Honey Doll - Ranjan Kumar Desai (70) in Hindi Love Stories by Ramesh Desai books and stories PDF | शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (70)

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शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (70)

               

                 शहद की गुड़िया - प्रकरण 70

          "अहमदाबाद पहुंचते पहुंचते सुबह हो गई थी. हमारे पहुंचने तक उन लोगो को पिताजी को कम से कम 40 घंटे मृत देह को घर में रखना पड़ा था. उस वजह से क़ोई दो रात सो नहीं पाया था."

          " पिताजी के चचेरे भाई ने उन्हें सवाल किया था." 

         " आप को फ्लाइट में आ जाना चाहिये था.. "

          " उस की बात सही थी. ऐसी परिस्थिति में हवाई जहाज ही विकल्प बचा था . जिसे उन की तात्कालिन आर्थिक परिस्थिति इजाजत नहीं दे रही थी.

        " उस पर उन्होंने खुलासा किया था. "

         "हम लोग कल हीं यात्रा करके लौटे है. काफ़ी खर्चा भी हुआ हैं. मेरे पास छह लोगो की एयर टिकट खरीदने के पैसे नहीं थे. "

          " लेकिन मृतदेह को कितना समय घर में रखा जा सकता हैं? "

         " कहते हुए उस के  चेहरे पार नाराजगी के भाव उमड़ आये थे."

         " उस पर दादू ने कहां था.

         " इन स्थिति में आप लोगो के पास उन का अग्नि दाह कर देना एक हीं विकल्प बचा था.  इस परिस्थिति में  आप ने उन का अग्नि दाह लेना था. हम लोग आप के हालात अच्छी तरह समझते हैं, हम आप को कुछ नहीं कहते. "

         "उन्होंने  तहेदिल से उन की माफ़ी मांगी थी.  और तुरंत अग्निदाह की रस्मे निभाई थी."

         " उस वक़्त दादू के सामने एक सच्चाई आई थी.

          " नीला बुआ जो उन की हम उम्र थी ऊस की आँख ख़राब हो गई थी. वह बिल्कुल देख नहीं पाती थी."

         " उन लोगो ने पिताजी के लिये काफ़ी मेहनत की थी. काफ़ी खर्चा भी किया था. वह जिम्मेदारी दादू की थी. उस वक़्त उन के पास पैसे नहीं थे. उन्होंने मुंबई जाकर भेज देने की बात की थी तो चचेरे भाई ने पैसे लेने से इन्कार कर दिया था.

         "  दादू ने पिताजी को मना की थी फिर भी वह दिवाली के बहाने अपने सभी दोस्त और रिश्तेदारों को मिलने ना जाने कहाँ कहाँ  पहुंच गये थे. सब के घरों में जाकर उन्हों ने दिवाली में बनी,  बाहर से लाई चीजों का . सेवन किया था.उस वजह से एसिडिटी बढ़ गई थी और उन्हें एटेक आया था."

       " और श्री नाथजी की छबि के सामने उन्हों ने प्राण त्याग दिये थे. "

        "अंकल को भगवान में अटूट श्रद्धा थी. उन के घर में दीवार पर श्री नाथजी की बड़ी छबि सदाकाल सब टांगी रहती थी, जिस ने उन्हें भगवान की प्रतीति कराई थी."

        " वह लोग उसी दिन शाम को वही मेटाडोर में मुंबई वापस लौट आये थे. रास्ते में पुरानी यादें उन का पीछा कर रही थी."

         "उन का एक जमाने में अच्छा खासा कारोबार था. उन को पैसे की क़ोई कमी नहीं थी.. उन का महमदाबाद से कुछ मिलो की दुरी पर एक छोटे से गांव में मकान भी था. "

          " निवृत्ति के बाद उन्हों ने गांव की सेवा के लिये छोटा सा पोस्ट ओफिस भी खोला था.. गांव में एक पोस्ट कार्ड, लिफाफा, स्टेम्प इत्यादि पोस्टल सामग्री वहाँ उपलब्ध थी. किसी को कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं थी. "

       "  पिछले दिनों में मैं अंकल को पोस्ट ओफिस खोलने की इजाजत मिली थी. और उन्हो ने घर में हीं पोस्ट ओफिस खोला था."

        " दिन भर जमा हुए पोस्ट कार्ड एवं लिफाफा एकत्रित कर के वह शाम को बस में मेहमदाबाद पोस्ट ओफिस पहुंचाने के लिये ड्राइवर के हाथों में दे देते थे..फिर वहाँ से टपाल का वितरण होता था. "

       "और दादू उन्हें मदद करते थे. "

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          " एक बार अपने पिताजी की तरह दादू को एसिडिटी हो गई थी जिस की वजह से छाती में दर्द  हुआ था. वह खुद के लिये चिंता का विषय बन गया था.."

        " तुरंत अस्पताल में चेक करवाया था. डोक्टर ने एन्जॉग्राफी करने की सलाह दी थी. और दादू वह भी करवाई थी. "

       " उन के खून में 60/70 प्रतिशत ब्लोक्स नजर आये थे. डोक्टर ने एन्जॉप्लास्ट या ओपन हार्ट सर्जरी करने की सलाह दी थी. और उस के लिये 4/5 लाख का खर्च बताया था, जो दादू के बस की बात नहीं थी. और दूसरी बात.. इतना खर्चा करने क़े बाद पूरी तरह ठीक होने की क़ोई गारंटी भी नहीं थी."

       " उस समय गरिमा ने मुझे आयुर्वेदिक इलाज का  विकल्प सुझाया था."

      " और फ़ौरन वह करने को तैयार हो गये थे. "

       "लेकिन दूसरे ही पल मैं गरिमा की बात सुनकर सब लोग स्तब्ध हो गये थे. "

       " दस दिवस तक केवल मुंग क़े पानी पर रहना पड़ेगा.. "

       "जानकर दादू ने तुरंत अपने आप को इस इलाज क़े लिये तैयार कर लिया था."

        " यह एक ऐसा कठिन उपचार था जो कोई करने को तैयार नहीं था और जिस ने किया ऊस ने बीच में छोड़ दिया था.

           " दादू को लेडी डोक्टर ने सवाल किया था. आप को मालूम हैं क्या करना हैं? दादू सब कुछ जानते थे फिर भी अंजान बनकर सवाल किया था. '"

            " क्या करना हैं? "

             " दस दिन केवल मुंग के पानी पर रहना होगा. "

              " ऊस वक़्त दादू ने बड़े जोश में आकर जवाब दिया था. क्यों नहीं? मेरे लिये करना हैं, मैं अवश्य करूंगा. "         

             " और उन का उपचार शुरू हो गया था. तीन चार दिन तो कुछ तकलीफ महसूस नहीं हुई. बाद में उन को चक्कर आने लगे थे, कमजोरी भी आ गई थी. वह चलने फिरने की स्थिति में नहीं थे. फिर भी उन्होंने दस दिन केवल मुंग के पानी पर निकालकर बडी सिद्धि हांसिल की थी. "

              " दस दिन के बाद उन्हें मुंग के पानी में चावल के दाने दिये गये थे. यह सिलसिला भी दस दिवस जारी था. "

                " बाद में उन्हें थोड़ा थोड़ा खाने की इजाजत मिली थी. लेकिन यह उपचार से ऊस के भीतर खून में जो ब्लोक थे वह बिल्कुल निकल गये. ऊस बात को बीस से अधिक साल का समय बीत गया हैं, उन्हें कोई दवा नहीं लेनी पड़ी हैं वह बिल्कुल नॉर्मल हो गये थे.

                      0000000000000    ( क्रमशः)