Rajkumar in Hindi Mythological Stories by Ram Make books and stories PDF | Rajkumar

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Rajkumar




आचार्य गंधर्व ने करीब १९ साल के युवा राजकुमार के हाथ मे तलवार थमाते हुए अपने ऊपर प्रहार करने का आदेश दिया। वो युवा था यज्वपाल राजघराने का सदस्य, तनिष्क यज्वपाल जो सामने खड़े आचार्य के बार बार ललकारने के बावजूद अपनी जगह पर हाथ मे तलवार थामे कांपता हुआ खड़ा रहा।

बगल में खड़े यज्वपाल राजघराने के दूसरे सदस्य जो कि शारिरिक बनावट और बल में तनिष्क से कई गुना बेहतर थे, तनिष्क को देखकर मन ही मन तरस खा रहे थे।

आचार्य गंधर्व ने तनिष्क की तरफ चिल्लाते हुए कहा, "तनिष्क, तुम खुद तलवार नही चलाओगे तो अब मेरे प्रहार से बच कर दिखाओ।"

इतना कहते ही आचार्य गंधर्व तनिष्क की तरफ दौड़े । आचार्य गंधर्व तनिष्क की ढाल पर अपनी तलवार की टंकार करने ही वाले थे कि तनिष्क उनके रास्ते से हट गया और अपनी ढाल और तलवार नीचे गिरा दी और मुड़ कर एक तितली के पीछे नंगे पैर चलने लगा।

तनिष्क को ऐसा करते देख आचार्य गंधर्व को बहुत गुस्सा आया। दरअसल ये कोई आम घटना नही थी, ये तितली तनिष्क को आवाज़ देकर बुला रही थी जो कि तनिष्क के अलावा कोई और नही सुन पा रहा था।

"देवी आपको बुला रही है कुँवर।" और इतना सुनते ही तनिष्क नंगे पैर तितली के पीछे विजयगढ़ की गलियों में चलने लगा। तनिष्क को सबके ताने सुनाई दे रहे थे लेकिन उसे उन सबके तानों से कोई फ़र्क नही पड़ता था।

तनिष्क पागलों की तरह नगर के मुख्य चौक से गुजरा जहां यज्वपाल राजघराने के सेनापति रणेन्द्र अपनी टुकड़ी के साथ मौजूद थे। सेनापति रणेन्द्र को तनिष्क की हालत देखकर अफसोस हुआ लेकिन वो कुछ कर भी तो नही सकता था। सेनापति के पीछे खड़ी टुकड़ी में एक घुड़सवार ने तनिष्क का मज़ाक उड़ाया, "देखो इस पागल को कैसे नंगे पैर तितली के पीछे दौड़ा जा रहा है, इसे तो यज्वपाल परिवार में पैदा ही नही होना चाहिए था।" घुड़सवार सैनिक की बात सुनकर उसके आस पास खड़े दूसरे सैनिकों ने भी तनिष्क का माखौल उड़ाया।

तनिष्क के गुजरने के बाद सेनापति रणेन्द्र का शाही दस्ता नगर के बीचों बीच आकर खड़ा हुआ। सेनापति रणेन्द्र देखने मे एक दैत्यकाय व्यक्ति था जो अपनी एक नज़र से सामने वाले के बदन में सिहरन पैदा कर देता था। रणेंद्र के स्वभाव और बोली में एक रुतबा और गौरव था जो कि उसके यज्वपाल राजघराने के सेनापति होने की वजह से था।

उन्हें देख वहां लोगों की भीड़ इकठ्ठा हुयी और इसके साथ एक सैनिकों ने डंका बजाया और रणेन्द्र बोल पड़े  "विजयगढ़ के वासियों ध्यान से सुनो! आप सभी को सूचित किया जाता है कि यज्वपाल राजपरिवर, सेना की नई टुकड़ी में 20 साहसी सैनिकों की भर्ती करने जा रहा है। भर्ती  प्रक्रिया कल प्रातःकाल आरम्भ की जाएगी जिसमे यज्वपाल राजपरिवार के युवा सदस्यों से लड़ते हुए उनके तीन प्रहारों को झेलना होगा। जो व्यक्ति ऐसा करने में सक्षम होगा वो सेना का सदस्य चुना जायेगा। और अगर कोई व्यक्ति राजपरिवर के युवा सदस्य को हराने या बराबरी में युद्ध समाप्त करवाने में सफल होता है तो उसे न सिर्फ सेना में भर्ती किया जायेगा बल्कि भर्ती हुई टुकड़ी का मुखिया बनाया जाएगा।"

इतना कहकर एक जवान ने सैनिक भर्ती के सूचना पत्र को मुख्य चौक के पास की एक दीवार पर लगे सूचना पट्ट पर चिपका दिया।

ये काहानी है आज से बारह सौ साल पहले की। विजयगढ़ राज्य का यज्वपाल राजपरिवार राज्य के पांच ताकतवर और रसूखदार राजपरिवारों में से एक था। यज्वपाल राजपरिवर का रुतबा ऐसा था कि विजयगढ़ के आम जन इस खानदान से अपना संबंध बनाना चाहते थे और उनकी सेना का हिस्सा बनना चाहते थे। लोगो की इस इच्छा का बड़ा कारण यज्वपाल राजपरिवार की विशेष युद्ध कला भी थी जो कि सिर्फ यज्वपाल राजपरिवार के सदस्यों या उस राजघराने से संबंधित सैनिकों को ही सिखाई जाती थी। 

यज्वपाल राजपरिवार अपने शौर्य और प्रताप के लिए जाना जाता था। सैन्य संख्या कम होने के बावजूद यज्वपाल राजपरिवार की सेना ताकत में पीछे नही थी जिसका कारण था यज्वपाल सेना का युद्ध कौशल और अनुशासन। 

लेकिन इसी राजपरिवार का एक सदस्य तनिष्क लोगों द्वारा पागल समझा जाता था क्योंकि वो युद्ध कौशल में बाकियों की तरह पारंगत नही था। तनिष्क यज्वपाल राजपरिवार के मुखिया के तीसरे भाई का लड़का था जो कि दिमागी रूप और शारीरिक बनावट से थोड़ा कमज़ोर था। उसे उसके अजीब रवैये व कमज़ोर बनावट के चलते दरकिनार किया जाता था।

पूर्व काल मे लोगों के पास व्यवसाय और रोजगार के नाम पर बहुत ज्यादा विकल्प नही होते थे। लोग या तो खेती कर सकते थे या कोई छोटा-मोटा व्यापार। रोज़गार का सबसे बढिया साधन सेना में सिपाही के तौर पर भर्ती होना था जिसका अवसर राजघराने समय समय पर देते रहते थे।

यही अवसर यज्वपाल राजपरिवार ने अपने नगरवासियों को दिया था। शहर के मुख्य चौक पर लगा सूचना पत्र पढ़ रहे लोग इस भर्ती प्रक्रिया को लेकर काफी उत्साहित थे।  यज्वपाल सेना के सेनापति को अपने बीच से गुज़रता देख चौक पर खड़े लोगों में उसकी सेना में शामिल होने की लालसा जाग उठी।

भीड़ में से एक व्यक्ति ने कहा "आखिरकार यज्वपाल राजपरिवार ने भर्ती की घोषणा कर दी"

तो किसी दूसरे ने कहा कि "हाँ हाँ.. 16 साल की उम्र के 20 नौजवानों की भर्ती होगी जिन्हें यज्वपाल खानदान की विशेष युद्ध कला सीखने का मौका मिलेगा। सूचना पत्र में ये भी लिखा था कि 20 सिपाहियों को प्रतिमाह 50 चांदी के सिक्कों की तनख्वाह मिलेगी और उन्ही 20 में से चुने गए एक मुखिया को 100 चांदी के सिक्के मिला करेंगे।"

यज्वपाल सेना द्वारा दी जाने वाली तनख्वाह और दूसरी सैन्य सुविधाएं तो लुभावनी थी लेकिन ये भर्ती प्रक्रिया इतनी आसान नही थी, क्यूंकि यज्वपाल राजपरिवार के युवा सदस्य उम्र में छोटे ज़रूर थे लेकिन अपने प्रहार से बड़े बड़ों को ढेर करने की क्षमता रखते थे ।

यज्वपाल खानदान में होने वाली भर्ती की खबर आग की तरह पूरे राज्य में फैल गई। अगले दिन होने वाली भर्ती के बारे में सूचना देकर वापस  लौटते वक़्त सेनापति रणेन्द्र की टुकड़ी में पीछे चल रहे एक जवान ने दूसरे जवान से कहा, "आज तेरहवाँ दिन है, लगी शर्त 10 सिक्कों की.. आज भी वो पागल वहीं गया होगा।"

