कॉलेज का वो अनोखा दिन in Hindi Thriller by Kishan Kishor books and stories PDF | कॉलेज का वो अनोखा दिन

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कॉलेज का वो अनोखा दिन

मंगलवार का दिन था, सूरज सिर पर चमक रहा था और दोपहर के ठीक 12 बज रहे थे। मैं हॉस्टल के कॉरिडोर से भागते-दौड़ते, हाफते हुए अपनी पहली क्लास के कमरे की तरफ लपका। जैसे ही मैंने अंदर कदम रखा, प्रोफेसर साहब बस अपनी अटेंडेंस शीट खोल ही रहे थे। शुक्र था कि मैं ऐन वक्त पर पहुँच गया। वह क्लास तो खैर हमेशा की तरह हंसी-मजाक, दोस्तों के साथ पीछे बैठकर कानाफूसी करने और बेंच पर उँगलियाँ थपथपाने में आराम से कट गई। हमें जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह सुकून तूफान से पहले की शांति था। असली कहानी तो अभी पर्दे के पीछे आकार ले रही थी, जिसका धमाका अगले कुछ घंटों में होने वाला था।


दोपहर के ठीक 1 बजे जब वह पहला लेक्चर खत्म हुआ, तो क्लास से बाहर निकलते ही मैंने जेब से फोन निकाला और अपने सबसे करीबी दोस्त को मिलाया। वह उस वक्त कैंपस के किसी दूसरे कोने में कैंटीन की तरफ घूम रहा था। हमारी जो अगली क्लास थी, वह सीधे 2 बजे से होनी थी। यानी पूरे एक घंटे का लंबा गैप था। अब इतने वक्त तक कैंपस में खाली बैठना भी एक कला है। समय काटने के इरादे से मैं सुस्ती भरे कदमों से कॉलेज की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए धीरे-धीरे छठी मंजिल की तरफ बढ़ा, जहाँ हमारी अगली क्लास का कमरा तय था।


छठी मंजिल के कॉरिडोर में पहुँचते ही मुझे मेरा वो दोस्त मिल गया, और किस्मत से हमारा एक और पुराना जिगरी यार भी वहीं खड़ा था। दोनों के बीच कोई आम बातचीत नहीं चल रही थी, बल्कि वे दोनों एक बेहद दिलचस्प और सस्पेंस से भरे साइंस-फिक्शन शो के क्लाइमेक्स पर गरमा-गरम बहस कर रहे थे। अब मजेदार बात यह थी कि वो शो मेरा भी ऑल-टाइम फेवरेट था। ऐसे में भला मैं खुद को चर्चा से दूर कैसे रखता? मैं भी तुरंत उनके बीच कूद पड़ा। फिर क्या था, हम तीनों थ्योरीज़ बनाने लगे, किरदारों के फैसलों पर चर्चा करने लगे और उस काल्पनिक दुनिया में ऐसे खोए कि घड़ी की सुइयाँ कब घूम गईं, हमें होश ही नहीं रहा।


तभी अचानक दोस्त की कलाई पर बंधी घड़ी ने ध्यान खींचा पूरे 2 बज चुके थे। मैंने तुरंत दोस्त को कोहनी मारी और कहा, "चल भाई, गप्पें बंद करो, क्लास का टाइम हो गया है।" वह हड़बड़ाकर वॉशरूम की तरफ भागा कि फ्रेश होकर आता है, और मैं क्लास के पिछले दरवाजे के पास दीवार से टेक लगाकर खड़े-खड़े उसका इंतजार करने लगा। आमतौर पर हमारी आदत थी कि हम हमेशा आगे वाले मुख्य दरवाजे से ही रौब में एंट्री लेते थे। मैं वहीं खड़ा था कि तभी कॉरिडोर के मोड़ से हमारी एक और दोस्त आती हुई दिखाई दी—वही, जिसे हम सब उसके नखरों और चिड़चिड़े स्वभाव की वजह से प्यार से 'खड़ूस' बुलाते हैं। इतने में मेरा पहला दोस्त भी वापस आ गया। अब हम तीनों एक साथ हो चुके थे। हमने एकदम शांत और सामान्य चेहरा बनाकर क्लास के अंदर कदम रखा, जैसे हम बेहद सीधे और अनुशासित छात्र हों।


