उनकी हालत अब ऐसी हो चुकी थी कि वे तीन लोग नहीं रहे थे एक ही साँस में बँधे तीन दिल बन गए थे।
अब अगर चोट एक को लगती, तो कराह तीनों के भीतर उठती। अगर आँसू एक की आँख से गिरते,
तो दिल दो और के भीग जाते।
दोपहर का समय था। तीनों छत पर बैठे थे। हल्की धूप थी, मगर मन में अजीब-सी बेचैनी। कबीर पानी लेने उठा। सीढ़ियों से उतरते समय उसका पैर फिसला।
आह!
आवाज़ छोटी थी, मगर असर गहरा। कबीर ज़मीन पर बैठ गया, उसके पैर से खून रिसने लगा। उसी पल—
श्रेया का दिल धक से रह गया। वह बिना देखे ही खड़ी हो गई।
श्रेया (घबराकर) बोली -
कबीर जी को कुछ हुआ है…
करण ने उसकी ओर देखा। उसकी छाती में अचानक तेज़ चुभन हुई।
करण (हाथ सीने पर रखकर) बोला -
हाँ…कुछ ग़लत है।
दोनों दौड़कर नीचे पहुँचे। कबीर ज़मीन पर बैठा था,
चेहरा पीला पड़ चुका था। श्रेया उसके पास घुटनों के बल बैठ गई।
श्रेया (काँपती आवाज़ में) बोली -
बहुत दर्द हो रहा है?
कबीर दर्द से ज़्यादा उसे देखकर टूट रहा था।
कबीर बोला -
पैर में नहीं…आपको डरते देखकर यहाँ दर्द हो रहा है।
श्रेया की आँखें भर आईं। उसने तुरंत दुपट्टे से उसका पैर बाँधा। करण पास खड़ा था। मगर उसकी मुट्ठियाँ भिंची हुई थीं।
श्रेया (करण को देखकर) बोली -
आप ठीक हो?
करण ने सिर हिलाया, मगर सच यह था कबीर की चोट
उसके सीने में धड़क बनकर धँस रही थी। कुछ देर बाद
कबीर लेटा हुआ था। श्रेया उसके सिरहाने बैठी थी। एक हाथ उसके माथे पर, दूसरा उसके पैर पर। करण कमरे के कोने में बैठा था। चुप। बेहद चुप। श्रेया ने उसकी तरफ देखा।
श्रेया बोली -
आप क्यों ऐसे बैठे हो… जैसे आपको चोट लगी हो?
करण ने नज़रें झुका लीं।
करण बोला -
क्योंकि लगी है…
श्रेया चौंकी।
श्रेया बोली -
कहाँ?
करण ने अपनी छाती पर उँगली रख दी।
करण बोला -
यहाँ…जब वो रोता है तो मुझे साँस लेना भारी लगने लगता है।
कबीर ने यह सुना। उसकी आँखें भर आईं।
कबीर (धीरे से) बोला -
भैया…माफ़ करना…।
करण तुरंत उसके पास आया और उसके बालों में हाथ फेर दिया।
करण बोला -
पागल है क्या…अगर तू रोएगा नहीं तो मैं ज़िंदा कैसे रहूँगा?
रात को कबीर की आँखों से आँसू निकल आए।
कबीर बोला -
आज बहुत दर्द है…
श्रेया ने उसे सीने से लगा लिया।
श्रेया बोली -
रो लीजिए…मैं हूँ।
उसी पल करण की आँखें भी भीग गईं। वह चुपचाप दीवार की तरफ़ मुँह करके अपने आँसू छुपाने लगा।
श्रेया ने पीछे देखा।
श्रेया (धीरे से) बोली -
आप भी रो रहे हो न…
करण ने कुछ नहीं कहा। बस सिर झुका लिया। श्रेया ने एक हाथ से कबीर को थामा, दूसरे हाथ से करण को बुला लिया।
श्रेया बोली -
जब एक को दर्द हो तो बाक़ी दो अकेले क्यों सहें?
