Ankahi - 3 in Hindi Drama by Dewy Rose books and stories PDF | अनकही - 3

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अनकही - 3









सुबह 7:00 बजे, मेडिटेशन हॉल

मेहरीश सक्सेना आँख खोलते ही पहली बात यह सोची कि कल रात वह कितनी गहरी नींद में सोई थी। उस पत्थर के स्पर्श ने, रयान मल्होत्रा की चुप्पी ने, उसे एक अजीब सी शांति दी थी। वह उठी और अपने बैग से वह सफेद पत्थर निकाला। चिकना, ठंडा, सुंदर। उसने उसे मुट्ठी में भींच लिया, जैसे वह कोई ताकत का स्रोत हो।

डाइनिंग हॉल में नाश्ते का समय था। मेहरीश ने देखा कि रयान पहले से ही एक टेबल पर बैठा था। अकेला। वह ध्यान से अपनी प्लेट में देख रहा था, जैसे उसमें कोई जवाब छिपे हों। मेहरीश ने दूसरी टेबल चुनी। पर उसकी नज़रें बार-बार रयान की तरफ जा रही थीं।

तभी फैसिलिटेटर अर्जुन सिंह हॉल में आए। वे एक लंबे, दुबले-पतले इंसान थे, चालीस की उम्र के आसपास, उनकी आँखों में एक शांति थी जो बिना शब्दों के भी बोलती थी। उन्होंने व्हाइटबोर्ड उठाया और लिखा: "सुप्रभात। आज का पहला एक्सरसाइज: आई कॉन्टैक्ट। 5 मिनट। बिना बोले। एक पार्टनर चुनें।"

कमरे में बीस लोग थे। सबने एक-दूसरे की तरफ देखा। कुछ लोगों ने तुरंत पार्टनर चुन लिए। कुछ झिझक रहे थे।

मेहरीश ने देखा कि रयान उठ खड़ा हुआ था। और वह सीधे उसकी तरफ आ रहा था। उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा। क्यों? वह नहीं जानती थी। शायद कल रात की वह घटना। शायद उस पत्थर का स्पर्श। शायद उन आँखों में देखा गया वह अकेलापन।

रयान उसके सामने आकर खड़ा हो गया। उसने कोई शब्द नहीं बोला। बस अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाया, हथेली ऊपर की तरफ। एक सवाल, एक निमंत्रण: "क्या तुम मेरी पार्टनर बनोगी?"

मेहरीश ने एक पल के लिए देखा। उसके मन में तूफान आ गया। "नहीं कह दूँ? सुरक्षित रहूँ? पर... वह अकेलापन... वह मैच करता है मेरे अकेलेपन से..." उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और उसकी हथेली पर रख दिया। एक मूक उत्तर: "हाँ।"

रयान की हथेली गर्म थी। मेहरीश की हथेली ठंडी। दोनों का स्पर्श केवल दो सेकंड रहा, पर वह दो सेकंड एक पूरी बातचीत थी।

अर्जुन सिंह ने घंटी बजाई।

आई कॉन्टैक्ट एक्सरसाइज, 5 मिनट

दोनों आमने-सामने कुर्सियों पर बैठ गए। अर्जुन सिंह ने व्हाइटबोर्ड पर लिखा: "शुरू करें। बस देखें। महसूस करें। निर्णय न करें।"

घंटी बजी।

मिनट 1: असहजता और भागने की इच्छा

मेहरीश की आँखें तुरंत भागना चाहती थीं। नीचे देख लूँ। दीवार देख लूँ। कहीं भी, बस इस आदमी की आँखों में नहीं देखूँ। पर रयान की आँखें टिकी हुई थीं। स्थिर। दृढ़। उनमें एक दबाव था, पर आक्रामकता नहीं। बस उपस्थिति।

