yuddh nagfani aur boganvelliya in Hindi Comedy stories by Yashvant Kothari books and stories PDF | युद्ध ,नागफनी व बोगन वेलिया

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युद्ध ,नागफनी व बोगन वेलिया

ताज़ा  व्यंग्य

यशवंत कोठारी

 युद्ध ,नागफनी व बोगन वेलिया

आज क्या लिखे ,क्यों लिखे और सबसे बड़ी बात  लिखने से क्या हो जायगा ?ऐसी टू डू और नोट टू डू की स्थिति में कुछ नहीं करना ही कमाल करना है .जो कुछ नहीं करते वो कमाल करते हैं,ऐसा सयानों का कहना है  .छोटे से फ्लैट में कुल दो पौधे है एक नागफनी का और एक बोगनवेलिया का .मैं इन को निहार रहा हूँ ,नीचे सड़क पर भयंकर शोर  है वी आई पी मूवमेंट शुरू होने वाला है बिल्डिंग का गेट बंद हो गया है ,सीटियों और साईंरनों की आवाजे गूँज रही है ,दूर कहीं  युद्ध चल रहा है ,कुछ दिन चलेगा फिर समझोता होगा ,नेता हाथ मिलायेंगे .बुड्ढी  माँ अपने शहीद बेटे का फोटो छाती पर लगा कर रोएगी ,गरीब सैनिक की विधवा पेंशन के लिए भटकेगी , युवा विधवाएं जीवनयापन के लिए रात्रि चर्या के लिए मजबूर होगी ,अनाथ बच्चा सड़क पर भीख मांगेगा,आम आदमी रोटी के लिए मारामारी करेगा. ,महाभारत के युद्ध  की तरह हर तरफ मरघट का सन्नाटा होगा बस और कुछ नहीं. हर युद्ध में सब हारते हैं .  लेकिन सरकार कहेगी सब ठीक है  कहीं कोई समस्या नहीं है . राष्ट्रों के मुखिया  मुस्कुरा कर हाथ मिला रहे हैं ,फोन पर बतिया रहे हैं.

नागफनी उदास है बोगन वेलिया के कांटें  चुभ रहे हैं ,गैस सिलिंडर के गृह प्रवेश का गृहणी को  इंतज़ार है ;जीवन पतझड़  हो गया है .गैस नहीं है ऑनलाइन खाना भी बंद है ,देश में हाहाकार है .लेकिन उनके अनुसार पूरी दुनिया में अमन चैन है,अमेरिका  पूरी दुनिया कोअपना उपनिवेश बनाएगा और  बाकि दुनिया देखती रह जायगी .

युद्ध से कभी भी कुछ भी हासिल नहीं होगा ,दुनिया  में हर युद्ध केवल हारा जाता है ,हारने वाला तो  हारता  ही है ,और जीतने वाला भी हारता है मानवता और सभ्यता तो हारते ही हैं .युद्ध नहीं प्यार हो तभी बात बनेगी .महंगाई की मार घर की थाली पर भी पड़ रही है ,मध्यम वर्ग और भी ज्यादा पिस रहा है .सब तरफ आग लगी हुई है ,जिन्दा लाशें घूम रही है .पृथ्वी  एक विशाल शमशान में बदल रही है मरघट का सन्नाटा सब कुछ लीलने को तैयार  है.हर तरफ अँधा युग छाने वाला  है .सभ्यता के नष्टीकरण की पूरी तेयारी है .

ऐसे समय में पडोसी कविराज टपक पड़े ,बीडी का सुट्टा लगा कर बोले –चाय पिलवाओ , मैंने गैस और पेट्रोल  का रोना रोया तो वो  भी मेरे साथ उदास हो गए और उवाचे -

भइये! ये बताओ ये  युद्ध का ऊंट किस करवट बैठेगा ?

मैंने बताया –ये तो भाई जान युद्ध शुरू  करने वाले भी नहीं जानते  उनसे न उगलते बन  रहा है और न ही निगलते बन रहा है .सांप छछुंदर वाली गति हो रही है ,सच पूछो तो पूरा किस्सा उस रीछ और कम्बल जैसा  हो गया है , जिस में  एक आदमी बाढ़ में बहते रीछ को कम्बल समझ  कर पकड़ने गया और रीछ ने उसे ही पकड़ लिया और अंत  तक नहीं छोड़ा और आदमी भी बाढ़ में बह गया .

वो तो ठीक है मियां ,मगर जरा चाय कचोरी का कलेवा  कर ले फिर युद्ध पर लिखी नयी नज्म तुम्हे सुनायेंगे .भइये नज्म हम तभी सुनेंगे जब बिल तुम दोगे कवि भुनभुनाते हुए चले गए .

 नाग फनी के नाग सब को डसने को तैयार  खड़े है ,बोगनवेलिया के कांटें  चुभ रहे हैं ,शायद दुनिया वापस प्रागेतिहासिक काल की और चली जायगी .युद्ध नहीं प्रेम करो ,मगर दुनिया युद्ध से ही प्रेम करने लग गयी है .कौन समझाए की युद्ध नहीं बुद्ध होना चाहिए सभी को शांति चाहिए लेकिन इन हुक्मरानों को कौन और कैसे समझाएं .है कोई रास्ता ?

फूलों को खिलने दो ,बहारों को आने दो, नदियों  को बहने दो ,मौसम को बदलने दो .नागफनी को भी जीने का हक़ है और बोगनबेलिया को भी .गरीबों को भी जीने दो .

आओ प्यारों शांति की बात करे .युद्ध से घृणा करे .शायर ने सही कहा है -

हम जौर भी सह लेंगे मगर डर है तो यह है,
ज़ालिम को कभी फूलते-फलते नहीं देखा.

आमीन .



यशवन्त कोठारी ,701,गोल्डन फार्च्यून  SB-5 ,भवानी सिंह  रोड ,बापू नगर ,जयपुर -302015  मो.-94144612 07