मुंबई की वह पहली रात किसी ठंडे कफन जैसी थी. शांति निवास' नाम की उस जर्जर और पुरानी इमारत के कमरा नंबर तीन सौ दो में कदम रखते ही मुझे अहसास हो गया था कि यहाँ कुछ तो बहुत बडा और भयानक गलत है. कमरे के हर कोने में मकडी के जाले इस तरह फैले थे जैसे वे सालों से किसी शिकार का इंतजार कर रहे हों. दीवारों से झडती पपडी और सीलन की बदबू जैसे कोई दफन हो चुकी पुरानी दास्तां सुना रहे थे. बाहर मुंबई की भारी और गरजती हुई बारिश शुरू हो चुकी थी—वही बारिश जो टीवी पर खूबसूरत लगती है, लेकिन उस वक्त वह किसी की चीख को दुनिया से छुपाने की एक साजिश जैसी लग रही थी. हर गिरती बूंद की आवाज कमरे के सन्नाटे को और भी ज्यादा डरावना बना रही थी.
मैंने फर्श पर अपना फटा हुआ पुराना थैला रखा और खुद के कांपते हाथों को शांत करने की कोशिश की. भूख से पेट में मरोड उठ रही थी, तो मैंने जेब से बिस्किट का एक पैकेट निकाला. वह पसीने और बारिश से थोडा गीला हो चुका था, लेकिन जैसे ही मैंने पहला निवाला लिया, वह पत्थर की तरह गले में ही फंस गया. मेरा पूरा शरीर पसीने से तर- बतर था. मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कोई अदृश्य ताकत उस अंधेरे कोने में खडी होकर मेरी हर सांस को गिन रही है. तभी अचानक, कमरे की खिडकी का भारी पल्ला जोर से दीवार से टकराया—' ठांय!
मैं डर के मारे अपनी जगह से दो फीट ऊपर उछल पडा. धडकनें इतनी तेज थीं कि ऐसा लग रहा था सीना फाडकर बाहर आ जाएंगी. पल्ले को बंद करने के लिए जब मैं खिडकी के पास पहुँचा और उसे पकडा, तो मेरी नजर नीचे सडक पर पडी. वहां जो देखा, उसने मेरे खून को जमा दिया. पीली स्ट्रीट लाइट के धुंधले घेरे में वही बूढा आदमी खडा था, जिसने मुझे अंदर आने का रास्ता बताया था. वह मूसलाधार बारिश में पूरी तरह भीग रहा था, लेकिन पत्थर की मूर्ति की तरह टस से मस नहीं हुआ. वह ऊपर सीधे मेरी खिडकी की तरफ ही घूर रहा था. उसके चेहरे पर वही डरावनी, बिना दांतों वाली मुस्कान थी, जो अब और भी ज्यादा खौफनाक लग रही थी. उसने धीरे से अपना झुर्रियों वाला हाथ उठाया और मुझे' बाय' किया, जैसे वह पहले से जानता हो कि मैं इस कमरे से अब कभी जिंदा या सही सलामत वापस नहीं निकलने वाला.
मेरे शरीर का एक- एक रोंगा खडा हो गया. मैंने झटके से खिडकी बंद की और लोहे की कुंडी चढा दी. तभी, बगल के कमरे नंबर तीन सौ तीन से वह अजीब सी' घसीटने' की आवाज फिर से आने लगी. चर्ररर. चर्ररर. ऐसा लग रहा था मानो कोई बहुत भारी बोरा, या शायद कोई ताजी लाश फर्श पर खींची जा रही हो. और फिर, एक बहुत ही मद्धम और दर्द भरी सिसकी सुनाई दी. वह एक औरत की आवाज थी, जो सिसकते हुए मेरा नाम पुकार रही थी.
इकबाल. ओ इकबाल. यहाँ से भाग जा. इससे पहले कि वो दरवाजा खोल दे, यहाँ से भाग.
