इंद्र को दिया चारित्र्य दान
अत्याचारी हिरण्यकशिपु के अंत के पश्चात् प्रह्लाद को राजसिंहासन प्राप्त हुआ। वे तीनों लोकों में अपने सद्गुणों एवं उज्ज्वल चारित्र्य के कारण प्रसिद्ध हो गए। इसी कारण उन्हें अथाह शक्ति प्राप्त हुई, जिसके बल पर उन्होंने देवराज इंद्र को परास्त कर उनकी राजधानी अमरावती को अपने राज्य में मिला लिया। यह सब देवराज इंद्र के बढ़ते अभिमान को चूर करने के लिए हुआ था।
अपनी पराजय होने व राज्य छिन जाने से दुःखी देवराज इंद्र गुरु बृहस्पति की शरण में जा पहुँचे। उन्होंने करबद्ध होकर गुरु बृहस्पति को प्रणाम किया और चिंतित स्वर में बोले, “गुरुदेव! यह बड़े आश्चर्य की बात है कि असुर कुल में जनमे प्रह्लाद ने देवलोक को जीतकर उसे अपने अधीन कर लिया है।”
“इसमें आश्चर्य की क्या बात है, देवराज! यह अविश्वसनीय और अकल्पनीय कार्य तो इससे पहले प्रह्लाद के पिता हिरण्यकशिपु भी कर चुके हैं। यदि असुरराज के महाप्रतापी पुत्र ने ऐसा कर दिया तो आश्चर्य कैसा!” “गुरुदेव ! असुरराज हिरण्यकशिपु को परमपिता ब्रह्माजी से विशेष वरदान प्राप्त था, जिस कारण उसे परास्त करना संभव नहीं था, किंतु प्रह्लाद को तो ऐसा कोई वरदान प्राप्त नहीं है और फिर भी उसने...।”
“आपको पराजित कर अमरावती को अपने राज्य में मिला लिया।” गुरु बृहस्पति देवराज का कथन पूर्ण करते हुए बोले, “किंतु देवराज! क्या आपको ज्ञात नहीं कि प्रह्लाद श्रीहरि का परम भक्त है, और श्रीहरि की अक्षुण्ण भक्ति जिसे प्राप्त हो जाए, वह सृष्टि में क्या नहीं कर सकता ?”
“आपका कथन सर्वथा उचित है, गुरुदेव!” देवराज के मस्तक पर चिंता की रेखाएँ खिंच गईं, “किंतु श्रीहरि की भक्ति तो सृष्टि में बहुत से सुर, नर और मुनिजन करते हैं, क्या वे सब इतनी शक्ति अर्जित कर लेते हैं कि वे देवराज इंद्र को अर्थात् मुझे परास्त कर सकें?”
