कदम बस से उतरी ! अकेले दुनिया बड़ी लगने लगी , मानो कि किस मेले में आ गए हो। नजर चारों ओर फेरने में लगी थी! मै तो यही सोच रही थी कि अब आजादी से जिऊंगी लेकिन, क्या पता था कि आगे ऐसा हाल होगा....!!
तोह मैं पढ़ाई को जारी करने के लिए शहर में प्रवेश करने की घर से अनुमति लेकर रवाना हुई। दुनिया बहुत बड़ी और सुखदाई लगने लगी थी। शुरुवात की आजादी और अकेलापन की चाहत खुद मै ऐसी खुशी दे रही थी , जैसे कि सदियों से बंधे परिंदा पिंजरा से खुले हो...!! दोस्ती भी गहरी लगने लगी, सब कुछ अपना सा लगने लगा था परन्तु क्यों? क्योंकि अकेलेपन की आजादी से प्यार हो गया था। खैर ,ये तोह शुरुवात की है ; शुरू मै तोह मैं पीजी (PG) में रहती थी पर वह का खाना ठीक नहीं लगता था फिर क्या , पैसे तोह घर से आते थे हमें क्या पता था उस समय पैसों का महत्व , बस घर से पैसे को और बाहर खाने चले जाओ ...
कुछ महीने थी चलते रहा , दोस्तों का आना जाना , खाओ - पियो मस्ती करो ये सीन चलते रहा...
क्या लगता है आपको , यही था पूरी जिंदगी शहर में??
नहीं, बिल्कुल भी नहीं। कहानी का असली मोर तोह अब शुरू होगी... अब पता चलने लगा घर की आर्थिक स्थिति, मां - पापा की फिकर, खुद कमाने की बेचैनी। आप भी अगर कभी अपने घर छोड़ के शहर गए होंगे तो मुझे महसूस जरूर कर रहे होंगे !!
तोह फिर क्या था , अकेलापन पन की खाली दिमाग दौड़ने की बारी थी । वो शुरुआत की अकेलापन की आजादी मानो अब करने को दौड़ती है, मानो कि खुद को भूल ही चुके हो कि तुम हो कौन ? क्या थी तुम और क्या हो गई हो? इन सवालों से दिमाग मानो कि हर वक्त यही सवाल करता हो। अब सिर्फ मुझेचाइए था परिवार , वो परिवार जा मै खुद को जानती थी मै कौन हु, मेरी ताकत क्या है, मेरी ड्रीम क्या है...
परन्तु यहां, यहां आकर ऐसा ही लग रहा है जैसे कि मै इस दुनिया में अकेली हु। न अपना उदासी, दुख तुम परिवार को सुन सकते हो.. मां तोह हर वक्त पूछती ही हैं परन्तु हम ठहरे मजबूत लोग कहां बता पाते है मां को की....हां मां मै परेशान हु ! कहा बता पाते हैं हम मां को की.... "मां अपनी गोद में सुला लो न" ।
कहा बता पाते है हम मां को की ....मां आप मेरे पास आ जाओ न, आप ही मेरी दुनिया हो.....।। अंदर की आवाजें कैसे पहुंचा सकते है मां को, क्योंकि मां को फिकर इतनी होती है कि वो खुद को भूल जाएगी। अब सारी शौक , आजादी, मस्ती अंदर से मर चुकी थी! न दोस्त चाहिए , न कोई घूमना; बस अब एक ही सपना था कि कुछ तोह करना है ।
पीजी छोड़ दिया फिर मैने रेंट रूम में रहना शुरू किया , पता था मुझे कि वहां मैं अकेली पर जाऊंगी लेकिन मैने हार नहीं माना सोचा कि अकेले हु तो क्या हुआ मेरे श्याम जी मेरे साथ तोह है ही ! अपना बोरिया - बिस्तर बंधा और रूम मै शिफ्ट हो गई। इधर आने के बाद भी आजू - बाजू सब कॉलीग्स ही थे तोह इधर भी मैने खुद को जिए है पर "वो जीना अलग है जो हम घर में जीते हैं"। सोची थी अकेली रहूंगी खुद बनाऊंगी , खाऊंगी, और पढ़ाई में ध्यान दूंगी। लेकिन मुझे क्या पता था कि वो दिन याद आ जाएंगे जब एक थाली में मां पापा के साथ खाया करती थी, अकेले थाली लेकर बैठने पर आखों मै आशु आ जायेंगे कि ख़ास आज साथ मै होते। खैर! कुछ पाने केे लिए , कुछ खोना पड़ता है। चाहे वो अपनापन हो या प्यार।।
अब यह अलग ही लोचा लग गया.... हर मोर पर एक अलग ही शुरुवात हो रही थी, यह आने के बाद अकेलापन में खाना बनाने की दिक्कत, न अकेले खाना रुचत था और नहीं पढाई की जोश रुकी थी।
अब क्या था , आजू - बाजू के दोस्तो के साथ मस्ती मै ध्यान लगने लगी.…. कुछ समय ऐसे ही बीतता गया फिर एक दिन मैंने ऑनलाइन वर्क फ्राम होम के लिए फॉर्म अप्लाई किया था। फिर क्या था; उसमें भी मेरी ऐसी कटी मानो कि मेरे सपने चूर चूर हो गए। ऑनलाइन स्कैम मेरे साथ हुई जिसमें मैने तीस हजार रकम गंवाई!!
