पिता और अन्य कहानियाँ, भाग-1 in Hindi Short Stories by Anil Kundal books and stories PDF | पिता और अन्य कहानियाँ, भाग-1

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पिता और अन्य कहानियाँ, भाग-1

                    #  पिता #

सेठ रत्नाकर अपने समय के धनाढ्य व्यक्तियों में से थे। अच्छा खासा नाम था उनका। सब कुछ घर मे था, नौकर चाकर घर जायदाद घोड़े गाड़ियों के अंबार! और प्रभु महादेव जी की अपार कृपा थी कि किसी भी चीज़ की कमी अपर्याप्तता उनके दरवाजे पर कभी अपनी अप्रिय  नागवार दस्तक नहीं दे सकी थी। दूर दूर तक उनकी  कीर्ति भूति  का यश फैला हुआ था। अपनी जवानी के दिनों में तकरीबन सभी तरह के ऐब पाले होंगे उन्होंने, लेकिन अधेड़ उम्र के आगे की दहलीज पार करने के साथ ही सभी ऐबों को सदैव के लिए तिलांजलि दे दी थीं। निस्संदेह यही दर्शन है। 

अपनी इकलौती औलाद के लालन पालन में उन्होंने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी थी। फिर भी उनमें और उनके बेटे के मध्य सदैव बैर वैमनस्य सा भाव बना रहा। उन्होंने अथक प्रयास किए कि आपसी स्नेह को बढ़ावा मिले, परंतु सभी प्रयत्न विफल ही रहे।और उन छोटे छोटे झगड़ों कलह से घर का वातावरण बिगड़ता ही रहा। कहते हैं ना चांद पर अनगिनत दाग़ हैं। 

रही बात उनकी गृहिणी की? तो वो सामान्य स्त्रियों के जैसी ही थी। तनिक भली और किंचित बुरी भी। अपनी आदतों के सबब ज्यादातर वो भी अपने पुत्र की तरफ़दारी ही किया करती थी। और बहुधा उन दंपत्ति में टकराव की संभावनाएं बढ़ी ही रहतीं। 

सब तरह के नशे वक्त के अनगिनत आनन्दों के छूटने के साथ साथ छूटते चले गए थे और एक ही नशा अब शेष विशेष रह गया था जो कि अब तक भी उनके सर पर चढ़कर बोलता था और वो था तंबाकू खाने का और हुक़्क़ा गुड़गुड़ाने की जबरदस्त तलब। 

उस रात बाहर का तूफान अधिकाधिक शक्तिशाली था कि उनके भीतर का मचा हुआ विध्वंसकारी अंधड़? अच्छे से कहना असंभव सा ही था। 

उस तूफान के आने के थोड़ा पहले ही बाप और बेटे के बीच बहुत झगड़ा बढ़ गया था। गनीमत यही रही थी कि झगड़ा तार्किक रूप में ही था, हाथापाई की नौबत नहीं आई थी। लेकिन हर लम्हा यही बताने की कोशिश में जुटा रहा था कि वो नागवार घड़ी उनके मध्य कभी भी आ धमक सकती थी। 

अपने उलटे सीधे ऐबों की वजह से लड़के ने शादीशुदा जिंदगी बिताने से इंकार कर दिया था। और आजीवन कुंवारे की सी जिंदगी बिताने का अजबगजब फैसला।और उसके माँ बाप उसे एक सुखी परिवार बनाने का परामर्श दिया करते। खासतौर पर सेठ जी। और फिर बातों ही बातों में लड़ाई छिड़ जाती थी। उस रात भी सेठ जी ने बस वही सब कहा, जो कि प्रायः कहा करते थे, " ये सब बेढब चाल चलन छोड़ छाड़ कर शादीशुदा जिंदगी बिताने पर जब भी राज़ी होगा, तभी इस सारी धन दौलत का मालिक बनेगा। वरना यूँ ही कुंवारा और गरीबजादे सी जिंदगी बिताने को मजबूर होना पड़ेगा। खुद ही सोच विचार ले? अपना भला बुरा? मेरी आँख बंद होते ही यह सब कुछ सरकारी हिस्से की चीज़ बन जाएगा। "

यह सब कुछ कहने के साथ ही उन्होंने अपनी रौबिली मूंछों पर ताव दिया और फिर अपने होंठों पर हुक़्क़े की नली लगा कर हुक्का गुड़गुड़ाने लगें। 