“निश्चित रूप से नहीं, देवराज!” गुरु बृहस्पति स्पष्ट स्वर में बोले, “श्रीहरि के सभी भक्त आपको पराजित नहीं कर सकते, किंतु जिनका तपोबल अपने उज्ज्वल चरित्र और सद्गुणों के कारण चरम पर पहुँच गया हो, उनके सामने आपका अहंकार और अभिमान से क्षीण देवबल कदापि नहीं ठहर सकता। प्रह्लाद ऐसा ही तपोबली है, जो अपने उज्ज्वल चरित्र और सद्गुणों के कारण आपके देवबल से कई गुणा शक्तिसंपन्न हो चुका है। इसी प्रचुर शक्ति के कारण ही असुरराज प्रह्लाद ने देवलोक पर विजय प्राप्त कर उसे अपने राज्य में समाहित कर लिया, साथ ही सबसे बड़ी बात यह रही कि प्रह्लाद को प्रभु श्रीहरि विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त था।”
“गुरुदेव! हम इतने यज्ञकर्म करते हैं और हमारे पुण्य का प्रताप तो असुरों से कहीं अधिक है, तो फिर भला प्रभु क्यों असुरों को शक्तिशाली बनाने की ओर उन्मुख हैं ?” देवराज इंद्र ने चिंतित स्वर में कहा।
“आपका ऐसा विचार करना अनुचित है, देवराज!” देवगुरु ने कहा, “प्रभु श्रीहरि विष्णु मानव-दानव अथवा सुरअसुर में किसी प्रकार का कोई भेद नहीं करते। उनकी दृष्टि में सब एक समान हैं। जो प्राणी उनके प्रति सच्ची भक्ति रखता है, वे उसकी ओर आकर्षित होते हैं और जो प्राणी उनके प्रति द्वेषभाव रखता है अथवा उनका तिरस्कार करता है, वे उसका हित कैसे कर सकते हैं? दूसरी बात यह कि यज्ञकर्म करते रहने के पश्चात् भी यदि उसकी भावना स्वार्थपूर्ण हो तो फिर उसके यज्ञकर्मों का पुण्प प्रताप तेजहीन हो जाता है और उसके धर्म-कर्म भी महत्त्वहीन हो जाते हैं।”
“गुरुदेव!” हाथ जोड़ते हुए बोले, “कृपया मेरा मार्गदर्शन कीजिए कि मैं अपने सर्वश्रेष्ठ की प्राप्ति करने में सफल हो सकूँ।”
“देवराज! यदि आप सर्वश्रेष्ठ की प्राप्ति करना चाहते हैं तो आपके भीतर जो अहंकार, मोह, लोभ, क्रोध और ईर्ष्या जैसे दुर्गुण प्रबल हो चुके हैं, उनका परित्याग कर आपको निस्स्वार्थ भाव से प्रभु की भक्ति करनी होगी।” फिर कुछ क्षण सोचने के पश्चात् देवगुरु बोले, “वत्स ! तुरंत असुर गुरु शुक्राचार्य के पास चले जाओ। वे आपको सर्वश्रेष्ठ की प्राप्ति से अवश्य ही परिचित कराएँगे।”
“जैसी आपकी आज्ञा, गुरुदेव!” देवराज ने देवगुरु को प्रणाम कर वहाँ से प्रस्थान करने की आज्ञा माँगी।
“यशस्वी भव!” शीघ्र ही अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्त करो। देवगुरु ने इंद्रदेव को आशीर्वाद देते हुए कहा। देवराज इंद्र के मन में जो अहंकार उत्पन्न हो गया था, वह देवगुरु बृहस्पति के शिक्षापूर्ण वचनों से समाप्त हो गया था। उनके मन से ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार और वैर-विरोध के सभी भाव भी समाप्त हो गए थे। देवगुरु बृहस्पति के परामर्श के अनुसार देवराज इंद्र निर्विकार भाव से असुर गुरु शुक्राचार्य की शरण में जा पहुँचे।
असुर गुरु शुक्राचार्य बड़े तपस्वी व ज्ञानी थे। सदैव ही असुरों व देवताओं के बीच वैरभाव रहे थे, किंतु देवराज इंद्र उनकी शरण में आए तो उन्होंने देवराज को ज्ञान प्रदान करने में तनिक भी संकोच नहीं किया।
सर्वप्रथम शुक्राचार्य ने उन्हें मुक्ति का मार्ग प्राप्त करने की शिक्षा दी। इसके पश्चात् देवराज ने कहा, “आचार्य, कृपया आप यह बताएँ कि आपने जो मुक्ति का मार्ग प्राप्त करने का ज्ञान प्रदान किया है, क्या इससे भी श्रेष्ठ कोई अन्य मार्ग है?”
