भाग - 3
वो धीरे से उठी और रोज़ की तरह बिना किसी आवाज़ के रसोई में चली गई चूल्हा जलाते ही आग की हल्की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी उसके चेहरे पर वही शांति थी, लेकिन आँखों के नीचे हल्की थकान भी साफ़ दिख रही थी
कुछ ही देर में माँ भी आ गई
माँ- “आज देर नहीं हो गई?”
रवीना- “नहीं माँ समय से ही उठी हूँ”
माँ ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा—
माँ- “स्कूल में टीचर हो तो थोड़ा अपने आप पर भी ध्यान दिया करो ये ढीले-ढाले कपड़े पहनकर जाओगी तो लोग क्या कहेंगे?”
रवीना ने कुछ पल के लिए खुद को देखा फिर धीमे से बोली
रवीना- “मुझे ऐसे ही ठीक लगता है”
माँ- ठीक लगता है या छुपाना चाहती हो खुद को?
ये शब्द फिर से दिल को छू गए लेकिन इस बार रवीना ने कुछ नहीं कहा उसने बस चुपचाप चाय कप में डाली और बाहर चली गई
स्कूल पहुँचते ही माहौल अलग था बच्चों की आवाज़ें, हँसी, भागदौड़ जैसे हर दिन की तरह ज़िंदगी यहाँ चल रही थी
रवीना स्टाफ रूम में पहुँची तो माही पहले से ही वहाँ बैठी थी
माही- आ गई तू ?
रवीना- हूँ
माही ने उसके चेहरे को गौर से देखा
माही- फिर कुछ हुआ है न ?
रवीना ने हल्की मुस्कान दी
रवीना- कुछ नया नहीं
माही ने गहरी सांस ली—
माही- कभी-कभी सोचती हूँ तू इतना सह कैसे लेती है
रवीना ने खिड़की के बाहर देखा बच्चे खेल रहे थे
रवीना- शायद इसलिए क्योंकि मैं बदल नहीं सकती उन्हें लेकिन खुद को कड़वा भी नहीं बनाना चाहती
माही कुछ पल चुप रही फिर उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई—
माही- और यही चीज़ तुझे सबसे अलग बनाती है
उस दिन स्कूल में एक नोटिस लगा—
“इंटर-स्कूल कंप्यूटर वर्कशॉप”
रवीना को उसमें शामिल होने के लिए चुना गया था
प्रिंसिपल- रवीना, तुम हमारे स्कूल को रिप्रेजेंट करोगी ये एक अच्छा मौका है
रवीना ने थोड़ा संकोच करते हुए सिर हिला दिया—
रवीना- “जी सर मैं कोशिश करूँगी
माही ने पीछे से धीरे से कहा—
माही- कोशिश नहीं तू कर के दिखाएगी
रवीना ने उसकी तरफ देखा और हल्का सा मुस्कुरा दी
उधर, उसी वर्कशॉप का आयोजन जिस संस्था में होना था वहाँ तुषार भी काम करता था तुषार अपने केबिन में बैठा फाइल्स देख रहा था तभी उसके सीनियर ने उसे बुलाया
सीनियर- तुषार, अगले हफ्ते जो वर्कशॉप है उसका टेक्निकल हैंडलिंग तुम करोगे
तुषार थोड़ा घबरा गया—
तुषार- सर मैं अकेले ?
सीनियर- तुम कर सकते हो और वैसे भी, अब समय है कि तुम खुद पर भरोसा करना सीखो
तुषार ने धीरे से “जी” कहा लेकिन उसके अंदर डर की हलचल शुरू हो चुकी थी
घर पहुँचते ही, तुषार ने अपने बैग से पैसे निकाले और धीरे से रसोई में गया उसकी माँ चुपचाप खाना बना रही थी
तुषार ने बिना कुछ कहे पैसे उनकी तरफ बढ़ा दिए
तुषार- माँ ये इस महीने के
माँ ने उसकी तरफ देखा फिर बिना कुछ बोले पैसे ले लिए और अलमारी में रख दिए। उनके चेहरे पर न कोई खुशी थी, न कोई शिकायत… बस एक अजीब सी खामोशी थी, जैसे ये सब अब आदत बन चुका हो
तुषार कुछ पल वहीं खड़ा रहा शायद उसे एक शब्द की उम्मीद थी—“थैंक यू” या “कैसे है” "दिन कैसा गया" लेकिन कुछ नहीं मिला
तभी पीछे से उसके पिता की आवाज़ आई
पिता- आ गए बेटा…?
तुषार ने हल्का सा सिर हिलाया
तुषार- जी
पिता उसके पास आए और उसके कंधे पर हाथ रखा
पिता- इतना सारा बोझ अकेले मत उठाया करो खुद के लिए भी थोड़ा सोचो
तुषार ने नजरें झुका लीं—
तुषार- सब ठीक है पापा
तभी उसका छोटा भाई अंदर आया—
भाई- अरे आ गए जनाब आज तो टाइम पर आ गए
उसकी आवाज़ में हल्की सी ताना था पर पहले जितनी तीखी नहीं तुषार ने कोई जवाब नहीं दिया
बहन भी पास आकर बोली
बहन- भैया, मेरे लिए वो किताब लाई…?
तुषार- कल ले आऊँगा
बहन- होह , ठीक है भूल मत जाना
उसके शब्द सीधे थे, लेकिन उनमें अपनापन कम था जैसे वो बस जरूरत के हिसाब से बात करती हो
तुषार ने सबकी बातें सुनीं और बिना कुछ कहे अपने कमरे की तरफ बढ़ गया दरवाज़ा बंद करते ही उसने गहरी सांस ली
ना माँ की कोई प्रतिक्रिया, ना भाई-बहन का स्नेह बस जिम्मेदारियाँ, लेकिन फिर भी उसने खुद को संभाल लिया
क्योंकि वो जानता था अगर वो नहीं संभलेगा तो ये घर बिखर जाएगा
उधर, रवीना अपने कमरे में बैठी थी उसके सामने वर्कशॉप का पेपर रखा था उसने धीरे से उसे उठाया और कुछ पल उसे देखती रही
उसके मन में भी डर था , क्या वो कर पाएगी?
क्या लोग उसे जज करेंगे ?
लेकिन फिर उसे माही की बात याद आई “तू कर के दिखाएगी”
रवीना ने गहरी सांस ली और खुद से कहा—
रवीना- “मैं पुरी कोशिश करूँगी”.....