भाग ३
राम: रामौ रामा: प्रथमा
रामन रामौ रामान द्वितीया...
इस तरह से हमारा संस्कृत अध्ययन शुरू हुआ। वो सुभाषित याद करना, रूप चलना, आत्मनेपद, परस्मैपद, उभय पद इन सब के बीच के अंतर, उस भाषा का व्याकरण बारीक नक्षीदार गहने की बनावट की तरह ही क्लिष्ट था। जहां उस किताब को पढ़ना भी जीभ की अच्छी खासी कसरत थी, वहां ये सब याद करना मतलब दिमाग का दही करना, और संस्कृत जैसे विषय को रटने के अलावा कोई पर्याय नहीं था, यह भी पता था। शौक किस तरह धीरे-धीरे मानसिक तनाव में बदलता है इसका मुझे पहली बार ही अनुभव हुआ था। और मुझे उसका डर सताने लगा, और फिर हमेशा की तरह मैंने सुनी से इस विषय पर बात की...
" सुनी , मैंने संस्कृत लिया तो है मगर यह हलवा खाने जितना आसान भी नहीं है रे। कैसे- कैसे नियम हैं उस भाषा के। जरा मुश्किल लग रहा है। और मुझे तुम्हारी मदद की जरूरत पड़ेगी ही।" मैंने कहा
" वो तो अच्छी बात है की तू ने खुद ही इस बारे में बात की मोटू... मैं भी तुझे इस बारे में कहने ही वाली थी। हम संस्कृत की ट्यूशन लगवा लेते हैं। साइंस और मैथ्स फिर भी ठीक है यार, लेकिन इतनी मुश्किल भाषा की व्याकरण स्कूल के एक घंटे के पिरियड में समझ आना मुझे तो मुश्किल लग रहा है... मैं ढूंढती हूं ट्यूशन...रूक। " वह बोली
इसका मतलब यह था कि कम नंबर आने का डर उसे भी सता रहा था। अभी तक हमने कभी ट्यूशन नहीं लगाई थी। पर अब कम से कम इस विषय के लिए तो जरूरी थी। फिर उसने सीनियर से बात करके ट्यूशन क्लास ढूंढ निकाली।घर से करीब एक किलोमीटर पर वो क्लास थी। स्कूल से आने के बाद थोड़ा कुछ खाकर होमवर्क करके हम सीधे ट्यूशन पढ़ने जाते। यह हमारा रूटीन बन गया था। ज्ञान दीप क्लासेस में हम दोनों ने संस्कृत की ट्यूशन लगवा ली। सुनी ने मेरी मम्मी से बात की थी , तो इजाज़त ना मिलने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। स्कूल से आने के बाद साथ में पढ़ते थे और फिर शाम को ट्यूशन डबल रिवीजन हो जाती थी। इस वजह से हमारे आत्मविश्वास में बढ़ोतरी हुई। उस ट्यूशन में हमारी और A सेक्शन के भी बच्चे थे।
क्लास में अब संस्कृत के पीरियड में सुनी सवालों के जवाब भी देने लगी थी। होशियार होने के कारण उसका यह करना स्वाभाविक था। अब मेरी भी संस्कृत की डोमेस्टिक फ्लाइट सिर के ऊपर से नहीं जाती थी मुझे भी अब उस विषय में गति मिलने लगी थी। लेकिन फिर भी हाथ उठा कर जवाब देने का साहस मुझ में अभी भी नहीं आया था।
एक बार एक क्रियापद के रूप चलाते समय सुनी ने दिए हुए जवाब को सर ने गलत कहा...
"कौन जवाब दे सकता है", ऐसा सर के पूछते ही एक हाथ ऊपर आया। सचिन ने सही जवाब देते हुए सुनी को मात दी थी । तब वह उसकी नजरों में चढ़ा हुआ मैंने देखा । सुनी पल्लवी के कान में कुछ बुदबुदाई यह भी मैंने देखा । मुझे सही जवाब पता था, लेकिन खुद को पीछे खींचने का मेरा स्वभाव ही मुझे मात दे गया। मैंने सही जवाब दिया इस बात का समाधान सुनी के चेहरे पर देखने को मिल सकता था ,लेकिन वह संधि मेरे हाथ से निकल गई। लेकिन सुनी का एक दो बार उसकी तरफ देखना मैंने देखा।
समर नाम का B सेक्शन का वह लड़का, जो सचिन की तरह ही खेलकूद में आगे था , सचिन को देखकर ठीक उसी वक्त मुस्कुराना आज भी मुझे याद है । मुझे बेचैन होने की कोई जरूरत नहीं थी , फिर भी मैं हुआ। वह किस लिए उसका कारण मुझे उस वक्त नहीं मिला था। लेकिन किसी भावना की नींव तैयार हो रही है इस बात की गवाही मेरा मन दे रहा था। कुछ तो पक रहा था ,कुछ तो था जो तय हो रहा था। मेरे मन पर उलझन की एक परत जमने लगी थी। सचिन कुछ हरकतें जानबूझकर कर रहा है यह मुझे समझ आने लगा था।
एक बार ट्यूशन से लौटते हुए सुनी ने कहा...