तीनों एक साथ बैठ गए। एक रो रहा था, दो उसकी तकलीफ़ अपने भीतर समेटे थे। उस रात कबीर का पैर दुख रहा था, श्रेया का दिल काँप रहा था,बऔर करण की साँसें भारी थीं। पर किसी ने कहा नहीं क्योंकि
अब दर्द बाँटने की चीज़ नहीं था। वह तीनों का साझा सच बन चुका था।
तीनों एक-दूसरे से प्रेम करते थे। निस्वार्थ। बिना शर्त।
बिना तुलना। पर कहते हैं न नज़र सच में लगती है।
और इस बार नज़र किसी एक को नहीं, उनके रिश्ते को लगी थी। कॉलेज के गलियारों में फुसफुसाहटें शुरू हो गई थीं।
कोई बोला -
अरे, करण बड़ा है…श्रेया पर पहला हक़ तो उसी का होना चाहिए।
दूसरा बोला -
कबीर तो छोटा है, उसे बस साथ रख लिया गया है।
कबीर के कानों तक ये बातें पहुँचीं तो वह हँसकर टाल देता।
कबीर (खुद से) बोला -
लोग क्या जानें…प्यार उम्र से नहीं, दिल से होता है।
वहीं करण से भी लोग कहने लगे—
इतना क्या बाँटना…तुम्हारा हक़ है, तुम्हें पूरा मिलना चाहिए।
करण ग़ुस्से में जवाब देता—
हक़ बाँटने की चीज़ नहीं होता। प्यार है वो।
शुरू में तीनों ने किसी की बातों पर ध्यान नहीं दिया।
शामें पहले जैसी थीं। हँसी पहले जैसी थी। श्रेया दोनों के बीच पहले जैसी ही रहती थी। पर शब्द बीज की तरह होते हैं आज न दिखें, तो कल जड़ पकड़ लेते हैं।
एक दिन श्रेया करण के साथ बैठी थी। कबीर दूर से देख रहा था। पहले वह मुस्कुराया। फिर
उसके मन में किसी की आवाज़ गूँजी—
तुम्हें उतना प्यार नहीं करती…
कबीर का चेहरा उतर गया।
उसने ख़ुद से कहा—
नहीं…ये सब झूठ है।
पर दिल दिमाग़ की नहीं सुनता। उसी रात करण चुप-सा था।
श्रेया ने पूछा—
क्या हुआ?
करण ने जवाब दिया—
कुछ नहीं।
पर सच ये था
कि उसके भीतर भी कोई कह रहा था—
तुम बड़े हो…तुम्हें ज़्यादा मिलना चाहिए।
धीरे-धीरे छोटी-छोटी बातें बदलने लगीं। कबीर अब हँसते हुए भी बीच-बीच में चुप हो जाता। करण ज़्यादा गंभीर रहने लगा। श्रेया सब महसूस कर रही थी पर समझ नहीं पा रही थी कि दरार कहाँ से आई।
एक शाम तीनों साथ बैठे थे। श्रेया बीच में थी। पर पहली बार उसने महसूस किया कि दोनों के बीच दूरी है।
श्रेया (धीरे से) बोली -
आज आप दोनों ऐसे क्यों लग रहे हो जैसे पास होकर भी दूर हो?
कबीर ने नज़रें झुका लीं। करण ने खिड़की की ओर देख लिया। कोई बोला नहीं। उस रात कबीर अकेला बैठा रहा।
कबीर (आँखें भरकर) बोला -
अगर सच में मैं कम ज़रूरी हूँ तो…।
वाक्य पूरा नहीं कर पाया। उधर करण अपने कमरे में टहल रहा था।
करण (खुद से) बोला -
क्या मैं गलत हूँ जो कभी-कभी ज़्यादा चाहता हूँ?
और श्रेया वह दोनों कमरों के बीच खड़ी थी। उसने पहली बार महसूस किया कि जिस प्यार ने उन्हें जोड़ा था, वही प्यार अब सवालों में बदल रहा था।
श्रेया (आँसू पोंछते हुए) बोली -
अगर किसी तीसरे की बातों से हम बदल रहे हैं तो गलती बातों की नहीं…हमारी है।
पर तब तक बीज पड़ चुका था। और धीरे-धीरे तीनों बदलने लगे थे कोई चुप हो रहा था, कोई कठोर,और कोई टूटते रिश्ते को दोनों हाथों से थामे खड़ा था।
शाम का वक़्त था। घर में अजीब-सी ख़ामोशी पसरी हुई थी। वही ख़ामोशी, जो तूफ़ान आने से पहले होती है। कबीर चुपचाप बैठा था,बपर उसकी आँखों में सवाल थे। करण टहल रहा था, उसके क़दमों में ग़ुस्सा था। और बीच में श्रेया…जिसका दिल दोनों ओर खिंच रहा था।
अचानक कबीर बोला—
भैया, साफ़-साफ़ बताइए…क्या मैं आपके और श्रेया के बीच सिर्फ़ एक मजबूरी हूँ?
करण रुक गया।
करण (तेज़ स्वर में) बोला -
ये कैसी बात कर रहा है तू?
तुझे ऐसा सोचने की ज़रूरत किसने दी?
कबीर बोला -
लोगों ने नहीं…आपके व्यवहार ने दी है।
करण का ग़ुस्सा भड़क उठा।
करण बोला -
मेरे व्यवहार ने?
तो फिर तू क्यों हर बात में ख़ुद को कम समझने लगा है?
कबीर उठ खड़ा हुआ।
कबीर (आँखें लाल करके) बोला -
क्योंकि हर बार जब मैं पास आता हूँ तो लगता है जैसे मैं किसी का हक़ छीन रहा हूँ!
श्रेया बोली -
बस!
श्रेया की आवाज़ गूँजी। वह काँप रही थी।
श्रेया बोली -
कब बंद करोगे? कब तक मुझे वजह बनाओगे अपने झगड़ों की?
दोनों चुप हो गए। पर चुप्पी और ज़हरीली थी। करण ने गहरी साँस ली।
करण (थकी आवाज़ में) बोला -
फिर वही कर लेते हैं…जो पहले करते थे।
कबीर ने बिना देखे कहा—
हाँ…शायद वही ठीक रहेगा।
श्रेया की धड़कन रुक-सी गई।
श्रेया बोली -
क्या…क्या मतलब?
करण ने नज़रें झुका लीं।
करण बोला -
एक महीना मेरे साथ…एक महीना कबीर के साथ।
वाक्य पूरा हुआ और श्रेया अंदर से टूट गई।
श्रेया (काँपती आवाज़ में) बोली -
तो मैं फिर से समय बन जाऊँ?
कैलेंडर का पन्ना?
कबीर ने कुछ कहना चाहा पर शब्द नहीं निकले। श्रेया हँस पड़ी। पर वो हँसी डरावनी थी।
श्रेया बोली -
वाह… बहुत अच्छा नियम है।
इससे तुम्हारे झगड़े खत्म हो जाएँगे न?
आँसू उसकी हँसी के साथ बहने लगे।
श्रेया (टूटते हुए) बोली -
क्या किसी ने मुझसे पूछा कि मैं क्या चाहती हूँ?
मैं कोई चीज़ नहीं हूँ जिसे बाँटा जाए!
वह दीवार का सहारा लेकर बैठ गई।
श्रेया बोली -
पहले ये नियम मेरी मजबूरी था…अब ये मेरी सज़ा बन गया है।
करण का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
करण बोला -
श्रेया…हम तुम्हें खोना नहीं चाहते।
श्रेया ने उसकी ओर देखा।
श्रेया बोली -
पर इस नियम से आप मुझे रोज़ खो रहे हो।
कबीर की आँखों से आँसू गिर पड़े।
कबीर (धीरे से) बोला -
अगर तुम कहो तो मैं पीछे हट जाऊँ…।
श्रेया झट से खड़ी हो गई।
श्रेया (काँपते ग़ुस्से में) बोली -
नहीं! किसी को पीछे हटने की ज़रूरत नहीं है।
क्योंकि यहाँ किसी ने आगे बढ़ने की हिम्मत ही नहीं की।
वह अपने कमरे की ओर बढ़ी।
दरवाज़ा बंद करने से पहले बोली—
मैं टूट चुकी हूँ…पर आप दोनों को अब भी एक-दूसरे से जीतना है।
दरवाज़ा बंद हुआ। बाहर दो भाई खड़े थे। एक अपराधबोध में। दूसरा डर में। और भीतर श्रेया
ज़मीन पर बैठी अपने घुटनों से लिपटकर खामोशी से रो रही थी। क्योंकि अब वह किसी एक की नहीं…
और किसी की भी पूरी नहीं थी।