धीरे-धीरे, मेहरीश ने भी टिकना शुरू किया। उसने देखा कि रयान की आँखें भूरी हैं। गहरी भूरी। कॉफी की तरह। पर उनमें सुनहरी चिंगारियाँ हैं। जैसे रात के आसमान में दूर के तारे। उसकी पुतलियाँ फैली हुई थीं। डर की नहीं, रुचि की।

रयान ने देखा कि मेहरीश की आँखें काली हैं। रात जैसी काली। इतनी गहरी कि उनमें डूब जाने का डर होता है। पर उन काली आँखों में एक चमक है। दर्द की चमक। जैसे टूटा हुआ कांच जो सूरज की रोशनी में चमकता है।

मिनट 2: खोज और पहचान

मेहरीश ने देखा कि रयान की आँखों के कोनों में झुर्रियाँ हैं। हल्की। पर वे हँसी की नहीं हैं। चिंता की हैं। तनाव की। उसकी भौंहों के बीच एक लकीर है। स्थायी। जैसे वह हमेशा कुछ सोचता रहता हो।

रयान ने देखा कि मेहरीश की आँखों के नीचे हल्के काले घेरे हैं। नींद की कमी के। पर उन काले घेरों के पीछे एक कहानी है। एक लंबी, थका देने वाली कहानी। उसके होंठ पतले हैं, और हमेशा बंद रहते हैं। जैसे वे किसी रहस्य को दबाए हुए हों।

मिनट 3: कनेक्शन का पल

अचानक, मेहरीश ने महसूस किया कि रयान की आँखें नर्म हो रही हैं। उसकी पुतलियाँ और फैल गईं। उसकी साँस की रफ्तार धीमी हुई। वह भी अनजाने में अपनी साँस धीमी करने लगी। 

रयान ने देखा कि मेहरीश की आँखों में नमी आ गई है। आँसू नहीं। सिर्फ नमी। जैसे सुबह की ओस जो फूलों की पंखुड़ियों पर जमती है। उसने अपनी आँखों में भी वही नमी महसूस की। वह कब से रोया नहीं था? सालों? उसे याद भी नहीं।

मिनट 4: बिना शब्दों की बातचीत

मेहरीश की आँखों ने पूछा: "तुम्हारा दर्द क्या है?"

रयान की आँखों ने जवाब दिया: "वह दर्द जो पैसे से नहीं मिटता।"

रयान की आँखों ने पूछा: "तुम क्यों डरती हो?"

मेहरीश की आँखों ने जवाब दिया: "क्योंकि मैंने बहुत कुछ खो दिया है।"

मेहरीश की आँखों ने पूछा: "तुम क्यों चिल्लाते हो?"

रयान की आँखों ने जवाब दिया: "क्योंकि कोई सुनता नहीं जब मैं धीरे बोलता हूँ।"

रयान की आँखों ने पूछा: "तुम क्यों चुप रहती हो?"

मेहरीश की आँखों ने जवाब दिया: "क्योंकि मेरे शब्दों का कोई मतलब नहीं रहा।"

मिनट 5: समझौता और स्वीकृति

दोनों की आँखों में एक ही स्वीकारोक्ति उभर रही थी: "मैं टूटा हुआ हूँ। तुम भी टूटे हुए हो। शायद हमारे टुकड़े एक-दूसरे से मेल खाते हैं।"

रयान की आँखों में एक वादा था: "मैं तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा।"

मेहरीश की आँखों में एक वादा था: "मैं तुम्हें ठीक करने की कोशिश करूँगी।"

घंटी बजी। 5 मिनट पूरे।

पर दोनों की आँखें अभी भी जुड़ी हुई थीं। वे अर्जुन सिंह की घंटी नहीं सुन पा रहे थे। वे सिर्फ एक-दूसरे की आँखों में खोए हुए थे।

अर्जुन सिंह ने दोबारा घंटी बजाई। जोर से।

रयान ने आँखें झपकाईं। एक लंबी, धीमी पलक झपक। मेहरीश ने भी।

रयान ने धीरे से सिर हिलाया। एक मूक "धन्यवाद।"

