तीन अलग-अलग कमरे – एक ही रात
1) करन का कमरा – अंधेरा, सन्नाटा, टूटा हुआ इंसान
कमरे में सिर्फ एक टेबल लैंप जल रहा है।
करन बिस्तर के कोने पर बैठा है—सीना पकड़े, आँखें लाल, चेहरा थका हुआ।
उसके हाथ काँप रहे हैं।
करन (अपने आप से, टूटी आवाज़ में) बोला -
कबीर… तू संभाल पाएगा ना उसे…?
मैं नहीं देख सकता उसे इस हालत में…।
वह श्रेया की साड़ी अपने हाथों में भींच लेता है।
उसकी आँखों से आँसू गिरते हैं—साड़ी पर छपते हुए।
गुस्से में खुद से कहता है—
क्यों इतना जुड़ गया मैं… क्यों?
सीने का दर्द बढ़ता है।
वह दीवार से टिककर बैठ जाता है… आँसू लगातार बह रहे हैं। यह वही करन है जिसे दुनिया मजबूत समझती है—पर आज वह अंदर से बिखर चुका है।
2) कबीर का कमरा – कम रोशनी, बिस्तर पर दो टूटे हुए लोग
कबीर श्रेया को अपनी बाँहों में लिए लेटा है।
श्रेया आधी बेहोशी में है—दर्द और थकावट से टूटी हुई।
कबीर उसकी पीठ सहला रहा है, खुद भी आँखों में आँसू लिए।
कबीर (फुसफुसाकर) बोला -
श्रेया…तुम ऐसा क्यों सहती हो… क्यों कुछ बताती नहीं…।
श्रेया हिलती तक नहीं।
वह बस कबीर की शर्ट कसकर पकड़े है—जैसे डर रही हो कि कोई उसे फिर से दर्द में धक्का न दे दे।
कबीर उसके माथे को चूमकर आँखें बंद कर लेता है…
पर बंद आँखों में सिर्फ एक ही आवाज़ गूंजती है—
“कल को मैं न रहा तो कैसे संभालेगा तू…”
कबीर की साँसें थरथरा जाती हैं।
कबीर (टूटकर फुसफुसाता है)—
भैया… आप ऐसा कैसे सोच सकते हो…
उसका आँसू श्रेया के गाल पर गिरता है।
श्रेया अपनी नींद में ही जैसे और सिमट आती है—
पर उसका शरीर काँप रहा है, जैसे डर अब भी पीछा न छोड़ रहा हो।
3) श्रेया की हालत – बेहोशी में भी दर्द
श्रेया को पूरी रात की हालत अब भी सताती है।
वह नींद में भी कराह रही है।
श्रेया (धीमी टूटती आवाज़ में) बोली -
…मुझे मत छोड़ो… दर्द… बहुत दर्द…
कबीर का दिल चीर जाता है। वह उसके सिर को अपने सीने पर रख देता है।
करन – साड़ी सीने से लगाए सिसकता हुआ।
कबीर – दो हाथों से श्रेया को सँभालता हुआ।
श्रेया – नींद में भी दर्द से काँपती हुई।
INT. करन का कमरा
करन उठकर दवाइयों की शीशी ढूंढता है।
एक गोली हाथ में लेता है…
पर कुछ सोचकर वापस रख देता है।
करन (हाथों को बालों में घुसाए) बोला -
नहीं… अगर मैं ही हार गया… तो ये दोनों किसके सहारे…
उसकी आँखों में फिर आँसू आ जाते हैं।
INT. कबीर का कमरा
कबीर अपनी साँसें रोककर श्रेया की साँस सुनने की कोशिश करता है।
उसकी उंगलियाँ श्रेया की गर्दन पर जाती हैं—heartbeat checking।
धीमे से मुस्कुराने की कोशिश करता है।
कबीर बोला -
ठीक हो…तुम ठीक हो… मैं हूँ न…
पर उसकी खुद की heartbeat तेज है—डर और चिंता से।
INT. श्रेया की नींद
श्रेया आधी नींद में भी कबीर की शर्ट भींचे हुए है।
उसके होंठ काँपते हैं—
श्रेया बोली -
क…करन जी… कबीर जी… मत…”
कबीर का चेहरा दर्द से विकृत हो जाता है।
कबीर बोला -
हम दोनों हैं… कोई नहीं जाएगा…
रात धीरे-धीरे बीतती है…
पर किसी के लिए भी आसान नहीं।*
करन अपने कमरे में रोते-रोते दीवार से टिककर सो जाता है।
कबीर श्रेया को बाहों में लिए सारी रात जागता रहता है। श्रेया नींद में भी अपने दर्द से लड़ती रहती है।
तीनों का डर एक ही कहीं कोई किसी को खो न दे।
KABIR–SHREYA का कमरा — सुबह
हल्की धूप पर्दों से छनकर आती है।
श्रेया कबीर के सीने से लगी जागती है।
कबीर उसकी पीठ पर अब तक हाथ रखे है—जैसे रातभर सोया ही न हो।
श्रेया धीरे से उठती है…चेहरा फीका… आँखें भारी… होंठ फट चुके।
कबीर उसकी तरफ देखता है—थका हुआ, पर कोमलता के साथ।
कबीर (धीमे) बोला -
कैसी तबीयत है…?
