Bhakt Prahlaad - 17 in Hindi Spiritual Stories by Siya Kashyap books and stories PDF | भक्त प्रह्लाद - 17

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भक्त प्रह्लाद - 17

आश्रम में पुनः वापसी

बालक प्रह्लाद आचार्य शंड के साथ पुनः आश्रम में वापस आ गए थे। यहाँ वे आचार्यों द्वारा दी जाने वाली शिक्षा को बड़े ध्यान से ग्रहण करने लगे। इस बार प्रह्लाद के व्यवहार को देखकर आचार्यों को लगने लगा कि अब प्रह्लाद में काफी परिवर्तन आ गया है, किंतु कोई भी इस बात से परिचित नहीं था कि प्रह्लाद हर समय, हर क्षण अपने इष्टदेव के ध्यान में लीन रहते है।

पहले की अपेक्षा प्रह्लाद सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विषयों में अधिक रुचि लेने लगे थे। यही कारण था कि आचार्यों को यह विश्वास हो चला था कि शायद प्रह्लाद ने इन विषयों की ज्ञान प्राप्ति में रुचि लेने के कारण विष्णु का नाम स्मरण करना छोड़ दिया है ?

एक दिन आचार्य किसी कार्यवश आश्रम से बाहर गए हुए थे। सभी छात्रों ने इस अवसर पर सोचा कि क्यों न कोई खेल खेला जाए। छात्रों की यह बात सुनकर प्रह्लाद ने कहा, “मित्रो! ईश्वर का हम पर यह बड़ा भारी उपकार है कि उसने हमें प्राणी-जीवन दिया है। हमें इस जीवन का उपयोग सही दिशा में करना चाहिए। हमारा जीवन तभी सफल हो सकता है, जब हम इसे प्रभु श्रीहरि विष्णु की भक्ति में समर्पित कर दें।”

“राजकुमार प्रह्लाद!” एक छात्र बोला, “आप यह कैसी बातें कर रहे हैं। हमारे प्रभु श्रीहरि विष्णु कैसे हो सकते हैं, जबकि हमारे प्रभु तो हिरण्यकशिपु हैं। अतः हम किसी और को अपना भगवान् कैसे मान सकते हैं ?”

“यह सब तो आपका भ्रम है, मित्रो!” प्रह्लाद ने अपनी बात स्पष्ट करते हुए कहा, “जिसे आश्रम के आचार्यों द्वारा फैलाया गया है। पिताश्री हिरण्यकशिपु भगवान् नहीं, बल्कि एक राजा हैं। हमें उनका सम्मान एक त्रिलोकी विजेता के रूप में करना चाहिए, न कि त्रिलोकीनाथ के रूप में। त्रिलोकीनाथ तो केवल श्रीहरि विष्णु ही हैं, और उनकी कृपा से सभी का जीवन सफल होना संभव है। यदि किसी भी प्राणी को अपना उद्धार करना है तो उसे भगवान् की भक्ति करनी होगी।”

“किंतु प्रह्लाद! एक बात हमारी समझ में नहीं आई।” एक अन्य छात्र बोला, “जिस आश्रम में और जिन आचार्यों से हमने शिक्षा प्राप्त की और उनका शिष्यत्व ग्रहण किया, आपने भी यथा वैसा ही किया तो फिर हमारी और तुम्हारी शिक्षा के बीच यह विरोधाभास क्यों ?”

“मित्रो!” प्रह्लाद गंभीर स्वर में बोले, “जिस आश्रम में और जिन आचार्यों से मैंने शिक्षा प्राप्त की है, वे महान् आचार्य देवर्षि नारद हैं।”

“यह कैसे संभव है?” पहला छात्र आश्चर्य प्रकट करते हुए बोला, “जब आप आश्रम में हमारे साथ रहते हैं तो फिर देवर्षि नारद से आपकी भेंट कैसे हुई ? आप उनके शिष्य कैसे बन गए और उनसे ज्ञान प्राप्त कैसे किया ?” उस छात्र के प्रश्नों का उत्तर देते हुए प्रह्लाद ने बताया कि यह बात उस समय की है, जब मेरा जन्म भी नहीं हुआ था। उस समय मैं अपनी माता के गर्भ में था, किंतु भगवान् की कृपा से उस अवस्था में भी मुझमें इतनी योग्यता पैदा हो गई थी कि मैं गर्भ के बाहर की सभी क्रिया-प्रक्रियाओं को यथायोग्य समझ लेता था।

एक बार पिताश्री हिरण्यकशिपु तपस्या के लिए मंदार पर्वत पर गए हुए थे। देवताओं ने इसे अपने लिए सुनहरा अवसर समझकर असुरलोक पर आक्रमण कर दिया था। चूँकि राजा हिरण्यकशिपु अत्यंत शक्तिशाली थे और इसी कारण देवता उनसे भयभीत रहते थे, किंतु उनके वहाँ न रहने से देवताओं का साहस बढ़ गया था। अपने राजा हिरण्यकशिपु की अनुपस्थिति में असुर अधिक देर तक देवताओं का सामना न कर सके, जिस कारण असुरों को हार का सामना करना पड़ा।