मेहरीश ने मुस्कुराने की कोशिश की। वह असली मुस्कान नहीं थी। बस होंठों के कोनों का हल्का सा उठना। पर वह सच्ची थी।

दोपहर 2:00 बजे, नेचर वॉक एक्सरसाइज

अर्जुन सिंह ने व्हाइटबोर्ड पर लिखा: "नेचर वॉक। अपने पार्टनर के साथ। 30 मिनट। बिना बोले। महसूस करें। देखें। शेयर करें बिना शब्दों के।"

रयान ने फिर मेहरीश की तरफ देखा। मेहरीश ने सिर हिलाया।

जंगल के रास्ते पर दोनों चलने लगे। पहले दस मिनट सिर्फ प्रकृति की आवाज़ें थीं: पत्तियों की सरसराहट, पक्षियों का गाना, दूर कहीं झरने का शोर।

मेहरीश ने देखा कि रयान के कदम बड़े हैं। वह तेज चलता है। पर वह उसके साथ तालमेल बिठा रहा है, धीमा हो रहा है। रयान ने देखा कि मेहरीश छोटे कदम रखती है। सावधान। जैसे वह हर कदम पर सोचती हो।

तभी रयान रुका। एक जंगली गुलाब की झाड़ी थी। लाल फूल। नाजुक। सुंदर। उसने फूल की तरफ इशारा किया। फिर मेहरीश की तरफ।

मेहरीश ने फूल को देखा। फिर रयान को देखा। उसने सिर हिलाया। "सुंदर है।"

वे आगे बढ़े। एक छोटी सी नदी मिली। पानी साफ था। पत्थरों पर से बहता हुआ।

मेहरीश नदी के किनारे बैठ गई। उसने अपने जूते और मोजे उतारे। अपने पैर पानी में डाल दिए। ठंडक। ताजगी। एक रिलीफ।

रयान देखता रहा। फिर वह भी बैठ गया। अपने जूते उतारे। अपने पैर पानी में डाले।

दोनों के पैर पानी में थे। कुछ इंच की दूरी पर। मेहरीश के पैर छोटे थे, नाजुक। रयान के पैर बड़े, मजबूत।

मेहरीश ने पानी में पैर हिलाया। छोटी लहरें बनीं। रयान ने भी पैर हिलाया। उसकी लहरें बड़ी थीं। दोनों की लहरें टकराईं। मिल गईं।

मेहरीश ने देखा। फिर रयान की तरफ देखा। रयान की आँखों में एक सवाल था: "तुम्हारा नाम क्या है?"

मेहरीश ने पास पड़ी एक डाली उठाई। रेत पर लिखा: "मेहरीश।"

रयान ने देखा। उसने डाली ली। रेत पर लिखा: "रयान।"

दोनों ने एक-दूसरे के नाम देखे। फिर एक-दूसरे को देखा। नाम अब सिर्फ शब्द नहीं थे। वे पहचान बन गए थे।

रयान ने फिर लिखा: "तुम खूबसूरत हो।"

मेहरीश ने पढ़ा। उसकी गर्दन और गालों पर हल्का सा लाली आ गई। उसने डाली ली। लिखा: "तुम भी।"

यह झूठ नहीं था। रयान सुंदर था। पर उसकी सुंदरता मॉडल जैसी नहीं थी। वह टूटी हुई सुंदरता थी। जैसे प्राचीन मूर्ति जो टूटकर भी आकर्षक हो।

अर्जुन सिंह की सीटी बजी। समय समाप्त।

रयान ने अपना हाथ बढ़ाया। मेहरीश को उठाने के लिए।

मेहरीश ने हाथ पकड़ा। उसका हाथ रयान के हाथ में फिट हो गया। परफेक्ट फिट। जैसे वे एक-दूसरे के लिए बने हों।

वह उठी। उनके हाथ 3 सेकंड ज्यादा जुड़े रहे। फिर अलग हुए। पर उस स्पर्श की गर्मी दोनों के हाथों में रह गई।

