शहद की गुड़िया - प्रकरण 88 88
".कई साल बाद दोबारा मुझे अपने पिताजी की तरह एसिडिटी का अटैक आया था."
" यह बीमारी मुझे भी विरासत में मिली थी. "
" उस के लिये मेरी पास एक ही इलाज उपलब्ध था. "
' इनो! '
" वह लेने से मुझे जल्दी आराम हो जाता था."
" लेकिन इस बार कुछ ज्यादा दर्द हो रहा था.
" मेरे लिये आयुर्वेदिक एक ही राम बाण ईलाज था. "
" जिस ने सालो पहले मुझे मौत के मुंह से छुड़वाया था, वह एक महिला थी.. उस के इलाज से मैं बिल्कुल ठीक हो गया था."
" मुझे इस स्थिति में उस की याद आई थी. उन्हों ने कुछ पुड़िया बनाकर मुझे दी थी. और आरती को सुचना दी थी. उस हिसाब से वह तैयार क़र के मुझे पिलाती थी.. अब तो दोनों नहीं थे और स्नेहा और नीला को उस के बारे में क़ोई जानकारी नहीं थी."
" उस वक़्त मुझे क्या नहीं करना था? किस चीज पर दयान देना है. वह याद आया था. मैं उसी के सहारे आगे चल रहा था."
" उस के हिसाब के एसिडिटी को कंट्रोल करने में कुछ हद तक सक्षम हुआ था."
" स्नेहा मेरा पूरा ख्याल रखती थी. अब तो उसी के लिया जीना जरुरी था."
" हमारे बीच जरूरी क़ोई बड़ा रिश्ता था.. शायद पूर्व जन्म में वह मेरी मा थी. जिस ने मेरा पूरा ख्याल रखा था.. शायद इसी वजह से इस जन्म में भगवान ने मेरी मा को छिन लिया था. बदले में गीता बहन ने यह भूमिका निभाने की संपूर्ण कोशिश की थी. "
" मेरी मा और स्नेहा का जन्म दिन भी एक ही तारीख और महिने में.. O4/05, को आता था."
" एक और अजब इत्तेफ़ाक़ था. कृष्णा का जन्म दिन 01/05 को और उस के पति का 03/05 को आता था."
" यह भी एक अजीबो गरीब बात थी."
" स्नेहा को मैंने पहली बार कामाठी पूरा जैसे गंदे विस्तार में देखा था. वहाँ भी ऐसे माहौल में मुझे उसे मिलकर फूलों की महक का एहसास हुआ था."
" उस ने मुझे कहां था :"
" मेरा नाम स्नेहा हैं. जिस का मतलब होता हैं प्यार. मैं आप को बहुत प्यार करूंगी, आप की बेटी बनकर रहूंगी. "
" यह बात मैं कभी भूल नहीं पाया था."
मैं उसे जानता नहीं था. फिर भी उस ने मेरे साथ बड़ी आत्मीयता के साथ बात की थी. मुझे ' बडे पापा से नवाजा था."
" उसे मेरे सामने लाकर भगवान जरूर कुछ करना चाहता था. उस बात का मुझे साक्षात्कार हो गया था."
" जिस लड़की ने मुझे लुंटा था. उस की स्नेहा छोटी बहन थी."
" यह बात मैं भुलाने से भी भूल नहीं सकता था."
" मैं अपनी जिंदगी में केवल दो बार गलत इलाके में गया था. दोनों लड़की के साथ एक जैसे अनुभव हुए थे."
" स्नेहा ने सच्चाई जानकर मुझे मदद करने का वादा किया था. और उस ने अपना वादा निभाया था."
" आशावरी उस की बड़ी बहन थी, जिसे भी धोखे से ऐसी गंदगी में लाया गया था."
" पैसे तो काफ़ी कमाये थे. लेकिन वह असाध्य बीमारी का शिकार हो गई थी. उस के हाथों में ज्यादा पैसे नहीं रहते थे. वहाँ किसी को भी उस रहम नहीं आया था. इस स्थिति में वह घराको की जेबे काटने पर उतारू हो गई थी. लेकिन बेईमानी से कमाये गये पैसे क़ोई काम नहीं आये थे . और वह सब कुछ छोड़कर चली गई थी. "
" और दूसरे दिन स्नेहा ने मुझे अपने आवास में बुलाया था. और सारे पैसे लौटा दिये थे.."
" सालो बीत गये थे. फिर भी मैं यह बात उस का एहसान कभी भूल नहीं पाया था."