क्लास के अंदर का नजारा थोड़ा बदला हुआ था। जैसे ही हम तीनों अंदर गए, हमारी नजर सबसे आगे वाली पहली टेबल पर पड़ी। हर बार की तरह वहाँ लड़कियों के एक पूरे ग्रुप ने पहले से ही अपना किला जमा रखा था और कॉपियां फैलाकर बैठ चुकी थीं। अब फ्रंट रो की वो जादुई सीट तो हमारे हाथ से निकल चुकी थी, इसलिए मजबूरी में हमें ठीक उसके पीछे वाली यानी दूसरी टेबल का रुख करना पड़ा। वैसे, हमारी टेबल पे एक चेयर खाली थी, 'खड़ूस' ने इधर-उधर देखा और उस खाली सीट पर जाकर बैठ गई, जबकि मैं और मेरा दोस्त ठीक उसके पीछे वाली दूसरी बेंच पर गोते लगाकर बैठ गए।


लेकिन कहानी में ट्विस्ट यहाँ आया। जैसे ही 'खड़ूस' को अहसास हुआ कि हम दोनों उसके ठीक पीछे डेरा जमा चुके हैं और उसे परेशान करने के लिए तैयार हैं, उसने एक पल की भी देरी नहीं की। उसने तुरंत अपना भारी-भरकम बैग उठाया, पीछे मुड़ी और बिना कुछ सोचे सीधे हमारी ही बेंच पर आकर हमारे साथ बैठ गई। अब बेंच की सेटिंग कुछ ऐसी बैठी कि मैं बीच में फंस गया, और मेरे दोनों तरफ मेरे दो जिगरी दोस्त थे—एक तरफ मेरा लंगोटिया यार और दूसरी तरफ खुद 'खड़ूस'। तभी प्रोफेसर साहब हाथ में लैपटॉप लिए क्लास में दाखिल हुए। उन्होंने आते ही बिना कोई वक्त गंवाए लैपटॉप से पीपीटी खोला और लंबे-चौड़े मैथेमेटिकल सवाल लिखना और उन्हें सॉल्व करवाना शुरू कर दिया। क्लास का माहौल धीरे-धीरे काफी सीरियस और बोझिल होने लगा था, लेकिन हमारी बेंच की वाइब्स एकदम चिल और मजेदार थीं। इसी बीच मेरे दोस्त ने चुपके से अपनी जेब में हाथ डाला और वहाँ से च्युइंग गम का एक पैकेट निकाला। हम तीनों ने प्रोफेसर साहब की नजरों से बचकर, उस च्युइंग गम को किसी छिपे हुए शाही खजाने की तरह आपस में बहुत ही सावधानी से बांटा और मुंह में दबा लिया। लेक्चर आगे बढ़ता रहा। जब भी उन दोनों को बोर्ड पर लिखे किसी सवाल में कोई डाउट होता या कोई स्टेप समझ नहीं आता, तो मैं धीरे से अपनी कोहनी टिकाता, उनकी कॉपी की तरफ झुकता और फुसफुसाते हुए पूरा लॉजिक समझा देता। सच में, मुश्किल वक्त में अपने दोस्तों के काम आने पर जो सुकून मिलता है, उसकी बात ही कुछ और है।


वो दरअसल एक डबल लेक्चर था, यानी दो घंटे लगातार चलने वाली क्लास। जैसे ही पहला घंटा खत्म हुआ और पहला हाफ बीता, प्रोफेसर साहब ने अचानक बोर्ड की तरफ से मुंह फेरा, अपनी ऐनक ठीक की और एक ऐसा तगड़ा सरप्राइज बम फोड़ा कि पूरी क्लास के सन्नाटे में मानो भूकंप आ गया। उन्होंने बेहद कड़क और गूंजती हुई आवाज में आदेश दिया, "एवरीवन, अटेंशन! सब लोग अपनी-अपनी नोट्स की फेयर कॉपियां तुरंत आगे लेकर आओ, मैं एक-एक करके अभी सबकी चेकिंग करूँगा!"