कुछ करने के चक्कर में नुकसान कर बैठी, लेकिन मै फिर भी हार नहीं मानी खुद को समझाया कि " ठोकर खाने से ही ठाकुर बनते है"। जरूरी नहीं है कि आपकी एक गलती के वजह से आप खुद को जिंदगी भर कोसों! पैसा हाथ का मैल है, आज हैं - तोह कल नहीं! इसी तरह आगे की ओर कदम बढ़ाया। घर की यादें , मां का हाथ का खाना ,
बचपन की यादें सब कुछ रात की नींद के समय मानो घेर लेती है, जिस से पूरी रात जागने की आदत लगा देती है। अब क्या करे हम भी ठहरे फोन चलने की आशिक , अकेलापन के सच्चा साथी तोह फोन ही बन गया था मानो कि हमने इसे ही अपनी दुनिया समझ लिया हो। अंजान शहर में न किसी की मदद , न किसी की आस्था, सिर्फ से सिर्फ खुद के ऊपर सब कुछ लेकर चलना बहुत मुश्किल पर जाता है। नाही हम खुद को मेंटेन कर पाते है , नाही हमे एक अच्छी गाइडलाइन मिलती है जिंदगी के लिए, और नहीं हर कोई अच्छे होते है खास कर वो शहर जा तुम अकेले हो!!
फिर क्या था दिल जितनी नादान थी उसे मजबूत खुद की समय बना देता था। बचपन मे नखरे दिखाते - दिखाते कब बड़े हो गए पता ही नहीं चला! खैर , ये तोह जिंदगी का हिस्सा है समझ कर आगे बड़े। सेकंड ईयर कंप्लीट हो गया था, अभी तक कुछ नहीं कर पाई थी , नहीं सरकारी नौकरी की पढ़ाई की और नहीं कुछ जॉब जिस से खुद की खर्चा निकले। अब हम मिडल क्लास के लोग तोह सबसे पहले खुद की खर्चा निकालना तो जरूर चाहते है। शायद मेरी कथन से आप सहमत हो!
आगे की पढ़ाई, अधूरे सपने और जिंदगी जीने की ख्वाब, पता नहीं क्यों धीरे ज़ाहिर अंदर से खुद को खाए जा रही थी। आए दिन बीमार होना, मेंटालिटी पे प्रेसर, कुछ करने की ख्वाब सब के सब मन मै तो थे पर कुछ कर नहीं पा रहे थे। प्रयास पे प्रयास करने की बाद भी असफलता प्राप्त होने पर निराशा ! घर की भी यादें सताना, मां पापा की फिकर और न जाने कैसी कैसी बातें जो आधी रात को नींद के बीच आती और कहती ।
बार - बार यही दोहराना , अंदर से टूट जाते है अकेलेपन । ऐसा ही लगता ही कि क्यों है हम ये अनजाने रस्ते, अनजाने शहर , क्यों न हम बस जाते हमेशा के लिए अपने परिवार के साथ अपनी खुशी के साथ। बड़े होने पर क्यों छुट जाते है मां का साया पापा का लाड - दुलार । अब क्या था जो लड़की अकेलापन से पहले डरती थी, अब शहर के माहौल में खुद को ढाल रही थी।
यही होता है जब आप अकेले अनजाने एक नए शहर में खुद के सपने , खुद बनाने चलते है !! खैर, ये तोह जिंदगी की रीत है । खुद के लिए खुद को चुन ना ही पड़ता है चाहे आपको अपनों से दूर होने का गम हो या अकेलापन का घाव ।।
_ अंजली कुमारी शर्मा