देवताओं ने यह आक्रमण अचानक ही योजनाबद्ध ढंग से किया था और कुछ बात यह रही कि असुरों ने भी पूरे साहस एवं वीरता से युद्ध न किया, जिसका परिणाम यह हुआ कि असुरों की भारी पराजय हुई। देवताओं ने निर्भय होकर असुरलोक को जी भरकर लूटा। उन्होंने मेरी माता कयाधू को भी बंदी बना लिया। माता कयाधू को बंदी बनाकर देवराज इंद्र उन्हें देवलोक की ओर ले जा रहे थे। बंदी अवस्था में वे जोर-जोर से विलाप कर रही थीं और देवराज से बार-बार यही अनुरोध कर रही थीं कि वे उन्हें मुक्त कर दें।

यह भी संयोग ही था कि जिस मार्ग से देवराज इंद्र माता कयाधू को लेकर देवलोक की ओर जा रहे थे, उसी मार्ग से देवर्षि नारद भी आ रहे थे। जब उन्होंने माता कयाधू को बंदी अवस्था में विलाप करते हुए देखा तो वे उनके निकट आए और बोले, “देवराज इंद्र! आपको यह शोभा नहीं देता कि आप एक गर्भिणी को इस प्रकार बंदी बनाकर अपने साथ ले जाएँ। यह पापाचार है, अत्याचार है।”

“प्रणाम देवर्षि!” देवराज इंद्र ने करबद्ध होकर देविर्ष नारद को प्रणाम किया।

“प्रणाम देवराज! किंतु अभी तक आपने मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया कि इस प्रकार किसी गर्भिणी को बंदी बनाकर बलपूर्वक देवलोक कैसे ले जा सकते हैं?” नारद ने अपना प्रश्न पुनः दोहराया।

“देवर्षि! चूँकि यह एक राजनीतिक मामला है। अतः यदि आप अभी धैर्य रखें तो अधिक उचित होगा।” 

“देवराज! अनुचित आप कर रहे हैं और फिर कह भी रहे हैं कि मैं धैर्य रखूं।” नारद बोले, “नहीं, सर्वप्रथम आप यह बताएँ कि इस तरह बंदी अवस्था में यह गर्भिणी नारी है कौन ?”

“देवर्षि! यह असुरराज हिरण्यकशिपु की रानी कयाधू हैं।” देवराज इंद्र ने बताया।

“रानी कयाधू! देवराज!! यह तो बड़ी ही धर्मपरायण नारी हैं।" देवर्षि ने कुछ सोच-विचार करते हुए कहा, “आपको यों बलपूर्वक इनका अपहरण करना शोभा नहीं देता और न ही किसी भी प्रकार से यह तर्कसंगत ही है।”

 “देवर्षि! मैं किसी दुर्भावना के कारण रानी कयाधू का अपहरण नहीं कर रहा हूँ।” देवराज कहते-कहते रुक गए। 

“तो क्यों कर रहे हो ?” नारद ने प्रश्न किया।

“क्योंकि रानी कयाधू गर्भवती है। अतः उनके गर्भ से जन्म लेने वाली संतान अपने पिता के समान ही देवलोक पर ही नहीं, बल्कि समस्त संसार पर अत्याचार करेगी। इसी कारण मैंने रानी कयाधू का अपहरण किया है और यह निर्णय लिया है कि जैसे ही वह संतान इनके गर्भ से जन्म लेगी, मैं उसका वध कर दूँगा। इसके पश्चात् रानी कयाधू को सम्मान सहित असुरलोक वापस भेज दिया जाएगा।” देवराज इंद्र ने अपने स्पष्टीकरण में कहा।

“देवराज! आप इस धर्मपरायण नारी की संतान का वध नहीं कर सकते।” नारद ने कहा। 

“ऐसा क्यों देवर्षि!” देवराज इंद्र ने चौंकते हुए पूछा।

“क्योंकि इस नारी के गर्भ से जो संतान जन्म लेगी, वह प्रभु श्रीहरि विष्णु की परम भक्त होगी।” नारद ने देवराज की ओर देखते हुए कहा।

“यह आप क्या कह रहे हैं देवर्षि!” देवराज इंद्र आश्चर्य प्रकट करते हुए बोले, “असुर- कुल में जन्म लेने वाली संतान प्रभु श्रीहरि विष्णु की भक्त कैसे हो सकती है ?”