यह सुनना था कि मानो हमारे पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गई। हमारे तो तोते उड़ गए। मेरे दिल की धड़कन इतनी तेज हो गई कि आवाज बाहर तक सुनाई दे। घबराहट की असली वजह यह थी कि मैंने पूरे सेमेस्टर में आज तक कोई प्रॉपर फेयर कॉपी बनाई ही नहीं थी; मैं तो बस एक रफ, फटे-पुराने रजिस्टर में सारी चीजें रैंडमली घसीट रहा था। जब मैंने घबराकर अपने बराबर में देखा, तो मेरे दोस्त का भी वही हाल था। उसकी कॉपियों के पन्ने बिखरे हुए थे और आधे से ज्यादा नोट्स गायब थे। हद तो तब हो गई जब मैंने 'खड़ूस' की तरफ देखा—क्लास की सबसे सिंसियर दिखने वाली लड़की ने भी डर के मारे अपनी उंगलियां चबाना शुरू कर दिया था, क्योंकि उसने भी चीजें ढंग से मेंटेन नहीं की थीं। हम तीनों एक ही कश्ती में सवार थे, जो अब डूबने के कगार पर थी।


"टेबल नंबर 1, बिना वक्त बर्बाद किए एक-एक करके आगे आओ," प्रोफेसर साहब का अगला कड़क आदेश गूंजा।
हम सब टेबल नंबर 2 पर बैठे थे, यानी अगला ही नंबर हमारा था। डर के मारे मेरी हालत इतनी खराब हो रही थी कि माथे पर पसीना आने लगा। तभी अचानक मेरे दिमाग की बत्ती जली। मैंने आनन-फानन में अपने बैग की गहराई में हाथ मारा और दूसरे सेक्शन के एक दोस्त से कल रात उधार ली हुई एक चमचमाती हुई फेयर कॉपी बाहर निकाल ली। मेरा प्लान सिंपल था अगर मेरा नंबर आया, तो मैं इसी कॉपी को अपनी ढाल बनाकर आगे रख दूंगा और प्रोफेसर साहब के गुस्से से बच जाऊंगा। इधर 'खड़ूस' का चेहरा सफेद पड़ चुका था, वो लगातार कांपती आवाज में बुदबुदा रही थी, "हे भगवान, आज तो गए! अब हमारा क्या होगा? अगर सर ने डांटा तो?" मैंने अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी की और बहुत ही धीमी आवाज में फुसफुसाते हुए उससे कहा, "बिल्कुल डरो मत। बस अपना सिर नीचे झुकाओ, हाथ में पेन पकड़ो और ऐसे नाटक करो जैसे कॉपी में कोई बहुत ही मुश्किल सवाल सॉल्व करने में पूरी तरह डूबी हुई हो। बस एक बात का ध्यान रखना—सर से नजरें मत मिलाना। अगर गलती से भी आई-कॉन्टैक्ट हो गया, तो वो पक्का सबसे पहले हमें ही ऊपर बुला लेंगे।"