मेरे पैरों तले जैसे जमीन ही गायब हो गई. इस सात करोड की भीड वाले शहर में, जहाँ मैं अभी कुछ घंटे पहले उतरा था, वहां मुझे कोई कैसे जान सकता था? मेरा नाम उस अजनबी और अदृश्य औरत को कैसे पता चला? क्या यह मेरे दिमाग का कोई वहम था या उत्तर प्रदेश के उस बीते हुए कल का कोई साया, जिसे मैं पीछे छोडने की कोशिश कर रहा था, वो यहाँ तक मेरा पीछा करते हुए आ गया था? मेरा दिमाग अब जवाब देने लगा था.
मैंने आखिरी बार हिम्मत जुटाई और कांपते हाथों से कमरे का दरवाजा खोलकर बाहर गलियारे में झांका. रोशनी वाला वह एकमात्र पीला बल्ब अब पूरी तरह बुझ चुका था. पूरे लंबे कॉरिडोर में घुप अंधेरा था, जिसे मेरे मोबाइल की टॉर्च की हल्की सी रोशनी चीरने की कोशिश कर रही थी. तभी मेरी नजर बगल वाले कमरे नंबर तीन सौ तीन के दरवाजे के नीचे पडी. वहां से कुछ गाढा और काला सा तरल पदार्थ धीरे- धीरे बहकर बाहर आ रहा था. मैंने टॉर्च की रोशनी नीचे की, तो मेरा कलेजा मुंह को आ गया. वह गहरा लाल, ताजा खून था, जो रेंगता हुआ सीधे मेरे जूतों की तरफ बढ रहा था. ऐसा लग रहा था मानो वह खून खुद एक जिंदा चीज हो और मुझे छूना चाहता हो.
उसी पल मेरा फोन पागलों की तरह वाइब्रेट हुआ. स्क्रीन पर फिर वही' अज्ञात नंबर' (Unknown Number) चमक रहा था. दिल थामकर मैंने मैसेज खोला, उसमें सिर्फ एक खौफनाक लाइन लिखी थी:
पीछे मत मुडना. वह ठीक तुम्हारे कंधे के पीछे खडी है और उसका खंजर तुम्हारी गर्दन पर है.
पसीने की एक बर्फीली बूंद मेरी रीढ की हड्डी से होती हुई नीचे उतर गई. मैंने सच में अपनी गर्दन के ठीक पीछे किसी की बहुत ठंडी और सडी हुई सांसें महसूस कीं. कमरे की हवा में अचानक वही पुरानी और नशीली इत्र की महक इतनी तेज हो गई कि मेरा दम घुटने लगा. मेरी आंखों के सामने धुंध छाने लगी. मैंने बहुत ही धीरे से, अपनी जान हथेली पर रखकर गर्दन घुमाई.
वहां कोई चेहरा नहीं था, बस एक बहुत लंबा, सफेद और धुंधला साया था. उसके हाथ में एक पुराना तांबे का लॉकेट था—वही लॉकेट जो मैंने बरसों पहले यूपी के अपने गांव के उस आखिरी मेले में खो दिया था, जिस दिन सब कुछ बर्बाद हुआ था. उस साये ने अपना काला पड चुका हाथ बढाया और वह लॉकेट मेरी कांपती हुई हथेली पर रख दिया. उसकी उंगलियां काली, लंबी और नुकीली थीं, जैसे किसी मुर्दे की सूखी हुई हड्डियां हों.
इसे संभाल कर रख लो, इकबाल. यह तुम्हें कल सुबह का सूरज देखने तक जिंदा रखेगा, एक फटी हुई और रूह को चीर देने वाली आवाज कमरे में गूँजी. वह आवाज इंसान की नहीं लग रही थी, वह दीवारों के अंदर से आ रही थी.
इससे पहले कि मैं एक शब्द भी बोल पाता, पूरी बिल्डिंग में बिजली कडकी और एक जोरदार धमाका हुआ. मैं अपना संतुलन खो बैठा और जोर से फर्श पर गिर पडा. कुछ पलों के लिए अंधेरा छा गया. जब मेरी आँखें खुलीं, तो कमरा बिल्कुल शांत था. न वहां वह खून था, न वह साया. लेकिन मेरी मुट्ठी कसी हुई थी—जब मैंने उसे खोला, तो वही ठंडा और भारी तांबे का लॉकेट मेरी हथेली पर चमक रहा था.
