Shrapit ek Prem Kahaani - 69 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 69

Featured Books
Categories
Share

श्रापित एक प्रेम कहानी - 69

वह इतना तेजी से घुम रहा था के उसके घुमने से हवा मे सांय सांय जैसी आवाज आने लगता है और फिर वो खोपड़ी अचानक से रुक जाता है और कुंम्भन के मुख के पास आकर जोर जोर से खोफनाक हसी से हंसने लगता है और बोलने लगता है। 

> हा हा हा हा ....! महाराज कुंम्भन की सेवा मे नारंग देत्य प्रस्तुत है मेरे मालिक ! क्या हुआ मेरे मालिक ! आपने मुझे क्यो याद किया ? आप मुझे सिघ्र ही बताए मैं आपका सेवा करने के लिए व्याकुल हो रहा हूँ मालिक । बताईए मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ । 

नारंग की बात सुनकर कुंम्भन कहता है--

> हे नारंग देत्य । तुम तो जानते हो के जब भी मैं किसी बड़ी दुविधा या विपत्ति मे होता हूँ तो मैं तुम्हे ही 
सहायता के लिए बुलाता हूँ । हे नारंग इस समय मैं बहुत बड़ी संकट मे हूँ जिसके लिए मैने तुम्हे यहां पर बुलाया है। और मुझे पूर्ण ज्ञात है के तुम मुझे इस विपदा से जरुर बाहर निकालोगे। 

कुंम्भन की बात पर नारंग कहता है --

> आपने मुझे इस योग्य समझा इसके लिए मैं आपका आभार व्यक्त करता हूँ मेरे मालिक । अब बताईए के आपने मुझे किस कारण से यहां बुलाया है। 

कुंम्भन नारंग को कुम्भनी और मणी से जुड़ी सारी बात बताया है। जिसे सुनकर नारंग कहता है--

> आप चिंता ना करो मालिक मैं उस दुष्ट और मणी को सिघ्र ही खोज निकालुंगा। और दोनो को सिघ्र ही 
आपके चरनो मे डाल दुगां । अब मुझे आज्ञा दिजिए महाराज के मैं सिघ्र ही उस दुष्ट और मणी को आपके समक्ष आपके चरनो मे ला सकुं । 

कुम्भन नारंग से कहता है --

> मुझे तुम पर पूर्ण विश्वास है नारंग । जाओ और सीघ्र सफल होकर लौटो । 

कुंम्भन के इतना कहने पर मानव खोपड़ी के अंदर नारंग जोर जोर से हंसने लगता है । 

>> हा हाह हा हा। 

और मानव खोपड़ी उस यज्ञ कुण्ड के चारो और घुमने लगता उस खोपड़ी का हसी इतना भयंकर था के उसे दैखकर किसी का भी रूह कांप उठे फिर अचानक खोपड़ी से हंसी की आवाज आना बंद हो जाता है और वो मानव खोपड़ी फिर से जिस जगह पर था उसी जगह पर वापस आ जाता है। 

कुम्भन दोबारा से यज्ञ मे आहुती देने लग जाता है। तभी वहां पर मातंक और त्रिजला भी आ जाता है।
मांतक और त्रिजला अपने पक्षी रुप से वापस अपनी देत्य रुप मे आ जाती है। मांतक और त्रिजला को दैखकर कुंम्भन के मुख पर एक हल्की मुस्कान आ जाती है और वे यञ कुण्ड से उठ कर मांतक के पास आ जाता है और कहता है --

.
> आ गए तुम मित्र ! मुझे पूर्ण विश्वास था के तुम सिघ्र ही आओगे। बताओ मित्र क्या समाचार लाये हो। मेरी पुत्री का मणी किस दुष्ट के पास है । बताओ मित्र सिघ्र बताओ ।

 कुंम्भन की बात का मातंक के पास कोई उत्तर नही था इसिलिए मातंक अपना सिर झुकाए चुप - चाप खड़ा था । मातंक की चुप्पी दैखकर मातंक गुस्से लाल हो जाता है और कहता है---

> मौन ना रहो मित्र ! मौन ना रहो मैने तुम्हें यहां पर मौन रहने के लिए नही बुलाया है। मेरी पुत्री की प्राण संकट मे है इसिलिए मैने तुम्हे उसकी मणी को ढुंढने के लिए बुलाया है ताकी मैं अपनी पुत्री को पुण: जिवन दान दे सकुं और तुम मौन हो मित्र ?