“यही परम सत्य है देवराज!” नारद ने देवराज इंद्र को विश्वास दिलाते हुए कहा।

देवर्षि नारद की बात सुनकर देवराज इंद्र सोच में पड़ गए।

देवराज इंद्र को इस प्रकार सोच-विचार करते देख नारद बोले, “देवराज! यह बात आपको कदापि शोभा नहीं देती कि आप गृहस्वामी की अनुपस्थिति में उसके घर पर आक्रमण कर उसकी पत्नी का बलात् अपहरण कर अपने साथ ले जाएँ।”

देवर्षि नारद की बात सुनकर देवराज इंद्र को बड़ी लज्जा आई। उन्हें ऐसा लगा मानो उन पर घड़ों पानी पड़ गया हो। उनके मुख से कोई शब्द न निकल सका। अंततः देवराज इंद्र ने अपनी इस भूल के लिए रानी कयाधू से क्षमा माँगी।

इसके पश्चात् देवर्षि नारद रानी कयाधू को आश्रम में ले आए। यहाँ उन्होंने रानी कयाधू को भागवत धर्म और भगवद् भक्ति की शिक्षा दी। उस समय रानी कयाधू भागवत धर्म के पालन की ओर बड़ी तेजी से उन्मुख हुईं। आश्रम के सभी छात्र प्रह्लाद को घेरकर बैठे हुए थे और उनकी बातें बड़े ध्यान से सुन रहे थे।

प्रह्लाद ने कहानी को जारी रखते हुए बताया कि जब देवर्षि नारद माता कयाधू को भागवत धर्म की शिक्षा दे रहे थे, तब मैं माता के गर्भ में रहकर ही उस शिक्षा से मन-ही-मन अभिभूत हो रहा था। मैंने गर्भ में रहकर ही देवर्षि नारद की संपूर्ण भागवत धर्म की शिक्षा को आत्मसात् कर लिया था। बस यही मुख्य कारण है कि जन्म होने से पहले ही मैं भागवत धर्म में दीक्षित हो गया था और यह सब मेरे गुरु देवर्षि नारद के कारण संभव हो सका था। तभी एक छात्र बोला, “अच्छा, तो भागवत धर्म की ओर प्रेरित होने का यह कारण है, किंतु इसके पश्चात् क्या हुआ ?”

“फिर कुछ समय पश्चात् जब तपस्या करके पिताश्री वापस असुरलोक आए तो मेरी माता राजमहल में आ गईं। जैसे-जैसे समय बीतता गया तो वे भागवत धर्म को भूल गईं, जबकि मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ। मित्रो! वास्तविकता भी यही है कि भागवत धर्म ही सृष्टि का शाश्वत धर्म है। जो भी प्राणी इस धर्म का पालन करेगा, उसका कल्याण होगा।” प्रह्लाद ने समझाते हुए कहा, “अतः मेरा आप सभी मित्रों से अनुरोध है कि हमें इस धर्म की ओर प्रवृत्त होना चाहिए और अपना तथा अपने प्रियजनों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।”

सभी छात्रों ने प्रह्लाद की बात से सहमति जताई। उनकी समझ में प्रह्लाद की बात आ गई थी और वे सभी भागवत धर्म को जानने के लिए उत्सुक हो उठे थे। उनमें से एक छात्र बोला, “प्रह्लाद! कृपा करके हमें भी भागवत धर्म के बारे में बताओ कि यह भागवत धर्म है क्या, जिससे हम भी धर्मलाभ उठा सकें ?”

“हाँ, क्यों नहीं?” प्रह्लाद ने कहा, “भागवत धर्म का ज्ञान तो ऐसा है कि जो भी इसके संरक्षण में आता है, उसी का कल्याण हो जाता है। प्रभु श्रीहरि विष्णु की कृपा प्राप्ति का मार्ग ही भागवत धर्म है। वैसे भगवान् विष्णु की कृपा अनेक प्रकार से प्राप्त की जा सकती है, किंतु भागवत धर्म इनमें सबसे सरल व सहज मार्ग है। हमें मन, वचन और कर्म से भगवान् विष्णु की भक्ति करनी चाहिए। हमें सदैव उन्हीं का चिंतन-मनन करना चाहिए। सृष्टि के कण-कण में वे ही व्याप्त हैं। वे ही सभी सुख-समृद्धि के आधार हैं। उनकी भक्ति में ही हमारा कल्याण निहित है। जब भी कोई कार्य आरंभ किया जाए या किसी कार्य का समापन किया जाए तो उस समय उनका गुणगान किया जाना चाहिए, क्योंकि ऐसा करते रहने से कार्य की सिद्धि में कोई संशय नहीं रह जाता।”

प्रह्लाद ने छात्रों को भागवत धर्म के बारें जो कुछ भी बताया, वह सब उनके मनोमस्तिष्क में बड़ी गहराई से पैठ गया। सभी ने भागवत धर्म को मन-ही-मन अपनाने का संकल्प कर लिया। आश्रम के सभी शिष्य प्रह्लाद की बातें सुनकर शीघ्र ही भागवत धर्म की ओर प्रवृत्त होने लगे।

कुछ समय पश्चात् आश्रम के आचार्य जब वापस लौटे तो वे छात्रों की गतिविधि देख आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने देखा कि सभी छात्र भागवत धर्म की ओर प्रवृत्त हो चुके हैं और उसकी शिक्षा का यथावत् पालन कर रहे हैं। उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि इस सबके पीछे प्रह्लाद का हाथ है। अतः इस संबंध में उन्होंने कठोर कदम उठाने का निश्चय किया।