"उस ने मेरे साथ दिल खोलकर बातें की थी."
" मैं यह वाक्या भी कभी अपने दिलो दिमाग़ से बाहर निकाल नहीं पाता था."
" मैंने उसे अपनी बेटी माना था. इस लिये उस ने मुझे बताया था."
" मैं इस नर्क से बाहर निकलना चाहती हूं. "
" और मदद के लिये मुझे अपील की थी."
" उसी वक़्त मैंने भी तय कर लिया था. मैं इस दोझख से उस को मुक्ति दिलाऊंगा."
" उस ने इकरार किया था : "
" सुभाष नाम का एक लड़का मुझे प्यार करता हैं. मुझ से शादी करना चाहता हैं. "
" लेकिन लहू का धंधा करने वाले भेड़िये स्नेहा को छोड़ना नहीं चाहते थे, क्यों की वह सोने की मुर्गी थी."
" उस को छोड़ने के लिये बडे पैसे की मांग करते थे."
" मैंने उस के बारे में गरिमा के पति गौरव को बताया था."
" और उस ने अपनी कराटे टीम की मदद लेकर स्नेहा को इस नर्क की यातना से मुक्ति दिलाई थी. इतना ही नहीं उस के साथ जो भी लड़कियां बाहर आना चाहती थी, उन सब को भी छुटकारा दिलाया था."
" सब कुछ इतना जल्दी हो गया था."
" स्नेहा के प्रेमी सुभाषने तुरंत उस से विवाह क़र लिया था. "
" उस के परिवार ने इस शादी को ना कबूल किया था."
" इस स्थिति में उस ने घर छोड़कर एक छोटी सी जगह भाड़े से लेकर नवजीवन का आरंभ किया था."
" शादी को एक साल होने आया था."
" दोनो सुख चैन की जिंदगी बसर कर रहे थे."
" तीन महिने में वह गर्भवती हुई थी. लेकिन उस का गर्भपात हो गया था."
" शादी को अभी एक साल हुआ था. उस वक़्त सुभाष को घातक अकस्मात हुआ था."
" और वह स्नेहा को मेरे भरोसे छोड़कर स्वर्ग सिधा गया था."
" सुभाष ने जाते समय अपनी बीवी की जिम्मेदारी मेरे हाथो में सोंपी थी. वह मेरी बेटी थी, उस ने मुझे भी एक पिताजी का दर्जा दिया था. वह अच्छी थी. लेकिन उस की पीठ पर एक धंदे वाली का स्टेम्प लग गया था."
" मुझे उसे घर में रखने के क़ोई प्रोब्लेम नहीं था."
" मैं उसे अपने साथ रखने को तैयार था.. लेकिन् क्षितिज भी ऐसा नहीं होने देगा. मैं उसे जानता था."
" "इस स्थिति में मैंने गरिमा की राय संपन्न की थी."
" वह कितनी भी अच्छी हो लेकिन उस के पीछे लगा स्टेम्प उसे चैन से जीने नहीं देंगा."
"गरिमा ने मुझे समजाया था. और एक फ़िल्म की मिशाल देते हुए कहाँ था."
" आप ने तो ' दस्तक ' फ़िल्म देखी है.. आप ने खुद बताया था. एक नव दम्पति शादी क़र के एक घर में जाते है. उस घर में एक मुजरे वाली रहती थी.. उस वजह से उस दम्पति को कितना सहना पड़ता था."
" स्नेहा क्या थी? ना जाने कितने लोग उस के पास आते जाते थे. किसी एक को भी उस बात का पता चला तो नाहक में परेशानी हो जायेगी."
" मुझे भी उस के ऐसे नजरिये में दम लगा था. और मैंने उसे गरिमा के NGO में भर्ती क़र दिया था.."
" वहाँ स्नेहा पूर्ण रूप से सलामत थी."
"आश्रम में ओर कितनी औरते रहती थी."
" स्नेहा दूध में सककर की तरह उन सब से मिल गई थी."
" गरिमा ने अपने आश्रम में घर से भी ज्यादा सहूलियत प्रदान की थी. वहाँ किसी को क़ोई शिकायत नहीं थी. आश्रम में गुजारा करने के लिये बहुत कुछ सिखाया जाता था.. औरते अपने हिसाब से काम करती थी, और अपना गुजारा करती थी."
" स्नेहा पढ़ी लिखी थी. वह टाइपिंग भी जानती थी. "
000000000000 ( क्रमशः)