“हाँ, इससे भी श्रेष्ठ ज्ञान है।” शुक्राचार्य ने कहा।
“आचार्य! कृपया आप मुझे उस श्रेष्ठ ज्ञान से भी परिचित कराने की कृपा करें।” देवराज ने विनीत भाव से कहा।
“नहीं, मैं तुम्हें वह ज्ञान प्रदान नहीं कर सकता।”शुक्राचार्य गंभीरता से बोले।
“तो फिर आचार्य! मुझे उस श्रेष्ठ ज्ञान की प्राप्ति कैसे होगी ?” देवराज ने हाथ जोड़ते हुए पूछा।
“देवराज! यदि तुम पुत्र प्रह्लाद के शिष्य बन जाओ तो उसके द्वारा ही श्रेष्ठ ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है।” शुक्राचार्य ने बताया।
“किंतु आप मुझे श्रेष्ठ ज्ञान क्यों नहीं प्रदान कर सकते, आचार्य ?” देवराज विचलित भाव से बोले, “जबकि आपने मुझे अन्य ज्ञान प्रदान किया है?”
“देवराज! आपका कथन सत्य है, मैंने आपको अन्य ज्ञान प्रदान किया है, किंतु आपको श्रेष्ठ ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग केवल पुत्र प्रह्लाद ही बता सकता है।” असुराचार्य बोले, “अतः आपको उसकी शरण में जाना होगा।”
“जैसी आपकी इच्छा आचार्य!” देवराज ने हाथ जोड़ते हुए कहा।
असुर आचार्य की बात सुनकर इंद्रदेव सोचने लगे कि क्या पता असुरराज प्रह्लाद मुझे अपना शिष्य बनाएँगे भी या नहीं! वह तो उनके परम शत्रु हैं, जिन्होंने देवलोक की राजधानी अमरावती को अपने राज्य में समाहित कर लिया था। चूँकि वे प्रह्लाद के शत्रु हैं तो उनका शिष्यत्व ग्रहण करना किस प्रकार संभव होगा! इंद्रदेव के मन में इस तरह के अनेकानेक विचार आ-जा रहे थे।
इंद्रदेव को विचलित देखकर शुक्राचार्य बोले, “क्या हुआ इंद्रदेव! किस सोच में पड़ गए ?”
संकोच के कारण इंद्रदेव अपने मनोभाव प्रकट न कर सके।
शुक्राचार्य इंद्रदेव के मनोभाव को ताड़ गए थे। अतः वे मुसकराते हुए बोले, “संकोच क्यों करते हो, इंद्रदेव! यदि तुम्हें श्रेष्ठ ज्ञान की प्राप्ति करनी है तो फिर संकोच का परित्याग तो करना ही होगा।”
“जो आज्ञा आचार्य!” इंद्रदेव प्रणाम करके वहाँ से चल दिए।
इसके पश्चात् ब्राह्मण का वेश धारण कर इंद्रदेव असुरराज प्रह्लाद के राजमहल के द्वार पर जा पहुँचे। असुरराज प्रह्लाद ने द्वार पर आए ब्राह्मण रूपी इंद्रदेव का यथायोग्य स्वागत-सत्कार किया और उनसे वहाँ आने का प्रयोजन पूछा।
“हे असुरराज!” ब्राह्मण रूपी इंद्रदेव ने कहा, “मैं आपके पास श्रेष्ठ ज्ञान की प्राप्ति के लिए आया हूँ। अतः कृपया मुझे वह ज्ञान प्रदान करें।”
“हे ब्राह्मण!” असुराराज प्रह्लाद बोले, “राजकार्य की अतिव्यस्तता के कारण आपको यह सब सिखाने में मैं पूरी तरह असमर्थ हूं।”
“असुरराज! जब भी आपको समय मिलेगा, मैं ज्ञान प्राप्त करने हेतु आपके पास आ जाऊँगा। अतः आप मुझ पर इतनी कृपा अवश्य करें।” ब्राह्मण रूपी इंद्रदेव ने विनती करते हुए कहा।
ब्राह्मण के द्वारा बारंबार किए जाने वाले आग्रह को असुरराज प्रह्लाद टाल न सके। अंततः उन्होंने इंद्रदेव को श्रेष्ठ ज्ञान की शिक्षा देना आरंभ कर दिया। फलस्वरूप इंद्रदेव भी उनकी सेवा-शुश्रूषा मुक्त भाव से करने लगे। एक दिन इंद्रदेव ने प्रह्लाद से प्रश्न किया, “महाराज! आपको तीनों लोकों का राज्य किस प्रकार प्राप्त हुआ ?”
