Honey Doll - Ranjan Kumar Desai (77) in Hindi Love Stories by Ramesh Desai books and stories PDF | शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (77)

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शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (77)

                

                 शहद की गुड़िया -  प्रकरण- 77

          " क्षितिज शारीरिक तौर पर अपाहिज था, लेकिन घर के नकारात्मक माहौल ने उसे मानसिक रूप से उसे अपाहिज  बना दिया था. "

           "उस की हालत बिगाड़ने में दादू के पिताजी ओर खुद ऊस की माता जिम्मेदार थे. दोनों  बेसमज प्यार ने एक अहम भूमिका निभाई थी. उस की कमजोरी को वजह बनाकर उसे कुछ करने  नहीं दिया था ओर उस की इस तकलीफ को ईश्वरीय देन समझ कर स्वीकार लिया था."

          "  बच्चो के भविष्य के लिये मा का प्यार जरूरी होता हैं, लेकिन बेसमज प्यार नुकसान कर्ता होता हैं. इस बात का आरती और दादू के पिताजी उदाहरण थे. "

           " दादू की जिंदगी में ना जाने कितनी मुसीबते आई थी,  पहाड़ टूट पड़ा था, लेकिन वह कभी टूटे नहीं थे नाहिम्मत नहीं हुए थे. उस समय फ़िल्म का यह गीत दादू को प्रोत्साहित करता था."

            वो कौन सी मुश्किल हैं

            जो न हो सके ना आसान     

             हिम्मत हैं तेरे साथ (2)

             तो फिर साथ हैं भगवान

           " अंध स्कूल में एक ही बात सिखाई जाती थी.

            " अपनी कमजोरी का स्वीकार करो. लोगो को जानने दो.. ऐसा करने से लोग तुम्हारी मदद करेंगे.. "

             "  लेकिन क्षितिज ने  वही भूल की थी. उस ने अपनी कमजोर छिपाने की बहुत बड़ी गलती की थी.जिस की वजह के कोई चाहकर भी ऊस की मदद नहीं कर सकता था."

             "अंधे लुले आदमी चाहे तो सब कुछ कर सकता हैं. लेकिन क्षितिज ने तो कभी इस दिशा में सोचा नहीं था. बहुत कुछ जानने का दावा करने वाला क्षितिज इतनी छोटी बात मानने, समझने को तैयार नहीं था. अब कौन उस की मदद कर सकता था? "

             " ईश्वर पर भरोसा रखना निहायत जरूरी होता हैं.  वह पंगु लोगो को पहाड़ चढ़ने में मदद करता हैं, मुक लोगो को बोलने के लिये सक्षम करता हैं. "

              "लेकिन क्षितिज को किसी चीज में विश्वास नहीं था."

               " अपने बेटे के लिये दादू ने क़ोई कसर नहीं छोड़ी थी. लेकिन उस का क़ोई मतलब नहीं रहा था. उस में कुछ भी करने की चाहत नहीं थी तो क्या हो सकता था?"

               " ज़ब वह देख सकता था, तब उस ने काफ़ी फिल्मे देखी थी. जिस में ' दोस्ती' फ़िल्म शामिल थी.. यह दो दोस्तों की कहानी थी, जिस में एक लंगड़ा था ओर दूसरा अंध.."

                " मानो भगवान ने दोनों को मिलाया था.. एक माउथ ओर्गन बजाता था ओर दूसरा गाना..गाता था. उस की जुगल जोड़ी रास्ते में गाना गाते थे, और लोगो का मनोरंजन करते थे. वह भीख नहीं मांगते थे लेकिन लोग ख़ुश होकर उन्हें पैसे दे जाते थे."

               " अंधे लडके की अपनी बहन होती हैं. "

                "जो एक अस्पताल में नर्स का काम करती थी."

                 "वह एक बार अपने भाई को रास्ते में भिखारी की तरह गाता हुआ देख लेती हैं, ओर वह नाराज हो जाती हैं.. अपने भाई को  मिले बिना ही चली जाती हैं. उस वक़्त उस का एक दोस्त था. वह उसे समजाता हैं ओर सालो बाद भाई बहन का मिलाप होता हैं.."

        ' चाहूंगा मैं तुझे साँझ सवेरे   

          फिर भी कभी अब नाम को तेरे   

         आवाज मैं नहीं दूंगा... (2)

       " यह गाना बहुत ही मशहूर हो गया था.. मोहम्मद रफ़ी को उस के  लिये अवार्ड्स भी मिले थे. "

        " अंधे की भूमिका नये लडके सुधीर कुमार निभाई की थी ओर लंगड़े की भूमिका सुशील कुमार,   जिस ने ' धुल का फूल' ओर 'काला बाजार ' फ़िल्म में काम किया था.  सुधीर कुमार ने बाद मे संत ज्ञानेश्वर फ़िल्म में भी काम किया था."