लड़के की मारे गुस्से के भृकुटियां माथे तक चढ़ आईं और आंखों में अंगार बरसाते हुए चिल्ला कर बोला, " बस यही सब कुछ सुन कर मैं अपने आपे को खो देता हूँ। कितनी दफा एक ही बात मुझे बारम्बार दोहराने की आवश्यकता पड़ेगी? मुझे शादी नहीं करनी, तो नहीं करनी। देखो माँ, बहुत हुआ यह सब कुछ। मुझे ऐसा सताओगे, तो इक दिन मैं अपनी जान से हाथ धो बैठूँगा। "

" बच्चा है। आप भी ना बच्चे के संग बच्चा बनना छोड़ दीजिए। आज नहीं तो कल, कर लेगा ना शादी। और अभी इसकी उम्र ही क्या है? " गृहिणी ने भी उस प्रचंड अग्नि में घी डालने का कार्य किया। 

" वाह, वाह! भई क्या खूब बात कही तुमने विमला। अभी तो अभी बच्चा है। बच्चे की उम्र भी याद है तुम्हें? तेइस साल का हो गया है हमारा शहजादा। हमारे घर से सटे घर का विजय इससे सात साल छोटा है और अच्छी तरह से मुंशी की नौकरी कर रहा है। इक राय दूं अगर तू कहे तो? " उन्होंने अपने मुख से हुक़्क़े की पाइप हटा कर कहा और अपने सवाल के जबाब का बेसब्री से इंतज़ार करने लगे। 

" हाँ, हाँ! आप ही बता दो! कुछ हमारी भी तो अक्ल बढ़नी जरूरी है। है ना जी? " माँ ने भी कुछ कुछ चिढ़ते चिढ़ाते हुए कहा। 

" ठीक कहती हो, रमेश की अम्मा! सोचता हूँ कि बता ही दूं। भई बच्चा अगर हद से कुछ ज्यादा ही छोटा है, तो निप्पल वाली बोतल से दूध पिलाया जाए। ताकि बच्चे की तंदुरुस्ती बरकरार रहे। " उस वाक्य के समाप्ति पर वो जोरदार हंसी हंसे और फिर से हुक़्क़े की पाइप अपने मुंह से सटा  ली और गुड़गुड़ाने लगें। 

उस पर लड़का बिना किसी तरह का जबाब के घर से बाहर निकल गया। और उसके जाने के साथ ही उन दोनों, दंपत्ति, में कहा सुनी शुरू हो गई। और उनकी उस बहसमबहसी से लगता ना था कि गृह युद्ध शीघ्रातिशीघ्र समाप्त होता। 

                           : दो :

रात काफी गहरा गई थी और रूठे हुए चांद सितारों ने भी अपनी जिद्द में एक दूसरे से बातचीत करना छोड़ दिया था। बह टुकुर टुकुर टकटकी लगा कर एक दूसरे को देखा करते थे। 

कुछ देर और की नाराजगी के बाद उन दोनों में नजदीकियां बढ़ने सी लगीं और अपने पति के पैरों को घुटते हुए घरवाली ने सहज भाव से कहा, " ए जी, सुनते हो जी? "

" बोलो? " सेठ जी ने हुक़्क़े की पाइप अपने मुख से हटा कर कहा। 

" अभी तक भी क्या हमसे नाराज हो जी? " 

" नहीं तो! "

" जी, रात के एक बजे का समय हो गया है और रमेश अभी तक घर नहीं लौटा? जवान लड़का है और खून गरम! कहीं कुछ ऐसा वैसा कदम ना उठा ले कि हम जिंदगी भर के लिए दोषी बन जावें! मेरा तो जी घबरा रहा है। " 

" लौट आएगा। यहीं कहीं आसपास अपने लफंगे यार दोस्तों के साथ घुमक्कड़ी करता होगा और क्या? "

" हाँ, जी, आ तो जाएगा, पर मां का दिल मानता कहाँ है! हर लम्हा तरह तरह के स्वप्नों में भयभीत करवाता फिरता है। बाप का दिल तो कठोर पत्थर के जैसे होता है। पसीजता ही नहीं। "

" ठीक कहती हो, रमेश की अम्मा! "

और फिर उन छोटी छोटी सी घरेलू बातों के बने रहने के साथ साथ समय भी अपने कदम दर कदम उठाने के साथ साथ बहुत आगे निकल गया था। 