अभी हम यह प्लानिंग कर ही रहे थे कि हमारी टेबल के कोने पर बैठा एक और लड़का, जो अब तक हमारी बातें सुन रहा था, बुरी तरह डर गया। जैसे ही उसने कॉपी चेकिंग की गंभीरता को समझा, उसने एक सेकंड का भी संकोच नहीं किया। उसने 'डूबते जहाज से कूदने' वाले अंदाज में अपनी किताबें समेटीं, चुपके से बेंच से उठा और दबे पांव क्लास के दूसरे कोने की एक अनजान टेबल पर जाकर शरण ले ली। हम उसे देखते ही रह गए कि भाई ने कितनी जल्दी पाला बदल लिया। तभी प्रोफेसर साहब ने टेबल नंबर 1 की आखिरी कॉपी पर लाल पेन चलाया, उसे बंद किया और उनकी आवाज फिर से क्लास में गूंजी: "ओके, टेबल नंबर 3! तुम लोग आगे आओ!" यह सुनते ही मानो हमारे कानों पर हमें यकीन नहीं हुआ। हम तीनों ने अविश्वास और हैरानी से एक-दूसरे का चेहरा देखा। प्रोफेसर साहब ने टेबल नंबर 2 को यानी हमारी पूरी बेंच को पूरी तरह से नजरअंदाज करते हुए स्किप कर दिया था! हमारी जान में जान आई। हमने फेफड़ों में भरी रुकी हुई हवा को बाहर निकाला और एक लंबी चैन की सांस ली। लेकिन 'खड़ूस' का शक अभी दूर नहीं हुआ था, वह अब भी सहमी हुई थी। उसने अपनी नजरें कॉपी पर गड़ाए हुए ही धीरे से चेतावनी दी, "ज्यादा हवा में मत उड़ो और अभी से जश्न मनाना बंद करो। क्या पता टेबल नंबर 3 के बाद वो वापस मुड़ें और हमारा नंबर लगा दें?"


उसका इस तरह सोचना और डरना बिल्कुल जायज था, क्योंकि कॉलेज के प्रोफेसरों के मूड का कोई भरोसा नहीं होता। लेकिन शायद उस दिन हमारी किस्मत का सितारा बुलंदियों पर था और भाग्य पूरी तरह हमारे ही पाले में खेल रहा था। टेबल नंबर 3 के कॉपियां चेक करने के बाद, प्रोफेसर साहब की नजर सीधे उसके बगल वाली टेबल पर गई और उन्होंने कड़क कर कहा, "टेबल नंबर 4, योर टर्न!" अब हमारी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। हम अंदर ही अंदर उछल पड़े। आखिरकार, घड़ी की सुइयाँ आगे बढ़ीं और क्लास का आखिरी समय आ गया। प्रोफेसर साहब ने अपनी घड़ी देखी, कॉपियों का ढेर एक तरफ रखा और अटेंडेंस रजिस्टर खोलते हुए एलान किया, "आज के लिए इतना ही। बाकी बची हुई टेबल्स की कॉपियां मैं अगली क्लास में तसल्ली से चेक करूँगा।"


यह सुनते ही ऐसा लगा जैसे हम सातवें आसमान पर पहुँच गए हों। मौत के मुंह से छूकर वापस आने की जो खुशी होती है, वह हमारे चेहरों पर साफ दिख रही थी। 'खड़ूस' के चेहरे पर इस वक्त एक बेहद चौड़ी और खूबसूरत मुस्कान तैर रही थी। उसका इस तरह खिलखिलाकर और दिल खोलकर मुस्कुराना सच में एक बहुत ही दुर्लभ नजारा था, जो रोज-रोज देखने को नहीं मिलता। मैंने उसकी इस राहत भरी खुशी को देखा, थोड़ा करीब झुका और मजाक करते हुए कहा, "देखा? मैंने कहा था न कि जब तक तुम हमारे साथ रहोगी, बिल्कुल महफूज रहोगी तुम।" उस खास पल में उसकी आँखों की चमक और उस जादुई मुस्कान ने वो सब कुछ कह दिया, जिसे बयां करने के लिए शायद डिक्शनरी के सारे शब्द भी कम पड़ जाते। मेरा दूसरा दोस्त भी बगल में बैठा खुशी से झूम रहा था और अपनी कॉपी बंद कर रहा था। उस दिन की इस ऐतिहासिक जीत के बाद हम दोस्तों के ग्रुप में एक नया मुहावरा हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गया "किशन की छत्रछाया"। 


इसके बाद दिन का आखिरी लेक्चर शुरू हुआ। हमने पढ़ाई भी की, बीच-बीच में पुरानी यादें ताजा कीं, एक-दूसरे की टांग खींची और उस पूरे पल को खुलकर जिया। वो सच में एक ऐसा बेहद शानदार, उतार-चढ़ाव से भरा और यादगार दिन था, जिसे मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकता।