Shrapit ek Prem Kahaani in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 80

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 80

कुंम्भन जौर जौर से हंसते हुए कहता है।

" मृत्यु की तुम परिचय मांग रहे हो मुर्ख । आज तेरा 
अंतिम रात्री है। और तेरे पास केवल कुछ ही छण शेष है। इससे पूर्व के मैं तुम्हें मृत्यु दंण्ड दूं । बता के मेरी पुत्री कुंम्भनी का मणी कहां है?" 

निलु डर से थर थर काँप रहा था और अपनी कंप कंपाती हूई आवाज मे कहता है।

" क..क..कौन सा मणी ?"

 कुंम्भन गरजते हुए निलु को अपने एक हाथ से उपर हवा मे लटका देता है। और कहता है। 

" मुझे मुर्ख समझने की भूल ना करो मानव। मैं उसी मणी के विषय मे बोल रहा हूँ जिससे तुमने छल से मेरे पुत्री के पास से छिन लिया था। जिस वजह से मेरी पुत्री .....! "

इतना बोलकर कुंम्भन के आंख से आंसू बहने लगता है। और निलु को निचे उतारकर कहता है।

" दैखो मानव हम देत्यो ने इस मृत्यु लोक को बहुत पहले ही त्याग कर जा चुके है। और फिर मेरा और तुम्हारा कोई बैर नही अगर तुम मुझे मेरी पुत्री की मणी को मुझे लौटा देते हो तो हे मानव मैं तुम्हे वचन देता हूँ के मैं तुम्हें क्षमा कर दुगां और तुम्हें प्राण दान मे दुगां। और अपनी पुत्री को लेकर यहां से अपने लौक को चला जाऊगां। "

निलु कुछ कहता इससे पहले कुंम्भन कहता है। 

" मेरी पुत्री तो इस पृथ्वी की प्राकृतिक सुंदरता को देखने के लिए आयी थी उसने तो किसी का कोई क्षती नही किया तो फिर तुमने उसके साथ ऐसा छल क्यों किया ? हे मानव तुम्हें क्या चाहिए मुझे बताऔ । रत्न ,आभूषण , हिरे , स्वर्ण मुद्राएं जो चाहे मागों मैं तुम्हें बहुत सारा धन दुगां इतना के इस संसार मे किसी के पास उतना धन नही होगा। बस तुम मुझे मेरी पुत्री की मणी देदो । अन्यथा मेरी पुत्री जिवित नही होगी। "

कुंम्भन की दशा को दैखकर निलु को भी कुंम्भन पर दया आ जाती है। पर निलु बेचारा करता भी क्या उसे तो मणी के बारे मे कुछ भी नही पता था। निलु इन सब बातों से अनजान कुंम्भन से कहता है।

" मैं सच बोल रहा कुंम्भन जी मैं मणी के बारे मे कुछ भी वही जानता । मुझे जाने दो मैं कुछ नही जानता मेरा विश्वास करो । "

निलु के मना करने से कुम्भन गुस्से ये आग बबुला हो जाता है और निलु से कहता है।

" हम देत्य वचन से बंधे हैं इसिलिए तुम मानव अभी 
तक इस पृथ्वी पर श्वास ले रहे हो। अन्यथा अब तक तुम सब मृत्यो को प्राप्त कर चुके होते। मेरे इतना समझाने पर तुम नही समझे , स्वार्थी मानव ।"

 इतना बोलकर कुंम्भन अपनी आकार को बड़ाने लगता है। वो इतना बड़ा हो जाता है के निलु उसके सामने बहोत छोटा नजर आता है। कुंम्भन का रुप इतना भयानक दिख रहा था के जिसे दैखकर निलु थर थर कांपने लगता है़ ।

 कुंम्भन निलु से कहता है। 

" हे मानव मैने तुम्हे अपने प्राण को बचाने के लिए कई सारे अवसर दिये परंतु तुमने उसका लाभ नही लिया परतुं अब तुम्हे कोई अवसर नही दिया जाएगा । इसीलिए हे मानव मरने के लिए तैयार हो जाओ।"

 निलु कुंम्भन की बात को सुनकर कहता है। 

" न..न..नही नही मेरा विश्वास करो मैने तुम्हारी पुत्री की मणी को नही छिना हूँ और ना ही मुझे उसके बारे मे कुछ पता है।"

 पर निलु की बात का अब कुंम्भन पर कोई फर्क नही पड़ने वाला था। निलु ये बात समझ जाता है और वहां से भागने लगता है। पर जैसे ही निलु भागता है । कुम्भन और ज्यादा गुस्सा हो जाता है। और कुंम्भन अपने हाथ को हवा मे घुमाता है और एक जोर की फूंक मारता है़ जिससे एक बहुत ही तेज वहा निकलती है और निलु को उठाकर दुर खड़ी गाड़ी से दे मारता है। 


" आह्ह ..... नही ।"

गाड़ी से टकराने की वजह से निलु के सर से खुन बहने लगता है़ । निलु किसी तरह लड़खड़ाते हूए अपने सर को पड़कते हूए उठता है और दुबारा भागने लगता है। 

तभी कुम्भन एक और फूंक मारता है जिससे इस बार निलु को उठाकर एक झाड़ी मे फेंक देता है ।


" धड़ाम "

 झाड़ी मे गिरने की वजह से निलु को बहुत सारी खरोंचे आ जाती है। निलु दर्द से कराहते हूए किसी तरह झाड़ी से निकलता है। और लड़खड़ाते हूए अपने कदम को बड़ाने लगता है। 

कुंम्भन अब अपनी आकार को छोटा कर लेता है। और निलु को अपने हाथ से एक जोर का पंजा मारता है। कुंम्भन के बड़े बड़े नाखुन के वजह से निलु को गहरी खरोंचे आ जाती है।

जिससे निलु की चिख निकल जाती है।

 आहहहह् !

 और निलु धड़ाम से निचे गिर कर जाता है। कुंम्भन निलु के पास आकर उसे अपने कंधे पर उठा लेता है और जंगल के अंदर चला जाता है। निलु बहोत ज्यादा घायल होने के वजह से अब वह भाग नही सकता था । कुंम्भन निलु को लेकर अपने गुफा मे आ जाता है और निलु के हाथ पैर को बांध कर एक जैल जेसे कमरे मे फेंक देता है।

 निलु ये सब दैखने के बाद अब निलु की आंखे भारी हो जाती है और वही बेहोश हो जाता है। कुछ दैर बाद जब निलु को होश आता है।

तो वह दर्द से कराते हूए उठता है ।

आह्ह ....

ये मैं कहाँ पर हूँ ?

इतना बोलकर निलु दैखता है के कुंम्भन एक मंडप पर बैठ कर यज्ञ कर रहा था और उसमे आहुती देते हुए जौर जौर से चिल्ला कर कह रहा था ।

" हे मित्र प्रकट हो ! प्रकट हो । मुझे तुम्हारा आवश्यकता है। प्रकट हो मित्र मांतक । प्रकट हो । "

फिर कुंभ्मन उठकर उस मंडप के चारो और घुमने लगता है। और एक धारदार चाकु से अपनी हाथ मे एक घांव लगाता है जिससे कुंम्भन के हाथ से खुन बहने लगता है। और उस खुन के कुछ बूंदे उस यज्ञ मंडप पर गिरा देता है। फिर कुंम्भन वहा पर बनी देत्य देवी के मूर्ती के पास जाकर कहता है।

" हे देवी मां मुझे शक्ती दे मां । मुझे आशीर्वाद दे मां । मैं अपने लक्ष्य के बहोत निकट हूँ । कुंम्भन निलु की 
ऐर इशारा करते कहता है। दैख माँ दैख । ये उन्ही दुष्टो मे से एक है जिसके कारण मेरे पुत्री की ये दशा की है। आज मैं उसे बंदी बनाकर लाया हूँ । मैं बहोत ही सिघ्र इस दुष्ट का बली चड़ा दुगां । क्योकी मां ये तो सिर्फ उस दुष्ट का एक छोटा प्यादा है। मुझे उस मानव को ढुंढना है जो उस रात्री अघोरी के पास गया था। मैं उस दुष्ट को खोजकर मणी को उससे प्राप्त करके अपनी पुत्री को जिवित कर दुगां ।"

 कुंम्भन वहां से उठकर कुंम्भनी के पास जाता है और वहा बैठकर कहता है।

" पुत्री अब वो क्षण दुर नही जब मैं तुम्हें पुण: जिवित कर दुगां। वो दुष्ट अब सिघ्र ही मेरे पास होगा।"

 इतना बोलकर कुंम्भन वहां से उठता है और यज्ञ मंडप के पास आकर फिर ये आहूती दैने लग जाता है। निलु ये सब अपने आंखो से दैख रहा था और अपनी बली का बात सुनकर निलु बहोत डर जाता है।

निलु डरते हूए भगवान से प्रार्थना करता है। 

" हे भगवान ये मैं कहां फस गया । मालिक ! कहां हो आप ? मुझे यहां से कोई निकालो । निकालो यहां से कोई । "

इतना बोलकर निलु रोने लगता है। और अपने आप को ऱस्सी के बंधन से छुड़ाने की कोशीश करता है पर निलु इसमे कामयाब नही हो पाता है और थकहार कर निलु वही पर चुपचाप लेट जाता है जिससे निलु की आंख लग जाता है और वह वही पर सो जाता है ।

 कुछ दैर बाद जाब निलु की आंख खुलती है तो वह दैखता है के वहां पर निलु अकेला था और उसके हाथ का रस्सी भी खुला हुआ था। हाथ का रस्सी को खुला पाकर निलु बहोत खुश होता है। उठ कर इधऱ उधऱ दैखने लग जाता है। पर निलु को वहा उसके अलावा और कोई नही दिखाई दे रहा था। 

पर निलु के मन मे कुम्भन का डर सता रहा था । इसिलिए वो अपना हाथ के रस्सी को जल्दी जल्दी खोल लोता हो और जैसे ही अपमे पैर की रस्सी को खोलने जाता है के तभी वहां पर कुंम्भन आ जाता है। कुंम्भन को दैख कर निलु की जान हलक मे आ जाती है।

To be continue.....1250