" मोटू तुझे वह सचिन पता है क्या, सचिन गाडे।" मैं थोड़ा चौंक गया पेट में कुछ अजीब सी हलचल हुई। सुनी उसके बारे में क्यों बोल रही है।
"हां पता है क्लास में मेरे साथ ही तो H सेक्शन से B सेक्शन में आया है ना ...क्या हुआ।" मैंने कहा
" अरे कुछ नहीं अपनी और A सेक्शन के काफी लोगों ने ट्यूशन लगाई है संस्कृत की। पर देख ना हम ट्यूशन लगाकर पढ़ रहे हैं और वह सचिन...बिना ट्यूशन के भी उसे सब्जेक्ट के बारे में कितना पता है। वह तो सिर्फ स्कूल की क्लास में पढ़ते हैं उतना ही पड़ता है। मुझे पल्लवी बता रही थी, उसके घर में उसे टिफिन पहुंचने का काम करना पड़ता है। उसकी मामी टिफिन सेंटर चलती है। सुना है मामा दीवार रंगने का और कारपेंटर का काम करते हैं। उसकी मां गांव में रहती है, खेती करती है। उसके पिताजी नहीं है। उसे पढ़ने के लिए यहां मामा के पास भेजा है। मतलब उसके घर के हालात ठीक नहीं है, फिर भी वह पढ़ाई और खेलकूद दोनों बहुत होशियार है। यह बात मुझे बड़ी खास लगती है । अपने हालात को समझने वाला समझदार लड़का लगता है मुझे।" वह बोली
" अच्छा उसके बारे में इतना कुछ मुझे नहीं पता। हम एक ही सेक्शन में थे, पर कभी पहचान नहीं हुई उससे। वह इतनी मेहनत कर रहा है, यह तो अच्छी बात है, पर पहले इतना आगे नहीं था वह। लेकिन पिछले साल से उसमें सुधार हुआ है। मेरे बाद पोजीशन हासिल की है इसने। " जो मुझे पता था मैंने बोल दिया ।
"मेहनत करने वाले के बारे में हमेशा आदर रखना चाहिए ऐसा पापा कहते हैं। और ऐसी मेहनत करने वाला निश्चित ही बहुत आगे जाता है। इतनी कठिन परिस्थिति से दो हाथ करने वाले लोग मुझे पसंद है, एकदम fighter type." वह बोली
"हां बिल्कुल सही कहा अंकल ने , पर मेहनत तो तू भी करती है। हमेशा क्लास में फर्स्ट आती है। मुझे तेरा बड़ा अभिमान है। तू भी तो fighter type है ।" मैं बोला
"मैं...?? मोटू सुन मेरी बात हमें मम्मी पापा और उनके द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं के कारण हमारे हालात बहुत बेहतर है। उसके साथ ऐसा नहीं है। बुरे हालातों पर मात करता हुआ वह आगे बढ़ रहा है।" वह बोली
अब मेरा सोचने वाला दिमाग दो हिस्सों में बंट गया, और मुझे तकलीफ दे रहा था। सुनी को उसके बारे में जानकारी होना इस बात से मुझे क्यों फर्क पड़ रहा था...?? वह हमारी ही क्लास में है तो जानकारी रखने में क्या हर्ज है, मेरा मन एक गवाही इस तरह भी दे रहा था । पर तभी दूसरा मन बोल रहा था कि सचिन की उसके ऊपर छाप पड़ने से उनके बीच नजदीकियां या दोस्ती बढ़ने लगी तो..?? उस बात की भी मुझे तकलीफ होनी चाहिए...??मेरी ही गलती का एहसास मुझे उसे वक्त हुआ।
सुनी चाहे जितनी भी डैशिंग हो पर वह उतनी ही संवेदनशील थी, यह उसकी सबको मदद करने की आदत पर से मुझे अच्छी तरह पता था। शायद इस वजह से उसे दया आई होगी। बाद में मुझे ऐसा लगा सुनी के करीब किसी का आना, इसका मतलब यह तो नहीं है कि सुनी मुझसे दूर हो जाएगी। यह खुद को समझाते हुए मैंने मन को शांत किया।
यह कितना योग्य था यह उस वक्त कोई बता नहीं सकता था। बाकी कुछ भी हो पर सुनी सचिन से थोड़ी ही सही इंप्रेस हुई थी। सचिन भी सुनी की तरफ दोस्ती करने के उद्देश्य से आया तो उसकी तरफ से सकारात्मक ही प्रतिसाद मिलने के चांसेस ज्यादा थे। सुनी की तरफ से मुझे बाकी किसी के प्रति इतनी चिंता नहीं होती थी, जितनी सचिन की तरफ से होती थी। पता नहीं क्यों कुछ ठीक नहीं लग रहा था ।
हमारी दोस्ती के शांत तालाब में डुबुक करके एक पत्थर आ गिरा था। उसके कारण पैदा हुई तरंगे बढ़ते हुए खत्म होती हैं, या लहरें उठाती हैं, यह आने वाला वक्त ही बताएगा। सचिन की तरफ से उसका हेतु स्पष्ट होने तक इंतजार करना होगा। मुझे यह भी पता था कि सचिन ने सुनी के दिमाग में ली हुई जगह इतनी जल्दी बड़ा रूप लेने वाली नहीं थी।
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लाखों आएंगे और जाएंगे ज़माने की दस्तूर की तरफ,
तुम ठहरे रहना दिल में सुकून की तरह।
वक्त चाहे कैसा भी हो मुझे परवाह नहीं ,
तेरा मेरे साथ रहना ही काफी है वजूद की तरह।
क्रमशः
मूल लेखक :- शब्द भ्रमर
अनुवादकर्ता:- शब्द सरिता