तीसरे जवान ने सिर उठाकर पहाड़ की तरफ देखते हुए कहा, "वो पागल दिन-ब-दिन और पागल होता जा रहा है, आज सुना है की तितली से बातें करते हुए नगर के बीचों बीच से गुज़रा था।"

दूसरे ने शर्त कबूल करते हुए कहा, " पिछली बार वो पागल अधिकतम 10 दिन के लिये ही वहाँ ऊपर गया था.. आज तेरहवाँ दिन है.. उसके ऊपर होने का कोई सवाल ही नही बनता.."

सैनिक जिस जगह की बात कर थे वह कभी एक प्राचीन देवी का मंदिर था जो अब खंडहर में तब्दील हो चुका था, और वह मंदिर राज्य के पश्चिमी छोर पर गुरु पहाड़ नाम के पर्वत पे स्थित था। गुरु पहाड़ एकदम पथरीला और बंजर था जिस पर एक हरी घास तक नही उगती थी।

यज्वपाल राजघराने में गुरु पहाड़ को शुभ माना जाता था और ऊपर रखी देवी की मूर्ति की साल में एक बार भव्य पूजा करवाई जाती थी। ये मूर्ति ज़मीन में बहुत नीचे धंसी हुई थी और ज़मीन के ऊपर वो चार हाथ की ऊंचाई तक थी। मूर्ति में बहुत सी दरारें थी जो कि ये दर्शाती थी की मूर्ति सदियों से धूप-पानी का प्रहार झेल रही थी। तनिष्क ,यज्वपाल राजपरिवार का एक ऐसा सदस्य था जो अपना अधिकतर समय उस खंडहर में मूर्ति के सामने बिताया करता था। 

सैनिकों को तनिष्क के पागलपन में काफ़ी दिलचस्पी थी तो उन सबने अपनी जेब से 10 सिक्के निकालकर अपना अपना अनुमान लगाया। अपने पीछे चल रहे सैनिकों की बातें सेनापति रणेन्द्र सुन रहा था। सैनिक हंसी-ठिठोली कर ही रहे थे कि तभी रणेन्द्र पीछे मुड़ा और उसने सख़्त लहजे में कहा, "संभल जाओ सारे.. माना कि वो लड़का अपने वंश में कोई हैसियत नही रखता और उसका बर्ताव भी अजीब हैं, लेकिन वो यज्वपाल राजपरिवार का सदस्य है और राजपरिवार का सदस्य होने के नाते तुम्हारा मालिक है। और अपने मालिक का मज़ाक उड़ाने पर तुम सबके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही की जा सकती है।"

रणेन्द्र ने अपनी बात खत्म करते हुए अपने घोड़े पर बैठे बैठे पीछे मुड़ कर सख्त निगाहों से देखा तो उसके पीछे चल रहे दूसरे सिपाही डर के मारे शांत हो गए। पीछे चल रहे सिपाहियों की अटकी सांस देख कर सेनापति रणेन्द्र की आंखों की धार नरम पड़ी और उसने अपनी जेब से 10 सिक्के निकालते हुए कहा, "ये लगे मेरे दस, मैं कहता हूं वो आज भी वही खंडहर में पड़ा मिलेगा।"

सेनापति को शर्त का हिस्सा बनता देख पीछे चल रहे सैनिकों की सांस में सांस आई और वो सब दबी हंसी के साथ आगे बढ़े और पहाड़ की तरफ झांक कर पता लगाने लगे कि तनिष्क अभी भी वहां ऊपर है कि नही।

शाम होने को आई थी और सैनिकों की टुकड़ी ने पता लगा लिया था कि तनिष्क आज तेरहवें दिन भी ऊपर गुरु पहाड़ पर ही मौजूद है। कुछ सैनिक जो शर्त हारे थे वो हताश हो गए और जो जीते वो खुशी से झूम उठे। हालांकि हैरानी सबको हुई कि तनिष्क आज तेरहवें दिन भी पहाड़ पर मौजूद है। सेनापति रणेन्द्र तनिष्क के बिगड़ते दिमागी संतुलन पर अफ़सोस जताते हुए आगे बढ़ गए और बाकी के सैनिक भी ढलती शाम अपने घर लौट गए। जाते जाते सबने अगले दिन होने वाली भर्ती प्रक्रिया का ज़िक्र किया और अगली सुबह जल्दी मिलने की हामी भरी।