कुंम्भन की बात सुनकर मातंक कुंम्भन से कहता है--

> मैं मौन नही हूँ मित्र ! मैं मौन नही हूँ ।

> तो फिर बताओ मेरी पुत्री का मणी कहां है। 

कुंम्भन मांतक से पूछता है ।

 मांतक कहता है --

> मित्र ! मैं अपना हर संभव प्रयास कर रहा हूँ । प्रत्येक घर प्रत्येक गली और सभी लोगो से जा जा कर पता लगाने का प्रयत्न किया । परंतु मित्र वो मणी किसके पास है ये अभी तक नही जान पाया। हम दौनो ने सभी के घर उपर बैठकर उनकी बातें भी सुनी परंतु कोई भी मणी के बारे मे बात नही कर रहा था। 

कुंम्भन की आंखे अब गुस्से से लाल हो चुकी थी । कुम्भन मांतक को गुस्से से कहता है--

> मेरी पुत्री की प्राण संकट मे है और तुम लोगो की बातें सुन रहे थे ? अगर ऐसे नही पता कर रहे हो तो पुरे गांव को उठा लो और सबसे पुछो और जिसके पास इसका उत्तर ना हो उसे मृत्यु देकर उसकी लिला समाप्त कर दो । तब जाके वो दुष्ट मानव बताऐगे के मेघ मणी कहां पर है। 

कुंम्भन की बात का जवाब देकर मांतक कहता है--

> नही मित्र ! ये तुम कैसी बात कर रहे हो भुल गए के हमने एक वचन दिया था । के हम फिर कभी इन पृथ्वि वासियों को कष्ट यां हानी नही पहूँचायेगें । अगर हम अपने वचन पर अटल नही रहेगें तो फिर इतने वर्षो से जो शांती सभी लोकों मे फैली है वे फिर से भंग हे जाएगा । 

मांतक अपनी बात को जारी रखते हुए कुंम्भन से कहता है--

> मित्र इस गांव मे कई लोग ऐसे है जो बहुत ही भोले और सिधे है जिन्हें मणी के बारे मे कुछ भी ज्ञात नही वे सब तो निर्दोश है परंतु मित्र कुछ मनुष्य ऐसे भी है जो बहुत स्वाथी और लोभी है और मैने ऐसे ही कुछ मानवो को चिन्हित करके रखा है। कदापी इनमे से ही कोई हो जिसके पास मणी है। 

मांतक की बात सुनकर कुंभ्मन जौर से गर्जता हुआ कहता है--

> अगर ऐसी बात है मित्र तो जाओ और मणी को ढुंढो । जिस किसी के पास भी मेरी पुत्री की मणी है उसे मेरे सामने प्रस्तुत करो। मैं कब से उस दुष्ट को दंण्ड देने के लिए तड़प रहा हूँ ।

कुंम्भन जाकर कुंम्भनी के पास बैठ जाता है और कुंम्भनी की और निराशा भरी आंखो से दैखकर कहता है --

> जिसके कारण मेरी पुत्री की ये दशा हूई है । मैं उसे जिवित नही छोड़ुगां । सर्वर्नाश कर दुगां मैं उसका ! 

मांतक कुंम्भन के पास जाता है और कुंम्भन को उठाकर कहता है--

> मित्र कुंम्भनी मेरी भी पुत्री जैसी है और मुझे भी 
कुंम्भनी को इस दशा मे दैख कर मुझे भी पिड़ा हो रही है। मित्र ! मैं तुम्हें वचन देता हूँ वो चाहे स्वर्ग मे हो या पाताल मे वो कही भी रहे । मैं उसे सिघ्र ही खोज निकालुगां । मुझ-पर भरोसा रखो मित्र । मैं सिघ्र ही वो मणी और उस दुष्ट दौनो को सिघ्र ही खोज निकालुगां। क्योकी मुझे ऐसे ही कुछ मानवो पर संदेह है। जिसके उपर मुझे अपनी नजर रखनी है। 

कुंभ्मन मातंक के कंधे पर अपना हाथ रख कर कहता है--

> मित्र मुझे तुम पर पूर्ण विश्वास है । बस अपनी पूत्री 
प्रेम मे मैं तुमसे दुर्व्यवहार कर बैठा । इसके लिए मुझे क्षमा करना मित्र । 

कुंम्भन के क्षमा मांगने से मांतक कुंम्भन के हाथ के उपर अपना हाथ रखकर कहता है---

> ये क्या कह रहे हो मित्र ! क्षमा क्यों मांग रहे हो। एक मैं तुम्हारी चिंता को समझ सकता हूँ । इसिलिए तुम्हारी बातो का बिल्कुल बुरा नही लगा। बस इसी तरह मुझ-पर अपना विश्वास बनाये रखना ।

 तभी त्रिजला कुंम्भनी के पास आकर बैठ जाती है और कुंम्भन से कहती है--
.> कुंम्भनी की ये दशा कभी मुझे दैखनी होगी इसकी कल्पना तक मैने नही किया था ।

 त्रिजला कुंम्भनी के पास से उठ कर कुम्भन के पास जाती है और कुंम्भन से कहती है --

> परतुं मुझे आपसे एक प्रश्न पूछनी थी। कुंम्भनी की ऐसी दशा थी और आपने हमे इतने वर्ष पूर्व हमे बतायां ! पहले ही क्यो नही बुला लिया ? अगर आपने हमे पहले ही इसकी सुचना दिये होते तो आज तक पुत्री कुंम्भनी हमारे समक्ष जिवित होती । 

