हम लोग अनुवाई जी के साथ चल दिए। जहाँ खाना बँट रहा था, उस स्थान पर पहुँचे तो देखा कि खाना लेने के लिए एक लंबी लाइन लगी थी।
वहाँ लोग एक-एक करके खाना निकाल रहे थे। बहुत से पकवान बनाकर रखे गए थे और उनकी खुशबू हमें अपनी ओर खींच रही थी। प्रियांशी ने धीरे से अंकिता से कहा— "अंकिता, हमें भी लाइन में लगना होगा। हाथों में प्लेट लेकर चलते हुए खाना होगा, लेकिन ऐसे खाने में मज़ा बहुत आएगा।"
मस्ती भरे अंदाज़ में अंकिता बोली— "हाँ भाभी! आज तो यहाँ खाने में मज़ा आएगा ही। चलो, जल्दी से चलकर खाना ले लेते हैं, वरना खत्म हो जाएगा। मुझे बहुत तेज़ भूख भी लगी है।"
प्रियांशी उसे टोकते हुए बोली— "हट पगली! अपनी भूख पर थोड़ा काबू रख, नहीं तो लोग कहेंगे कि यह लड़की कितनी भुक्कड़ है।"
अंकिता ने तपाक से जवाब दिया— "तो क्या हुआ? भूख लगी है तभी तो लाइन में लगे हैं, वरना क्यों लगते?" अंकिता की ये मासूम बातें सुनकर हम सब हँसने लगे।
तभी हमने देखा कि अनुवाई जी एक दूसरी लाइन में लगे थे और उन्हें जल्दी खाना मिल गया था। वे हमारे पास आए और बोले— "क्यों बेटी, तुम्हें अभी तक खाना नहीं मिला?"
अंकिता बोली— "नहीं भंते जी, अभी हमें खाना नहीं मिला है, अभी तो हम लोग लाइन में ही लगे हैं।"
अनुवाई जी मुस्कुराते हुए बोले— "तुम्हें तो बहुत तेज़ भूख लगी थी... आओ इधर अपनी थाली लाओ और मेरे खाने में से थोड़ा हिस्सा ले लो।"
अंकिता आदर के साथ बोली— "नहीं भंते जी, आप खाना खाइए। मुझे जब खाना मिलेगा, तब मैं खा लूँगी। यह तो सिर्फ आपके लिए ही होगा। अगर मैं आपके हिस्से का खाऊँगी, तो आपके लिए कम पड़ जाएगा।"
अनुवाई जी मुस्कुराते हुए बोले— "नहीं बेटी, कम नहीं होगा। आओ इधर अपनी थाली लेकर आओ।"
अंकिता संकोच करते हुए उनके करीब अपनी थाली ले गई। अनुवाई जी ने अपने भिक्षा-पात्र (दीक्षा पात्र) से खाना निकालकर अंकिता की थाली में डाल दिया। उनके आशीर्वाद स्वरूप मिले उस भोजन को पाकर अंकिता के चेहरे पर संतोष आ गया।
कुछ पल के बाद हम दोनों को भी खाना मिल गया और हम सब आराम से बैठकर खाना खाने लगे।
अंकिता ने प्रियांशी की तरफ शरारत भरा इशारा करते हुए मस्ती में कहा— "क्यों भाभी! फ्री का खाना खाने में मज़ा आ रहा है न? वह भी बिना बनाए और बिल्कुल पका-पकाया!"
प्रियांशी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया— "क्यों नहीं! मज़ा तो आएगा ही, जब बिना मेहनत किए ऐसा स्वादिष्ट खाना मिले।" इसी तरह हम सब हँसी-मजाक करते हुए खाना खाते रहे।
खाना खत्म करने के बाद हमने घूमने की योजना बनाई। मैंने कहा— "क्यों अंकिता, प्रियांशी! अब तो हम लोगों ने खाना खा लिया है, अब घूमेंगे या फिर आराम करेंगे?"
अंकिता सुस्ती से बोली— "भैया, मैंने कुछ ज़्यादा ही खाना खा लिया है। थोड़ा आराम करके फिर घूमने चलेंगे।"
इस पर प्रियांशी मस्ती भरे अंदाज़ में बोल पड़ी— "थोड़ा कम नहीं खा सकती थी तुम? फ्री का खाना देखा नहीं कि टूट पड़ीं!"
अंकिता ने तपाक से कहा— "अब मैं क्या करूँ? खाना इतना स्वादिष्ट बना था कि खा लिया। इसमें मेरी क्या गलती? पेट में ही तो भरा है, पॉकेट में तो नहीं भरा न!" यह सुनकर हम सब ठहाका मारकर हँसने लगे।
पास ही एक अतिथि कक्ष था, हम वहाँ गए और कुछ मिनट आराम किया। फिर हम सब घूमने के लिए निकल पड़े।
अनुवाई जी बोले— "चलिए, अब मैं आप लोगों को सम्राट अशोक द्वारा बनवाई गई ऐतिहासिक इमारतें दिखाता हूँ।"
हम सब उनके पीछे-पीछे चल दिए। कुछ ही दूर चलने पर एक विशाल और भव्य संरचना हमारे सामने थी। धूप की सुनहरी किरणें उस प्राचीन पत्थर पर पड़कर उसे और भी दिव्य बना रही थीं।
अनुवाई जी एक ऊँचे स्तंभ की ओर इशारा करते हुए बोले— "बच्चों, यह देखो! यह सम्राट अशोक का बनवाया हुआ वह स्तंभ है, जो शांति और अहिंसा का प्रतीक है। कलिंग युद्ध के बाद जब अशोक का हृदय परिवर्तन हुआ, तब उन्होंने इसी पावन धरती को अपनी श्रद्धा अर्पित करने के लिए चुना था।"
अंकिता, जो अब तक खाने की मस्ती में थी, अचानक गंभीर हो गई। उसने बड़े ध्यान से उस स्तंभ की नक्काशी को देखा और पूछा— "भंते जी, क्या अशोक राजा खुद यहाँ आए थे? क्या उन्होंने भी इसी मिट्टी को छुआ था?"