तभी फोन फिर से बजा. इस बार एक फोटो आई थी. वह उस बूढे चौकीदार की थी, लेकिन वह एक पुराने अखबार की' शोक संदेश' वाली कटिंग थी. उसके नीचे लिखे अक्षरों ने मेरे पैरों के नीचे से दुनिया ही खिसका दी—' शांति निवास के चौकीदार की रहस्यमयी मौत: एक हजार नौ सौ पचानवे'
मेरा सिर चकराने लगा. जिस आदमी से मैं अभी बात कर रहा था, जिसने मुझे यह कमरा दिया, वह तीस साल पहले मर चुका था! मैं एक कब्रिस्तान के बीचों- बीच खडा था.
मैं पागलों की तरह मुख्य दरवाजे की तरफ भागा, उसे खोलने के लिए अपनी पूरी जान लगा दी, लेकिन दरवाजा जैसे लोहे की दीवार बन चुका था. बाहर से किसी ने उसे लॉक कर दिया था, जबकि वहां कोई ताला था ही नहीं. तभी कमरे के उस बडे से पुराने आईने पर बाहर की ठंडक से भाप जमने लगी और उस पर किसी ने अपनी उंगलियों से शब्द लिखे—" अधूरा प्यार. अधूरी मौत. और अब तुम्हारी बारी, इकबाल!
मैं जोर से चीखना चाहता था, पर गला जैसे किसी ने दबा दिया हो. तभी कमरे की छत से खून की मोटी- मोटी बूंदें मेरे चेहरे पर टपकने लगीं. एक. दो. तीन. और फिर अचानक पूरा कमरा उस औरत की डरावनी हंसी से गूंज उठा. मुझे समझ आ गया था कि मैं किसी ऐसी ताकत के जाल में फंस चुका हूँ, जिसका नाता मेरे उन राजों से है जिन्हें मैं दफन समझता था. अचानक कमरे की बत्ती एक सेकंड के लिए जली, और मैंने देखा कि आईने में मेरे पीछे वह औरत खडी थी, जिसकी आँखें नहीं थीं, सिर्फ खून बह रहा था, और उसने धीरे से मेरे कान में फुसफुसाया—" स्वागत है मुंबई में, मेरे' अधूरे प्यार'
क्या इकबाल का' अधूरा प्यार' अब' अधूरी मौत' का खौफनाक मंजर बन चुका है?
शांति निवास के कमरा नंबर तीन सौ दो की वो रात, जहाँ दीवारों से खून रिस रहा है और तीस साल पहले मर चुका चौकीदार खिडकी के बाहर से मुस्कुरा रहा है. इकबाल के हाथ में वो तांबे का लॉकेट क्या किसी पुरानी साजिश का हिस्सा है? और वो बिना आँखों वाली औरत, जो आईने में खडी होकर' स्वागत' कर रही है, क्या वो सच में मुस्कान है?
इस अध्याय ने साबित कर दिया है कि मुंबई की भीड से ज्यादा खतरनाक इकबाल का वो अतीत है जिसे वो पीछे छोडने की कोशिश कर रहा था.
अब सबसे बडा सवाल: क्या इकबाल उस बंद कमरे से जिंदा बाहर निकल पाएगा? उस तांबे के लॉकेट के अंदर ऐसा क्या छिपा है जिसने साये को भी उसे बचाने पर मजबूर कर दिया? और वो रहस्यमयी मैसेज भेजने वाला' अज्ञात नंबर' किसका है?
अपनी राय कमेंट्स में बताएं: क्या आपको लगता है कि इकबाल को उसके अपनों ने ही इस मौत के जाल में फंसाया है?
अगले अध्याय (अध्याय चार) में देखिये: श्मशान की वो खूनी रात' —जहाँ मुर्दे भी इकबाल के गुनाहों की गवाही देंगे! (अभी पढना न भूलें, वरना सस्पेंस अधूरा रह जाएगा! )(3)
क्रमशः
लेखक: इकबाल राज