बिजली काफी देर तक उसके शरीर से गुजरती रही और उसके पूरे शरीर के आस-पास एक चमकदार घेरा बन गया। तनिष्क को महसूस हुआ कि जैसे उसके अंदर बिजली के ज़रिए शक्ति का संचार हो रहा हो। तनिष्क अपने अंदर से प्रवाहित होती बिजली के ताप को सहन करता रहा और जब बिजली का प्रवाह रुका तो तनिष्क चिल्लाता हुआ दो मंजिल की ऊंचाई से ज़मीन पर बेहोश होकर गिर गया। बिजली तूफान थमने के बाद रात भर जम कर बारिश हुई लेकिन तनिष्क उसी बेहोश हालत में मूर्ति की सामने पड़ा रहा।

सुबह हुई तो सारा विजयगढ़ यज्वपालों के किले में होने वाली भर्ती को लेकर चहल-पहल में जुट गया। हट्टे-कट्टे नौजवान यज्वपालों के किले की तरफ एक माहिर सैनिक बनने की लालसा लिए बढ़ने लगे। नौजवानों के अलावा नगर के आम नागरिकों का भी जमावड़ा लगने लगा जो भर्ती के दौरान लगने वाले दांव-पेंच देखने के इच्छुक  थे। देखते देखते किले के अंदर का मैदान भर गया। मैदान के बीच में बस थोड़ी सी जगह बची थी जो कि मुकाबलों के लिए थी।

यज्वपाल किले में सैनिकों की भर्ती के लिए मुकाबला शुरू हुआ जिसके बाद लोग एक के बाद एक यज्वपाल राजपरिवार के नव कुशल योद्धाओं से टकराने लगे पर उनके कौशल के आगे थोड़ी देर भी टिक न सके । सैकड़ों लोगों की भीड़ में बहुत देर मुकाबला चलने के बाद बड़ी मुश्किल से 20 लोग चुने जा सके थे । सारी भर्ती प्रक्रिया सेनापति रणेन्द्र यज्वपाल की निगरानी में निष्पक्ष रूप से हुई थी।

जब 20 लोग चुन लिए गए तो उनमे से एक व्यक्ति जिसका नाम शांतनु था, उसने आगे बढ़कर सेनापति रणेन्द्र से खुद को मुखिया बनाने का दावा ठोका। सबके सामने ऐसे चुनौती देते हुए शांतनु को यज्वपाल राजपरिवार के सदस्यों ने देखा और मन ही मन सोचा की इसको धूल चटाने में कितना मज़ा आएगा।

इन सबसे दूर ऊपर गुरु पहाड़ पर बेहोश पड़ा तनिष्क होश में आया। बेहोशी से जागने के बाद तनिष्क का सिर चकरा रहा था और वो हल्की बेहोशी की हालत में शाही किले में दाखिल हुआ जहां हज़ारों की भीड़ इकट्ठा थी।

वहां शांतनु ने जो चुनौती दी थी उसका जवाब देने के लिए यज्वपाल परिवार के लड़के उत्साहित थे लेकिन मुखिया के मुकाबले में अपने प्रतिद्वंद्वी का चयन शांतनु को ही करना था। शांतनु ने आस पास नज़रें घुमाई तो देखा कि पीछे भीड़ में पागल तनिष्क सिर पकड़े खड़ा है। शांतनु ने बिना कुछ सोचे समझे तनिष्क की तरफ हाथ से इशारा किया और ललकारते हुए कहा, "मैं तनिष्क को अपना प्रतिद्वंद्वी चुनता हूं।" 

शांतुन जानता था मुखिया बनने का इससे अच्छा मौका फिर नहीं मिलेगा इस पागल को तो वो पलक झपकते ही हरा देगा इसलिये उसने बड़ी ही विनम्रता पूर्वक सेनापति रणेन्द्र से तनिष्क को मैदान में बुलाने का आग्रह किया , रणेन्द्र इस चुनौती को रोकना चाह रहा था लेकिन मुकाबले के नियम के कारण वो मजबूर था अतः उसने तनिष्क और शांतनु के मुकाबले की घोषणा कर दी ।