श्रेया हल्का सा सिर हिलाती है—
“ठीक हूँ” कहने की कोशिश… पर उसके चेहरे से साफ है, वो ठीक नहीं।
DINING AREA — कुछ देर बाद
करन नीचे बैठा है—चुप, गहरी आँखों में रात भर न सोने वाली लकीरें।
कबीर भी वहाँ पहुँचता है, पर दोनों एक-दूसरे को देख भी नहीं पाते।
करन (धीमे, टूटे स्वर में) बोला -
श्रेया कहाँ है?
कबीर सिर्फ सिर हिला हुए बोला—
तैयार हो रही है।
पर उसका चेहरा बता रहा है कि वह भी चिंतित है।
तीनों का साथ होना चाहिए था…
पर आज सिर्फ दो ही नीचे आए हैं।
BATHROOM – उसी समय
श्रेया washroom के आईने के सामने खड़ी है—साड़ी कसकर पकड़े हुए। अचानक उसके पेट में तेज दर्द उठता है। वह झुककर खून की उल्टी कर देती है।
श्रेया घबराकर दीवार से लग जाती है…
साँसें तेज… आँखें डरी हुई।
अचानक…
आईने में उसके पीछे कोई खड़ा है।
उसी की उम्र की एक लड़की बिल्कुल उसी जैसी दिखने वाली—
काले कपड़े… बिखरे बाल… और आँखों की लाल चमक जैसे ताज़ा खून।
एक खौफनाक मुस्कान उसके चेहरे पर।
आईने वाली “श्रेया” सिर तिरछा करती है…
और होंठ हिलाती है।
आईना-श्रेया बोली -
तू… बच नहीं पाएगी…
श्रेया डर से चिल्ला भी नहीं पाती।
उसकी आवाज गले में अटक जाती है।
उसके हाथ काँपने लगते हैं।
श्रेया (हकलाते हुए) बोली -
त…तू कौन है… कौन…?
आईने वाली लड़की फिर मुस्कुराती है—
और अचानक उस मुस्कान के साथ गायब हो जाती है।
श्रेया चीख नहीं सकी—
बस जमीन पर बैठकर सिसकने लगी।
श्रेया रोते हुए काँप रही है।
श्रेया (डरी हुई फुसफुसाहट में) बोली -
मत मारो… प्लीज़ मत… मुझे मत…
तभी बाहर से तेज कदमों की आहट।
Kabir बोला -
Shreya! दरवाज़ा खोलो!
श्रेया लड़खड़ाती हुई दरवाज़ा खोलती है और कबीर से जोर से लिपट जाती है।
उसकी साँसें टूट रही हैं… हाथ ठंडे… आँखें खून-खून हो चुकी।
श्रेया (रोते-रोते चीखकर) बोली -
का… कबीर ji… वो… वो मुझे मार देगी…
वो मुझे मार देगी… पीछे खड़ी थी…।
कबीर घबरा जाता है—
उसके बाल सहलाते हुए उसे पकड़ लेता है।
कबीर (बहुत घबराए हुए) बोला -
कौन? कौन था?!
श्रेया कुछ कहने ही वाली होती है कि उसकी आँखें उलट जाती हैं। उसका शरीर ढीला पड़ जाता है—
वह कबीर की बाहों में ही बेहोश हो जाती है।
HALL — कुछ सेकंड बाद
कबीर उसे उठाकर भागते हुए नीचे लाता है।
चेहरा सफेद… हाथ काँपते हुए।
करन खड़ा होते ही समझ जाता है कि कुछ बहुत खराब हुआ है।
करन (चीखकर) बोला -
श्रेया!