कुंम्भन त्रिजला से कहता है--

> कैसे बताता त्रिजला । जब कालदामु ने मुझे सुचना 
दिया के कुम्भनी को किसी मानव ने अपने वश मे कर लिया है और उसे बंधक बना लिया है। ये सुचना मिलते ही मै तत्काल अपने राज्य से यहां इस जंगल मे आ गया और पुत्री कुंम्भनी की खोज करने लगा । मैं इस बात पर हैरान था के एक मानव कुंम्भनी को कैसे बंधक बना सकता है। इतना सौचते सौचते मैं इस जंगल मे आया और अपनी पुत्री कुंम्भनी को ढुंढने लगा। परतुं कुंम्भनी मुझे कही नही मिल रही थी । फिर कुछ दिन तक ढुंढते ढुंढते कुंम्भनी मुझे अचेत अवस्था मे मिली और जब मैने कुंम्भनी के पास आकर दैखा के कुंम्भनी की मणी उसके पास नही था और कुंम्भनी की ऐसी अवस्था हो गई । पहले तो मैने भी अपनी मर्यादा को ध्यान मे रख ही उस मणी की खोज की परतुं जब मेरा काफी प्रयत्न करने के बाद भी मैं अपनी पुत्री की मणी को नही खोज पाया तब मैने विवश होकर अपनी पुरी शत्की लगा दी ताकी वो मणी मुझे मिल जाए परतुं वो मणी मुझे कही नही मिला । फिर मैने यहां के गांव वाले को जिस पर मेरा संदेह जाता हर रोज एक एक करके उठाने लगा । तब उम्होने मुझे यहां इस जंगल मे रक्षा कवच दे कर बंदी बना दिया । तब ना तो मैं इस जंगल से बाहर जा सकता था और ना ही कुछ कर सकता है। मेरे परिवार और मेरा प्रजा सब मुझे यहा से निकालने के लिए बहुत प्रयत्न किया परतुं सभी विफल रहे। 

कुंम्भन की बात को बिच मे ही ठोक कर मांतक कहता है --

> मित्र तो फिर तुमने अपनी सेनापति कीलदामु या अन्य किसी से सहायता क्यों नही मांगी । जब तुम यहां पर बंदी थे तब तुम्हारी प्रजा तो उस मणी को ढुंढ सकता था । 

मांतक की बात का कुंम्भन जवाब देकर कहता है--

> जैसा तुम कह रहे हो मित्र मैने वो भी किया कितुं उसमे भी विफल रहा। 

> विफल...! परतुं केयों मित्र ? 

मांतक हेरानी से कुम्भन से पूछता है। कुंभ्मन कहता है--

> वो इसिलिए मित्र क्योकी उस रक्षा कवच की शक्ती 
इतनी थी के कोई भी देत्य या अन्य उन सभी गांव मे से किसी मे भी प्रवेश नही कर पायें । परतुं मित्र कुछ दिन पहले मुझे अचानक से ये आभास हुआ के रक्षा कवच का बंधन हट चुका है । 

मातंक हेरानी से कुंम्भन से पूछता है --

> रक्षा कवच स्वयं कैसे हट सकता है ? मित्र कोई तो है जो अब ये चाहता है के मुक्त हो कर मणी की खोज करो अन्यथा रक्षा कवच स्वयं अपने स्थान से नही हट सकता ये या तो तुम्हारा हित चाहता है या अहित । 

कुम्भन कहता है --

> ये मुझे ञात नही मित्र परतुं इस समय हित और अहित की चितां का नही है। जब रक्षा कवच टुटा तब मैने फिर से चुपचाप इस जंगल से बाहर आकर मणी की खोज करने लगा । ताकी किसी को भी ये आभास ना हो के रक्षा कवच टुट चुकी है और मैं जंगल से बाहर आ गया हूँ । परतुं मित्र मेरा ये प्रयत्न भी विफल रहा क्योकीं उस दिन मेला मे एक छोटे बालक ने मुझे देख लिया और मेरे आंखो को खेलने का वस्तु समझ कर मेरे आंख पर कुछ दे मारा तब मैं अपने आपको रौक नही पाया और गुस्से से सभी मानवो को मारने लगा । के तभी किसीने मुझे एक शक्ती से प्रहार किया और मैं फिर से इसि जंगल मे अचेत होकर गिर पड़ा। तब मेरी पत्नी ने तुम्हारे बारे मे मुझे स्मरण कराया और कहां के आप अपने मित्र मांतक और उनकी पत्नी त्रिजला से सहायता मांगिए क्योकीं उन्हें ये वर प्राप्त है के कोई भी बंधन उन्हे नही बांध सकती ।

To be continue....1108