उस रात मौसम कुछ ज़्यादा बिगड़ गया। देखते देखते बादल आ गए और बिजली कड़कने लगी। ऐसे खराब मौसम में भी तनिष्क उसी खंडहर में डटा रहा।

तेज़ आंधी में धूल उड़ रही थी लेकिन तनिष्क का ध्यान नही टूटा। तभी एक ज़ोर की गड़गड़ाहट के साथ बिजली चमकी जो कि सीधा मूर्ति पर आकर गिरी। देवी की मूर्ति पर गिरी बिजली का संचार देवी की प्रतिमा से होकर सामने बैठे तनिष्क के शरीर मे होने लगा। तनिष्क पर बिजली पड़ते ही उसका शरीर अकड़ गया और वो हवा में लहराने लगा।

तनिष्क को जब समझ आया कि उसे युद्ध की चुनौती दी गयी है तो वो मैदान के बीच मे पहुंचा। शांतनु और तनिष्क ने आमने सामने खड़े होकर एक दूसरे का झुक कर अभिवादन किया । 

यज्वपाल परिवार के सभी सदस्यों को  डर लग रहा था कि अगर तनिष्क शांतनु से पहले वार में ही हार गया तो उनके राजघराने की क्या इज्जत रह जाएगी वो लोग शांतनु की सारी चालाकी समझ रहे थे लेकिन मुकाबले के नियम के कारण मजबूर थे , क्योँ कि मुकाबले के सूचना पत्र के नियम में  ऐसा कही नही लिखा था कि यज्वपाल राजपरिवार का युवा सदस्य तनिष्क चयन प्रक्रिया में हिस्सा नही ले सकता है । 
तनिष्क और शांतनु आमने सामने आ चुके थे ,तनिष्क को देखकर शांतनु मन ही मन ये सोचकर बहुत खुश हो रहा था कि आज तो इस पगले को अच्छे से मजा चखाऊंगा तभी सेनापति रणेन्द्र ने अपने हाथ से  लाल कपड़ा गिरा दिया ,लाल कपड़े के गिरते ही दोनों के बीच मुकाबला शुरू हो गया ।


मुकाबला शुरू होते ही शांतनु तनिष्क की तरफ मुट्ठी बंद किए हुए झपटा। शांतनु को अपनी तरफ दौड़ कर आते देख तनिष्क में फुर्ती आ गयी और वो बगल में हट कर शांतनु के वार से बचने में कामयाब रहा। शांतनु के वार से बचे हुए तनिष्क को सही सलामत देख भीड़ की आंखें खुली की खुली रह गयी और यज्वपालों की सांस में सांस आई। शांतनु तनिष्क को ना ढेर कर पाने से झुंझला उठा और तनिष्क पर एक और वार करने के लिए झपटा।


इस बार तनिष्क ने खड़े खड़े अपने हाथों को ढाल बनाकर अपनी तरफ दौड़ कर आते शांतनु के वार को चिल्लाकर रोका। शांतनु के तनिष्क से टकराने पर जो हुआ वो देखकर सभी लोग सन्न रह गए। दोनों के टकराते ही धूल का एक गुबार उठा जिसके हटने के बाद दिखाई दिया कि तनिष्क तो अपनी जगह पर वैसे का वैसा खड़ा है लेकिन शांतनु कई कदम दूर गिरा पड़ा है और उसके मुंह से खून निकल रहा है। शांतनु ने कुछ देर दोबारा उठने की कोशिश की लेकिन आखिरकार वो अचेत होकर ज़मीन पर लेट गया।
शांतनु के धराशाई होते ही सारी सभा मे सन्नाटा फैल गया। आस पास इकट्ठा भीड़ में हर किसी का मुह खुला का खुला रह गया। शांतनु और तनिष्क के टकराने के बाद उठा धूल का गुब्बारा इतना गाढ़ा था कि किसी को कुछ साफ साफ दिखाई नही दिया लेकिन इतना तो तय था कि तनिष्क ने कोइ प्रहार नही किया था क्योंकि टक्कर से पहले वो जिस मुद्रा में था टक्कर होने और धूल छंटने के बाद भी वो उसी मुद्रा में खड़ा दिखाई दिया था। पहले जो लोग तनिष्क का मज़ाक उड़ा रहे थे वो अब शांत हो चुके थे। उन्हें अपने देखे पर भरोसा नही हो रहा था। 