कबीर की आवाज टूट चुकी है—
कबीर बोला -
भैया… वो… बेहोश हो गई…
खून की उल्टी की है… वो डर गई…।
करन दौड़कर दोनों की ओर आता है।
श्रेया करन की तरफ सुन भी नहीं सकती—पर उसके शरीर का डर अभी भी काँप रहा है।
कमरे में सन्नाटा है।
तीनों की धड़कनें बस दर्द और डर से चल रही हैं।
श्रेया बेहोश
कबीर टूट चुका
और करन उसके पास घुटनों पर गिरता हुआ
तीनों एक ही डर में—
श्रेया कहीं हाथ से न निकल जाए।
SHREYA–KABIR का कमरा — रात
रात का सन्नाटा पूरे घर पर भारी है।
कहीं दूर घड़ी की टिक-टिक गूँज रही है।
कमरा आधा अँधेरा—बस एक पीली नाइट लाइट जल रही है।
कबीर थका हुआ, आँखों में नींद का नाम तक नहीं,
सोफ़े पर बैठा हुआ shreya को घूर रहा है।
Shreya बिस्तर पर बैठी है—
न पूरी तरह होश में,न पूरी तरह बेहोश।
बस दीवार को घूरती जा रही है जैसे वहाँ कोई खड़ा हो।
Shreya (धीमे, बुरी तरह डरी हुई फुसफुसाहट में) बोली -
तू फिर आ गई…?
कबीर चौंककर उठता है।
कबीर बोला -
कौन…? किससे बात कर रही हो तुम?
Shreya अपनी उँगली हवा में किसी की तरफ उठाती है पर वहाँ कोई नहीं है।
उसकी आँखें खून से भरी, काँपती आवाज़—
वो… वो मुझे मार देगी, कबीर जी…
वो मेरे जैसी दिखती है…वही चेहरा… वही आँखें…पर… बहुत भयानक…
कबीर का दिल जैसे जमीन पर गिर जाता है।
कबीर बोला -
Shreya… यहाँ कोई नहीं है, सुनो मेरी बात—
पर तभी—
श्रेया अचानक पागलों की तरह चारों तरफ देखने लगती है। वो बिस्तर से उतरकर अलमारी की तरफ भागती है। कबीर भी पीछे भागता है।
Shreya अलमारी खोलती है और अचानक उसके हाथ में एक चाकू आ जाता है जो सब्जियाँ काटने वाला रखा था। उसकी आँखें लाल…हाथ काँपते हुए…
वो चाकू ऊपर उठा लेती है।
कबीर (डर के मारे चिल्लाते हुए) बोला -
श्रेया, नीचे रखो! किसे मारोगी?!
श्रेया काँपती आवाज़ में बोली—
वो… वहाँ खड़ी है…वो मुझे मारने आई है…
मैं… मैं पहले उसे मार दूँगी…!
कबीर धीरे-धीरे उसके करीब आता है—
बहुत धीरे। मानो किसी बच्चे को मनाया जा रहा हो।
कबीर उसका हाथ पकड़ता है—
पर shreya चीखती है और चाकू हवा में झटक देती है। कबीर का हाथ कट जाता है।
कबीर बोला -
आह— श… shreya!
Shreya को कुछ समझ नहीं आता।
वो फिर दीवार की ओर घूरने लगती है।
Shreya बोली -
वो… मुस्कुरा रही है…कबीर जी, वो… मुस्कुरा रही है…
वो कह रही है मैं आज नहीं बचूँगी…
कबीर की आँखों में डर उतर आता है।
उसे समझ आता है—
यह कोई साधारण बीमार मानसिक स्थिति नहीं है।
यह गहरा hallucination है…
और shreya हर दिन इससे हार रही है।
ROOM — पलभर बाद
Shreya अचानक चीखती है,
और फिर उसी जगह फर्श पर गिर जाती है।
कबीर दौड़कर उसके पास आता है—
Shreya बेहोश।
उसकी साँसें तेज…धड़कन बेकाबू।
कबीर उसे गोद में उठाता है और फुसफुसाता है—
कबीर (टूटे स्वर में) बोला -
तुम्हारे साथ क्या हो रहा है, shreya…?
कौन है ये जो तुम्हें मेरे सामने छीन रहा है…?
कबीर उसे कसकर पकड़ता है,
चाकू दूर फेंक देता है और रोते हुए उसके माथे को चूमता है।
कबीर बोला -
मैं हूँ ना…तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा…
कुछ भी नहीं…
पर उसकी आँखों में साफ लिखा था—वो खुद डरा हुआ था।
KABIR’S ROOM — रात देर से
श्रेया बेहोश होकर कबीर की गोद में लेटी है।
कबीर अभी भी जाग रहा है…
उसका हाथ थामे हुए।
उसके कटे हुए हाथ से खून बह रहा है,
पर उसे अपने दर्द की परवाह नहीं।
वो सिर्फ एक ही डर से काँप रहा है—
अगर कल रात…Shreya ने चाकू खुद पर चला दिया तो?
या किसी और पर…?
कबीर की आँखों से आँसू बहते हैं।
कबीर (फुसफुसाहट में खुद से) बोला -
भैया… काश आप पास होते…
मैं अकेला संभाल नहीं पा रहा…।