहा।

“Myra, मैं पहले चढ़ता हूँ… फिर तुम्हें ऊपर खींच लूंगा।”

वो दीवार पर चढ़ने लगा।

बारिश से दीवार फिसल रही थी…
मगर उसने खुद को ऊपर खींच लिया।

“हाथ दो!”
उसने नीचे झुककर कहा।

Myra ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

कबीर ने उसे कसकर पकड़ा…
और पूरी ताकत से उसे ऊपर खींच लिया।

दोनों दीवार के दूसरी तरफ कूदे।

जमीन पर गिरते ही…
कुछ सेकंड तक बस उनकी सांसों की आवाज़ थी।

“Myra… तुम ठीक हो?”
कबीर ने पूछा।

“हाँ…”
उसने मुश्किल से कहा।

मगर राहत ज्यादा देर नहीं टिक पाई।

दीवार के उस पार से आवाज़ आई—

“इधर हैं वो!”

कबीर ने दाँत भींच लिए।

“ये लोग पीछे नहीं हटेंगे,”
उसने कहा।

Myra ने उसकी तरफ देखा।

“क्यों?”
उसने पूछा,
“आखिर क्यों इतनी नफरत है?”

कबीर कुछ पल चुप रहा।

फिर उसने कहा—

“क्योंकि ये सिर्फ हमारी कहानी नहीं है…
ये दो खानदानों की कहानी है।”

Myra की आँखों में दर्द उभर आया।

“तो क्या हम… सिर्फ एक कहानी बनकर रह जाएंगे?”
उसने पूछा।

कबीर ने उसकी तरफ देखा।

“नहीं,”
उसने धीरे से कहा,
“हम अपनी कहानी खुद लिखेंगे।”

Myra की सांसें थम सी गईं।

मगर वक्त उनके साथ नहीं था।

“चलो!”
कबीर ने उसका हाथ पकड़ा।

दोनों फिर दौड़ पड़े।


---

कुछ देर बाद…

दोनों एक सुनसान सड़क पर आकर रुके।

बारिश अब भी हो रही थी…
मगर थोड़ी हल्की।

“Myra…”
कबीर ने उसकी तरफ देखा।

“अब क्या?”
उसने पूछा।

Myra चुप रही।

फिर धीरे से बोली—

“हम ऐसे कब तक भागेंगे?”

कबीर के पास इस सवाल का जवाब नहीं था।

“जब तक रास्ता नहीं मिल जाता,”
उसने कहा।

Myra ने सिर हिलाया।

“या जब तक हम हार नहीं जाते…”
उसने धीमे से कहा।

कबीर ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

“हम हारेंगे नहीं,”
उसने सख्ती से कहा।

Myra ने उसकी आँखों में देखा।

“हर कहानी जीत के साथ खत्म नहीं होती, कबीर,”
उसने कहा।

कबीर कुछ बोलता…
उससे पहले—

दूर से गाड़ियों की हेडलाइट्स दिखाई दीं।

दोनों ने एक साथ उस तरफ देखा।

Myra का चेहरा सफेद पड़ गया।

“वो लोग…”
उसने फुसफुसाया।

कबीर ने उसकी तरफ देखा।

फिर उन हेडलाइट्स की तरफ।

और उसी पल…

उसे समझ आ गया—

ये पीछा अभी खत्म नहीं हुआ है।

बल्कि…

अभी असली लड़ाई शुरू हुई है।