An incomplete mother - 4 in Hindi Drama by Anjali kumari Sharma books and stories PDF | एक अधूरी मां - 4

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एक अधूरी मां - 4


नियति का क्रूर प्रहार

समय के साथ घर का माहौल थोड़ा शांत हुआ था। सूरज और राधा के बीच के झगड़े कम होने लगे थे। सूरज ने महसूस किया कि राधा न केवल उसके बच्चों को संभाल रही है, बल्कि घर को भी एक सूत्र में बांधे हुए है। इसी शांति के बीच सूरज ने एक बार फिर इच्छा जताई, "राधा, आर्यन को एक छोटा भाई या बहन मिलना चाहिए। हमारा परिवार और भी खुशहाल हो जाएगा।"


राधा डरी हुई थी, पर सूरज के बदलते व्यवहार और प्यार ने उसे हिम्मत दी। कुछ समय बाद, राधा की गोद में एक और नन्हा फरिश्ता आया—एक छोटा बेटा, जो इतना सुंदर और शांत था कि जैसे साक्षात् ईश्वर का रूप हो। उसे देखते ही पूरे घर की कड़वाहट जैसे धुल गई। सौतेले भाई-बहन भी उसे अपनी जान से ज़्यादा चाहने लगे।

जब वह बच्चा कुछ महीनों का हुआ, तो सूरज ने उसे अपने पैतृक गाँव ले जाने का फैसला किया ताकि कुलदेवता का आशीर्वाद लिया जा सके। लेकिन गाँव की मिट्टी में अभी भी पुराने साये और काली नज़रें दबी हुई थीं। जैसे ही राधा ने गाँव में कदम रखा, उसका दिल बैठने लगा। उसे लगने लगा कि हवाओं में कुछ अशुभ है।
गाँव के कुछ लोग, जो पुरानी रंजिशों और अंधविश्वासों में जकड़े थे, उस बच्चे को तिरछी नज़रों से देखते। राधा को रात भर नींद नहीं आती; उसे लगता कि कोई उसके बच्चे को उससे छीनना चाहता है। घबराहट में उसने सूरज से कहा, "हमें अभी इसी वक्त शहर वापस जाना होगा। यहाँ मेरा बच्चा सुरक्षित नहीं है।"


सूरज और राधा अंधेरी रात में ही गाँव की सीमा पार करने लगे। तभी रास्ते में एक अजीब सी बुढ़िया, जो तंत्र-मंत्र और शक्तियों की जानकार मानी जाती थी, उनके सामने आ खड़ी हुई। उसकी आँखें जलते अंगारों जैसी थीं। उसने राधा के आँचल की ओर इशारा करते हुए कर्कश आवाज़ में कहा, "इसे कहाँ छिपाकर ले जा रही है? जो बदनसीब अपनी कोख में मौत लिखवाकर लाया हो, उसे कोई ट्रेन या शहर नहीं बचा सकता। यह नहीं बचेगा!"
राधा का कलेजा कांप उठा। वह पागलों की तरह दौड़कर रेलवे स्टेशन पहुँची। ट्रेन में बैठते ही बच्चे को तेज़ बुखार ने जकड़ लिया। वह तपते अंगारे की तरह जलने लगा। शहर पहुँचते-पहुँचते उसकी हालत और बिगड़ गई। जैसे ही हॉस्पिटल की सीढ़ियों पर राधा ने कदम रखा, उसकी गोद में उस नन्हे फरिश्ते ने अपनी माँ की आँखों में झाँकते हुए आखिरी सांस ली।


राधा की दुनिया वहीं ठहर गई। उसकी चीखें अस्पताल के सन्नाटे को चीर रही थीं। जो खुशी उसे सालों के संघर्ष के बाद मिली थी, वह पल भर में राख हो गई।
टूटता हौसला और पति का सहारा:
शहर के उस छोटे से कमरे में अब सन्नाटा पसरा रहता। राधा एक ज़िंदा लाश बन गई थी। न वह खाना खाती, न बच्चों से बात करती। वह बस खाली पालने को निहारती रहती। उसे लगा कि उसकी दुनिया बिखर गई है। मायके फोन किया तो वहाँ से फिर वही जवाब मिला, "ईश्वर की इच्छा थी, हम क्या कर सकते हैं?"


पर इस बार एक बदलाव था। सूरज, जो कभी बात-बात पर चिल्लाता था, आज राधा का सबसे बड़ा सहारा बन गया। उसने घर की सारी ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली। वह खुद खाना बनाता, बच्चों को स्कूल भेजता और घंटों राधा का हाथ पकड़कर बैठा रहता। उसके सौतेले बच्चे भी अपनी 'छोटी माँ' का दुख देखकर रो पड़ते और उनकी छोटी-छोटी सेवा करने की कोशिश करते।
राधा अब एक ऐसी अंधेरी खाई में थी जहाँ से उसे कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। न मायके का प्यार, न समाज की सहानुभूति। उसके पास सिर्फ उसका वो पति था जिसने देर से ही सही, उसकी कीमत पहचानी थी।


क्या राधा इस गहरे सदमे से बाहर निकल पाएगी? क्या एक माँ अपने बच्चे को खोने के बाद फिर कभी मुस्कुरा सकेगी? और सबसे बड़ा सवाल—क्या वह बुढ़िया सिर्फ डरा रही थी, या वाकई राधा के परिवार पर कोई ऐसा श्राप है जो एक-एक करके उसकी खुशियों को निगल रहा है?