आस पास खड़े यज्वपाल परिवार के लोग भी कुछ देर पहले घटित हुई घटना को देखकर हैरान थे। मुकाबले में जीत हासिल करने के बाद तनिष्क ने पास में खड़े सेनापति रणेन्द्र के सामने विनम्रता से अपना सिर झुकाया और पीछे मुड़ भीड़ से दूर जाने लगा। तनिष्क जब अपनी जगह से हटा तो देखने मे आया कि जहां वो खड़ा था उस जमीन पर दरारें पड़ गयीं थीं।


मैदान से बाहर निकल तनिष्क सीधा किले के अंदर महल में स्थित अपने कक्ष की तरफ गया। क्योंकि परिवार के अधिकतर लोग बाहर हो रहे कार्यक्रम में गए थे, तनिष्क को महल में जाते वक़्त परिवार के किसी सदस्य ने नहीं देखा। इसके अलावा, महल के दरबान और चौकीदार तो वैसे भी तनिष्क की तरफ कभी ध्यान नही देते थे। तनिष्क को सब पागल समझते थे इसलिए उसकी अपने लोगों के बीच कोई अहमियत नही थी

महल के अंदर तनिष्क ने अपने भव्य और आलीशान कक्ष में प्रवेश किया। यज्वपाल परिवार में ऐसा निवास कुछ माननीय लोगों को ही मिला हुआ था। तनिष्क के पिता यज्वपाल परिवार के मुखिया के तीसरे भाई थे इसीलिए उसे ये भव्य कक्ष मिला।

तनिष्क जब अपने पिताजी का हाल-चाल लेने के लिए उनके कक्ष में आया तो उसने देखा कि उसके पिताजी एक नक्काशीदार कुर्सी पर धुत्त नशे की हालत में पड़े थे। अभी दिन ही चल रहा था लेकिन उसके पिताजी शराब का एक बड़ा पात्र खत्म कर चुके थे। तनिष्क ने "पिताजी, पिताजी" कहते हुए अपने पिता को नींद से जगाने की कोशिश की। 

तनिष्क की आवाज़ का नशे में डूबे उसके पिताजी ने कोई उत्तर नही दिया। तनिष्क अपने पिताजी के पास गया और उनके चेहरे पर आते लंबे बाल हटा कर उन्हें निहारने लगा। पिछले 16 सालों में तनिष्क की अपने पिताजी की अधिकतर यादें ऐसे ही नशे में डूबी हुई छवि की थी। उसके पिताजी यशादित्य यज्वपाल, यानी के यज्वपाल राजघराने के मुखिया के छोटे भाई, अक्सर अपने कक्ष में ऐसे ही शराब के नशे में सो जाया करते थे।


इतने में तनिष्क के पिताजी की आंख खुली और उन्होंने तनिष्क को अपने सामने देखा। तनिष्क को अपने सामने देख यशादित्य को होश आया और उन्होंने तनिष्क से उसका हालचाल पूछा। यशादित्य को अपनी कुर्सी से उठने में तनिष्क ने मदद की। तनिष्क ने गौर किया कि उसके पिता से शराब की बू आ रही थी। तनिष्क अपने पिताजी को सहारा देकर उनके बिस्तर पर लेकर जा रहा था कि उसके पिताजी लड़खड़ा कर गिर गए।

तनिष्क अपने पिता को संभालने के लिए आगे बढ़ा तो उसके पिता ने उसे रुकने का इशारा किया और कहने लगे, "कोई ज़रूरत नही है, मेरी शराब खत्म हो गई है, मैं अभी नौकर से कह कर और मंगवाता हूं।" इसके बाद यशादित्य ने ज़मीन पर पड़े पड़े ही अपने शाही नौकर को आवाज़ लगानी शुरू कर दी और कुछ देर में वो फिर से सो  गये , अपने पिता की ऐसी हालत देख तनिष्क को बहुत दुख हुआ।

उसने हताशा भरे लहज़े में सामने ज़मीन पर धुत्त पिताजी से सवाल किया, "पिताजी, आप इतनी क्यों पीते हैं " लेकिन पिता जी ने कोई उत्तर नहीं दिया , वहां कुछ देर खड़े रहने के बाद तनिष्क ने पास पड़ी मेज़ से पानी पिया और अपने कक्ष की तरफ चला गया