रात ने भी अपने सलोने मुखड़े को स्याह काले घूंघट में छिपा लिया था। 

सेठ जी ने हुक़्क़े की पाइप अपने मुख से हटाई और  सीढ़ियों के छज्जे के नीचे से अपने जूते निकाले और पहनकर घर से बाहर निकल गएं। किसी भी नौकर चाकर को जरा सी भी खबर भी नहीं पड़ने दी। छोटे लोगों के कानों तक भी कोई बात चली जाए, तो वो पूरी बिरादरी के लिए जग हंसाई का सामान बन जाती है। घर कलह अलग और सारी बिरादरी में थू थू वो अलग। 

बाहर अभी भी जोरों की बयार बह रही थी। उसे किसी भी रूप में अंधड़ नहीं कहा जा सकता था। पर फर्रर्र फर्रर्र फर्रर्र बहते हवाओं के दमदार झोंकें बाहर गलियों सड़कों पर की बिछी धूलि कणों को ऊपर की ओर उछालते तो छोटी छोटी कंकरियां मुंह और आंखों में जुभतीं सी जान पड़तीं। 

तकरीबन सभी दुकानों में ताले लग चुके थे। दिन भर के थके मांदे इंसान गेह की ओर प्रस्थान कर चुके थे। बस इक्की दुक्की पनवाड़ियों की दुकानें अभी तक भी सजी संवरी हुईं थीं। मानों कि जैसे वैशयायें अपनी अपनी खिड़कियों पर सजी संवरी बैठीं हों और आने जाने वाले ग्राहकों को लुभाने का कार्य करतीं हों। 

दो चार कदम और उठाने के साथ ही पनवाड़ीे की दुकान पर पहुंचने पर अपने मतलब का सामान लिया और उनके पैसे चुकाने के साथ ही सेठ जी आगे बढ़ गएं। 

गलियों की तरह उस सड़क पर भी अनेकानेक कुत्ते खड़े हुए मिले और उन्हें देखते ही भौंकने लगे। उन्होंने एक जोर की एक डांट फटकार लगाई। सभी कुत्ते यूँ शांत प्रमन पड़ गएं जैसे कि जूते की भाषा भली भाँति समझते हों। 

उस सड़क पर काफ़ी दूर निकल जाने पर अंधियारा कुछ ज्यादा ही अनुभव होने लगा था। सड़क पर दोनों ओर ठुके खंभों में किसी किसी पर रौशनी बरकरार थी और बल्ब या तो फ्यूज़ हो चुके थे या फिर खराब। 

जहाँ तक वो जा सकते थे गएं। पर उन्हें कहीं पर भी अपने बेटे की खबर नहीं मिली। अतः थक हार कर अपने घर की राह ही चल दिए। सोचा कि शायद बेटा घर लौट आया होगा। 

जब वो वापिस घर आए, तो उस वक्त रात के तीन बज चुके थे। और वो अभी तक घर नहीं लौटा था। 

                              :  तीन :

 सेठ जी के कलेजे में पल भर के लिए भी कल नहीं पड़ रही थी और वो ही हाल सेठानी जी का था। कुछ विलंब सोफे पर बैठे बैठे कुछ ना कुछ गहराई से सोचते विचारते रहे और फिर अपने कमरे में ही चहलकदमी करने लगे। सोच सोच कर कभी तो उनके माथे पर बल पड़ते, तो कभी कभार अपनी मूंछों को हलकी फुलकी मरोड़ देने के साथ साथ कुछ ना कुछ याद करने की कोशिश करते। 

" विमला, सोचता हूँ कि एक दफा और बाहर जाकर रमेश की खबर लिए आता हूँ। नादान है और पंछी के जैसे उसकी बुद्धि है। ना जाने कहाँ ले जाए वो उसे अपनी लंबी उड़ान भरने के साथ ही ! बाप की बात का भी कोई बेटा इतना बुरा मानता है क्या? बाप बिलकुल उस कठोर हृदय सा दिखने वाले नारियल के जैसे होता है। बाहर से जितना कठोर, अंदर से उतना ही नरम! हम भी अपने बाबूजी से कभी कभार नाराज हो जाते थे और गुस्से की रौ में आकर घर से कहीं दूर दराज निकल जाया करते थे। यही सब कुछ सोचकर कि अब पुनः फिर से घर नहीं जाएंगे। लेकिन जब तब स्मरण आता कि बाबूजी नाहक़ परेशान होते होंगे और हमारे चक्कर में संभवतः उन्होंने अन्न जल ग्रहण नहीं किया होगा। उनकी स्मृति हमें भीतर तक कचोटती कि कहीं वो रोते ना हों हमारी याद में! तुरंत घर चले आते। और एक ये नबाबजादे हैं रूठ कर हमसे कोसों दूर निकल गए हैं। बिना सोचे समझे बग़ैर कि माँ बाप पर क्या गुजरती होगी? " सेठ जी ने कहा और सीढ़ियों के छज्जे के नीचे से फिर से अपने जूते लिए और पहनकर घर से बाहर निकलने को तत्पर हुए ही थे कि उनकी गृहिणी ने रोक लिया और प्रेमपूर्वक बोली, " जी, आप इतना परेशान मत होइए! आपकी तबियत वैसे भी कईं रोज़ से खराब चल रही है। ज्यादा परेशानी आपके लिए ठीक नहीं। नींद नहीं आ रही,तो नींद की एक टिकी दे देती हूँ। आप आराम से सो रहो। वो आप ही आप घर वापिस लौट आवेगा। नहीं तो मैं तो कहती हूँ मैं ही बाहर हो आती हूँ। शायद यहीं कहीं घर के आसपास छिपकर बैठा हो? आपको देखकर दुबक गया हो। आपको तो उसका व्यवहार मालूम ही है। "

" कैसी अहमकों की सी बातें करती है तू, विमला! अब रात के तीन बज रहे हैं, ना कि दोपहरी के तीन! तुम छोड़ो, मैं ही एक चक्कर और लगा आता हूँ " वो बोले और यूं ही बाहरी दरवाजे पर पहुंचे ही थे कि बाहरी दरवाजे पर जोर जोर से किसी ने दस्तक दी। विमला भी दरवाजे तक जा पहुंची थी और यों ही सेठ जी ने दरवाजा खोला, तो बाहर का नजारा देखते ही दंग रह गए। घर की ड्योढ़ी पर दुश्मन खड़ा था और उसके साथ उसका नवयुवक सा लड़का। उन्हें यूँ इतनी रात गए अपने दरवाजे पर खड़ा देखकर वो गुस्से में भर कर गरजे, " रत्नतारा, तू जहाँ और इतनी रात गए? क्यों क्या बुरी मंशा लेकर आए हो?  क्या बरसों पुराना सब बैर वैमनस्य भूला बैठे? "

" हाँ, रत्नाकर, सब बैर वैमनस्य भूल कर ही तो रखा है पग इस ड्योढ़ी पर। और पूछोगे नहीं कि जहाँ आने का मेरा सबब क्या है? " रत्नतारा ने अपनी वाणी में शहद सी मिठास घोल कर कहा। 

" जरूर पूछूँगा! कहो कैसे आना हुआ? " 

" तो सुनिए जनाब, अभी के अभी सुना देते हैं। कि सच क्या है? आधी रात के वक्त किसी जरूरी काम के लिए मुझे रात्रि के आराम का परित्याग करना पड़ा। मैं अपने साथ अपने बड़े बेटे, दिवाकर, को भी ले गया। 

सुनसान सड़क पर सन्नाटे और गहरे अंधियारे के सिवा कुछ भी दिखाई नहीं देता था। हमारी कार उन सुनसान अंधेरे भरे रास्तों पर से सरपट दौड़ती चली जा रही थी। काम को निबटाने के बाद हमें अच्छा खासा वक्त लग गया था। यही कोई रात के एक बजे का वक्त रहा होगा, जब हमारी कार रेलवे फाटक तक पहुँच चुकी थी और उस वक्त वो फाटक बंद पड़ा था। क्योंकि कुछ ही चंद एक लम्हों के गुजरने के साथ ही ट्रेन उस पटरी पर आने ही वाली थी। 

जहाँ तक कार के बल्बों की रौशनी जा सकती थी, मेरी नजरों ने भी उसकी अधिकतम सीमा को पार करने की बेकार में ही दो चार बारी कोशिशें कीं। 

तीसरी बार की कोशिश करते ही मेरी नज़र पटरी पर चलते हुए  सब ओर से बेखबर विक्षिप्त से दिखाई देने वाले एक शख़्स पर पड़ गई और नज़र एक ढीठ बच्चे के जैसे उसी जगह पर ठहर सी गई। 