“हे ब्राह्मण देव!” प्रह्लाद ने बताया, “यदि मुझे तीनों लोकों का राज्य प्राप्त हुआ है तो वह केवल सद्गुण एवं उज्ज्वल चारित्र्य के कारण ही संभव हो सका है। मुझे किसी प्रकार मोह, लोभ, अहंकार, ईर्ष्या नहीं है। मेरा सभी इंद्रियों पर पूरी तरह संयम है और इसी कारण मुझे सर्वश्रेष्ठ की भी प्राप्ति हुई है।”
इंद्रदेव की भक्ति भावना ने प्रह्लाद का मन मोह लिया था। इंद्रदेव से प्रसन्न होकर प्रह्लाद ने कहा, “हे ब्राह्मण देव! मैं तुम्हारी सेवा-भावना से अत्यंत प्रसन्न हूँ। अतः मेरी इच्छा है कि तुम कोई वर माँगो।”“असुरराज! क्या आप वास्तव में मुझसे प्रसन्न हैं ?” इंद्रदेव ने कहा।
“हाँ... ब्राह्मण देव!” प्रह्लाद बोले, “तुम अपनी इच्छानुसार वर माँग सकते हो।”
“यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो आप अपना उज्ज्वल चारित्र्य प्रदान करें।” इंद्रदेव ने कहा। ब्राह्मण की यह बात सुनकर असुरराज प्रह्लाद चौंक उठे, “ब्राह्मण देव! यह तुमने क्या माँग लिया... सही-सही बताओ कि तुम कौन हो ?”
इसके पश्चात् ब्राह्मण रूपी इंद्रदेव ने प्रह्लाद को अपना वास्तविक परिचय दिया। इंद्रदेव का परिचय पाकर प्रह्लाद गंभीरता से बोले, “यदि तुम चारित्र्य के स्थान पर कुछ और माँग लो तो मैं तुम्हें सहर्ष देने के लिए तैयार हूँ।”“नहीं असुरराज!” इंद्रदेव बोले, “मैं उज्ज्वल चारित्र्य का ही अभिलाषी हूँ।”
अंततः इंद्रदेव के आग्रहानुसार भक्त शिरोमणि प्रह्लाद ने उन्हें अपना उज्ज्वल चारित्र्य दे दिया, जिसे पाते ही इद्रदेव का तेज पुनः लौट आया। इसके पश्चात् प्रह्लाद ने इंद्रदेव को सहर्ष उनका राज्य भी लौटा दिया।
भक्त प्रह्लाद ने असुर-कुल में जन्म लेकर भी भगवान् श्रीहरि विष्णु की पावन भक्ति करके उस परम पद को प्राप्त किया, जिसे प्राप्त करने हेतु देव, दानव, यक्ष, गंधर्व और संतजन मुनिजन तक निरंतर जप-तप करते रहते हैं, फिर भी उस परम पद को प्राप्त नहीं कर पाते। संभवतः उस परम पद को प्राप्त करने का मार्ग वेदों-पुराणों की ऋचाओं, तप की कठिन साधनाओं और कठोरतम व्रत प्रवृत्तियों से नहीं निकलता, अपितु यह करुणा, उदारता और सच्चरित्रता की सहज वृत्तियों से होते हुए भक्तिभाव की अंतिम परिणति परम पद को प्राप्त करता है।
परम भगवद्भक्त असुर सम्राट प्रह्लाद जी महाराज की जय
🙇