         " कई मुदत के बाद एक संस्था ने ' दोस्ती' फ़िल्म का खास शो आयोजित किया था. उस वक़्त सुशील कुमार को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया था. उस वक़्त दादू को उस से मिलने का मौका मिला था. उन्होंने ने उस के साथ हाथ मिलाया था ओर अभिनन्दन भी दिया था. उस वक़्त बडी मा उन के साथ थी. उन्हे इस फ़िल्म का पास मिला था. और वह उन के साथ दोबारा यह फ़िल्म देखने गये थे. उन्होंने उस की सराहना की थी."

       "नसीब ने दादू को इस फ़िल्म का शूटिंग देखने का भी मौका प्रदान किया था."

       " एक मैदान में फ़िल्म का एक गीत फ़रमाया गया था."

                  क़ोई ज़ब राह ना पाये       

                  मेरे संग आये, 

                   पग पग दीप जलाये

                  मेरी दोस्ती मेरा प्यार

         " दोस्ती के नाम बहुत बड़ा मेसेज गीत के जरिये दिया गया था."

              दोनों के हैं रूप हजार         

              कहीं मीरा कहीं घनश्याम         

              दोस्ती का नहीं क़ोई धाम         

               क़ोई कहीं दूर ना जाये       

               कोई मेरे संग आये, 

               मेरी दोस्ती मेरा प्यार     

         " यह फ़िल्म रिलीज हुई उस दौरान कोलेज में दादू के नये दोस्त बने थे. इस में एक के साथ उन्हें गहरी दोस्ती होने का एहसास हुआ था.."

         " ओर दोनों उसे निभाया था. लेकिन उस में एक ही दिक्कत थी. ऊस लडके का नाम मनिष था वह दादू की  सफलता से नाखुश हो जाता था, जिस ने दोस्ती के रिश्ते को आग लगाई थी. जोगानुजोग उन दोनो का जन्म दिन भी एक ही दिन आता था."

        " उसे एक रिश्ते का  प्रस्ताव आया था. उस ने लड़की को देखा भी था और उसे नापसंद कर दिया था. बाद में क्या हुआ? वह लड़की को पसंद करने लगा था, दोनो मिलने लग गये थे और दोनो की शादी भी हो गई थी. "

           "दादू  गरिमा से बाते करते थे . यह भी उसे औऱ दूसरे लडके को पसंद नहीं था. "

            " उन्हें मनिष उसी लडके की बहन पूजा से प्यार हो गया था, जिस की सगाई हो गई थी."

          प्यार किया नहीं जाता, हो जाता हैं

           एक फ़िल्म में यह गीत भी था.

           " उस  के ससुराल वाले भी दादू पहचानते थे.  उस का मंगेतर  भी उन्हें जानता था. उन दोनो के बीच बातचीत का सिलसिला जारी हो गया था. उस के मात पिता भी दादू  को पहचानते थे."

        " पूजा दादू को ज्यादा सन्मान देती थी, उन की बहुत तारीफ करती रहती थी, उन्हें स्कोलर भी कहती थी, जिस से दादू काफ़ी प्रभावित हो गये थे. यकायक उन का दिल पर पूजा पर आ गया था. वह शायद आकर्षण था जिसे दादू ने प्रेम समजकर, उसे मिलकर बात करने की कोशिश की थी, तब मानो एक अनजान आदमी की तरह उस ने दादू पर अविश्वास कर के उन को   मिलने से इनकार कर दिया था."

           " दादू के दिल में कोई पाप नहीं था. उन्होंने पूजा को लाइब्रेरी में बुलाया था लेकिन ऊस ने फट से इन्कार कर के दादू को झटका दिया था "

            " इन लम्हों में दादू यह मानने पर विवश हुए थे. था . किसी ने अनन्या के साथ उन के रिश्ते को लेकर पूजा को भड़काया था. "

             " दादू ने अपने दोस्त के सामने अपने प्रेम का इकरार कर लिया था, उस को बहन बनाकर राखी बंधवाई थी."

             "  घर में उस की दो चचेरी बहने रहती थी. दादू का सब से  बातचीत का रिश्ता था. वह केवल पूजा से राखी बंधवाएगे तो वह लोग क्या सोचेंगे? इस ख्याल से उन्होंने तीनो से राखी बंधवाई थी. औऱ उस के घर जाना कम कर दिया था. वह किसी से खुलकर बाते नहीं कर पाते थे. "

             "प्यार के मुआमले में ईश्वर ने मानो उन के साथ अन्याय किया था. उन के नसीब में शायद वह प्यार लिखना भूल गया था. यह सोचकर वह दुखी होते थे. लेकिन आगे जाकर बहुत सारी लड़कियों और औरत का प्यार मिला था. "

      

                    00000000000   ( क्रमशः )