मैंने अपने बेटे से कहा कि कोई व्यक्ति खुदखुशी करने की तैयारी कर रहा है और वो उसी पटरी पर चला जाता है जिस पर दो चार मिनटों में ट्रेन आने वाली है। लड़के ने मुझे बहुत समझाने की कोशिश की कि आजकल खुदखुशी करने का रिवाज सा ही हो गया है। हमें क्या पड़ी है किसी की जिंदगी में किसी तरह की दखलअंदाजी करने की। लेकिन मैं नहीं माना और बोला कि तुझे नहीं करनी उस वयक्ति मदद, तो ना कर, बेटा। तेरा बाप तो उसके प्राणों की रक्षा करेगा ही। लड़के ने तैश में आकर कार का दरवाजा खोला और झपट कार से बाहर निकला और फिर से कार का वही दरवाजा बंद किया। मैं भी असमंजसता के गह्वर में डूबता जा रहा था कि वो अब क्या करने के लिए अमादा है। 

फाटक के नीचे से निकल कर वो उस शख़्स की तरफ दौड़ा और कुछ एक बड़े बड़े डग भरने के साथ ही उसने उसे जा दबोचा। और उसी एक दो लम्हों के गुजरने के साथ ही ताबड़तोड़ शोर मचाने के साथ ही वह ट्रेन भी उस पटरी पर आ धमकी। 

उस ट्रेन की तीव्रता को देखकर मेरा कलेजा मारे डर के मुंह को आने को हुआ। मैं पछतावे की अग्नि में जलने लगा। क्योंकि उस वक्त एक बाप का दिल दहल उठा था कि खामखां ही अपने बेटे को उस आफत में डाल दिया! 

कुछ देर पटरी पर ताबड़तोड़ चलती ट्रेन वहाँ से गुजर गई। उस वक्त मुझे यूँ लगा जैसे उस ट्रेन का एक एक भारी भरकम पहिया मेरे दिल के ऊपर से होकर गुजरा हो। 

मैं ना मर कर भी पूरी तरह से मर चुका था। मैंने जहाँ वहाँ, हर तरफ अपनी नजरें दौड़ाई उन दोनों का कहीं भी अता पता नहीं मिल सका। 

मैं हृदय विदारक एक चीत्कार से टूट कर बिखर गया था। मेरा क्रंदन उस सन्नाटे को चीरते हुए दूर दूर तक जाता था। 

मैं लड़खडाए कदमों से दो चार कदम उठाने के साथ ही जब एक अंधेरे में डूबे हुए एक लैंप पोस्ट के करीब पहुँचा ही था कि दूर से आते हुए मेरे बेटे की आवाज मेरे कमज़ोर कानों में पड़ी। मेरी चेतना ने मुझे वीणा के तारों के जैसे पूर्णतः झंकृत कर दिया। 

मेरा रोम रोम मारे खुशी के खिल उठा था और अपने बेटे को अपने करीब आते ही मैने जोर से अपनी बांहों में कसकर जकड़ लिया था। 

और जब मैंने उस शख़्स का चेहरा गौर से देखा, जिसे मेरे बेटे ने बचाया था --  मैं दंग रह गया था। क्योंकि वो कोई और नहीं, बल्कि तुम्हारा बेटा, रमेश था। सच पूछिए तो हमने एक इंसान होने के नाते इक इंसान की मदद की थी। और वो चाहे किसी का भी बेटा होता। होता तो एक इंसान ही। क्यों मैं क्या कुछ गलत बोल गया? "

" रत्नतारा, तूने यार आज किसी के बेटे की नहीं, बल्कि इक बाप की जान बचाई है। एक पिता अपने पुत्र से किस हद तक प्रेम कर सकता है, वो हद बेहद एक पिता ही समझ सकता है। " सेठ जी ने कहा। रमेश ने देखा कि उसका वो पिता आज मोम सा पिघल कर झार झार रोता है। जो कि कभी एक पत्थर दिल के सिवा उसे कुछ भी नहीं लगा था। 

उसकी भी आंखों में गरम गरम आंसुओं की उद्दाम बाढ़ आ चुकी थी। गालों पर लुढ़क कर बड़ी बड़ी बूंदें धरित्री पर गिरती जातीं थीं।