शाम 6:00 बजे, मेडिटेशन सेशन

शाम के मेडिटेशन सेशन में, अर्जुन सिंह ने व्हाइटबोर्ड पर लिखा: "कल का टास्क: अपने पार्टनर के बारे में एक चीज़ बिना बोले पता करो। कोई सवाल नहीं पूछना। सिर्फ अवलोकन। सिर्फ ध्यान।"

रयान ने मेहरीश की तरफ देखा। मेहरीश ने नज़रें चुरा लीं। पर उसके दिल की धड़कन तेज हो गई। कल वह रयान के बारे में क्या खोजेगी? और रयान उसके बारे में क्या खोजेगा?

वह डर रही थी। डर इस बात से कि कोई उसे इतनी गहराई से देखेगा। डर इस बात से कि वह किसी को इतनी गहराई से देखेगी।

पर साथ ही, एक उत्सुकता भी थी। एक आशा। शायद, सिर्फ शायद, इस आदमी की आँखों में वह अपना प्रतिबिंब देख पाएगी जो शीशे में नहीं दिखता।

रात 10:00 बजे, कमरे में

मेहरीश अपने कमरे में बैठी थी। डायरी खोली। लिखा:

"दिन 2: आज मैंने एक आदमी की आँखों में अपना अकेलापन देखा। और उसने मेरी आँखों में अपना अकेलापन देखा। शायद अकेलापन अकेला नहीं होता जब वह साझा हो। उसका नाम रयान है। वह मुझे बिना बोले समझता है। और मैं उसे बिना बोले समझती हूँ। यह डरावना है। और सुंदर भी। कल हमें एक-दूसरे के बारे में कुछ खोजना है बिना बोले। मैं क्या खोजूँगी? मुझे डर है। मुझे उम्मीद है।"

उसने पत्थर निकाला। हाथ में लिया। फिर तकिए के नीचे रख दिया। शायद आज रात कोई बुरा सपना नहीं आएगा।

रयान के कमरे में, वह खिड़की के पास खड़ा था। उसने अपनी डायरी खोली। सालों में पहली बार वह कुछ लिख रहा था:

"दिन 2: मैंने एक लड़की को देखा जो मेरी तरह टूटी हुई है। पर उसके टूटने का तरीका अलग है। मैं बाहर से टूटा हूँ। वह अंदर से। उसका नाम मेहरीश है। वह सुंदर है। नाजुक। मजबूत भी। कल मुझे उसके बारे में कुछ खोजना है बिना पूछे। मैं क्या खोजूँगा? शायद वह रहस्य जो उसकी आँखों में छुपा है। या शायद वह जवाब जो मैं अपनी आँखों में ढूँढ रहा हूँ।"

उसने डायरी बंद की। लेट गया। आँखें बंद कीं। उसकी आँखों के सामने मेहरीश की काली आँखें तैर रही थीं। और उन आँखों में, पहली बार, उसने शांति देखी।

°°°°°

अगली सुबह, नाश्ते के समय, रयान की नज़र मेहरीश की कलाई पर टिक गई।

एक पतली-सी सफ़ेद रेखा, पुराना निशान।
उसकी साँस एक पल को थम गई।

उसने सोचा, “क्या कोई ज़ख़्म इतना गहरा हो सकता है कि वक़्त भी उसे मिटा न पाए?”

उसी पल, मेहरीश की नज़र रयान की शर्ट की आस्तीन के नीचे झलकते एक टैटू पर पड़ी।

एक संस्कृत श्लोक। उसके मन में सवाल उठा, “क्या कोई इतना टूटा हुआ भी शब्दों में सहारा ढूँढ सकता है?”

दोनों की नज़रें मिलीं। बिना कहे, एक सवाल हवा में ठहर गया

“तुम्हारे घाव क्या कहानी कहते हैं?” और अब, बिना एक शब्द बोले, उन्हें एक-दूसरे के जख़्मों की कहानी समझनी थी…