अनुवाई जी मुस्कुराए और बोले— "हाँ बेटी! सम्राट अशोक ने यहाँ न केवल इस स्तंभ का निर्माण करवाया, बल्कि उस पवित्र 'वज्रासन' की स्थापना भी की, जिसे 'डायमंड थ्रोन' कहा जाता है। वह ठीक उस महाबोधि वृक्ष के नीचे है जहाँ सिद्धार्थ को बुद्धत्व प्राप्त हुआ था।"
प्रियांशी ने धीरे से कहा— "सोचकर ही कितना अद्भुत लगता है कि हज़ारों साल पहले एक शक्तिशाली सम्राट यहाँ हाथ जोड़कर बैठा होगा।"
हम लोग आगे बढ़े तो अनुवाई जी ने हमें वह पत्थर का आसन (वज्रासन) दिखाया। अंकिता ने अपने कान के पास हाथ ले जाकर मस्ती भरे अंदाज़ में कहा— "भैया, मुझे तो लग रहा है जैसे इन पत्थरों से अभी भी राजाओं के घोड़ों की टापें और बुद्ध की शांति वाली आवाज़ आ रही है।"
उसकी यह बात सुनकर हम सबकी गंभीरता हंसी में बदल गई। अनुवाई जी ने भी अंकिता के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। फिर हम उस मुख्य मंदिर की ओर बढ़े जिसकी नींव सम्राट अशोक ने ही रखी थी। वहाँ की हर दीवार और हर मूर्ति जैसे इतिहास की कोई अनकही कहानी सुना रही थी।
अनुवाई जी हमें मंदिर के बाईं ओर एक तालाब के पास ले गए, जिसे 'मुचलिंद सरोवर' कहा जाता है। नीले पानी के बीचों-बीच भगवान बुद्ध की एक मूर्ति थी, जिसके ऊपर एक विशाल नाग का फन फैला हुआ था।
अनुवाई जी ने बताना शुरू किया— "जब बुद्ध यहाँ ध्यान में लीन थे, तब एक भयानक आंधी-तूफान आया। तब नागराज मुचलिंद ने उन्हें सुरक्षित रखने के लिए अपना फन उनके ऊपर फैला दिया था। सम्राट अशोक ने इस सरोवर की पवित्रता को बनाए रखने के लिए यहाँ विशेष कार्य करवाए थे।"
अंकिता ने अपनी आँखें बड़ी करते हुए कहा— "बाप रे! इतना बड़ा सांप? भैया, अगर मैं बुद्ध की जगह होती तो ज्ञान छोड़कर पहले भाग खड़ी होती!"
प्रियांशी ने उसे कोहनी मारते हुए कहा— "चुप कर! हर जगह अपनी शरारत शुरू कर देती है। देख कितनी शांति है यहाँ।"
तभी अनुवाई जी ने एक और गहरी बात कही— "बच्चों, देखो उस झंडे को। इसमें जो रंग हैं, वे बुद्ध के शरीर से निकली आभा (रश्मियों) के प्रतीक हैं। अशोक ने इस जगह को सिर्फ पत्थरों से नहीं, बल्कि बुद्ध के इन्हीं उपदेशों से सजाया था।"
हम सब श्रद्धा से उस झंडे और सरोवर को देख रहे थे। बोधगया सिर्फ घूमने की जगह नहीं थी, यह तो खुद को जानने की पाठशाला लग रही थी।
"हम सरोवर की शांति में खोए ही थे कि तभी मंदिर के पुराने पत्थरों के पीछे से एक अजीब सी सरसराहट सुनाई दी। अनुवाई जी के चेहरे पर अचानक गंभीरता आ गई। वे गहरी सोच में डूब गए कि आखिर यह क्या है, लेकिन उनके चेहरे पर डर का नामोनिशान नहीं था।
उन्होंने अपनी उंगली होंठों पर रखकर हमें चुप रहने का इशारा किया। प्रियांशी का हाथ डर के मारे बुरी तरह कांपने लगा और अंकिता की सारी मस्ती पल भर में गायब हो गई। सन्नाटे में हमारी धड़कनें साफ सुनी जा सकती थीं।
मैंने तुरंत प्रियांशी का हाथ अपने हाथ में ले लिया। वह थरथरा रही थी। मैंने उसकी आँखों में सीधे देखते हुए हौले से कहा— 'डरो मत पगली, कुछ नहीं होगा। मैं साथ हूँ न!' मेरी बात सुनकर उसकी आँखों में थोड़ा भरोसा लौटा, लेकिन डर अब भी हवा में तैर रहा था।
तभी अनुवाई जी ने पत्थरों की एक दरार की ओर इशारा किया और फुसफुसाते हुए कहा— 'वहाँ देखो... वह क्या है?'"