chepter 3 in Hindi Crime Stories by devil books and stories PDF | दी किंग ऑफ अंडरवर्ल्ड - 3

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दी किंग ऑफ अंडरवर्ल्ड - 3


सुबह के नौ बजे।
शिवपुर जाग चुका था।
लेकिन आज शहर में कुछ अलग था।
चाय की दुकानों से लेकर जुए के अड्डों तक…
हर जगह सिर्फ एक ही बात हो रही थी—
“राजू भाई मर गया।”
“एक लड़के ने मारा।”
“अकेले।”
“सात आदमी काट डाले…”
कहानियाँ हर घंटे के साथ और खतरनाक होती जा रही थीं।
कोई कह रहा था अर्नब पुलिस वाला है।
कोई उसे सुपारी किलर बता रहा था।
लेकिन किसी ने उसका असली चेहरा साफ नहीं देखा था।
और यही चीज़ डर पैदा कर रही थी।
आजम बाजार।
राजू भाई के आदमी पहली बार बिना आवाज़ के बैठे थे।
दुकानों से वसूली बंद थी।
पूरा इलाका अनाथ लग रहा था।
तभी सड़क पर एक काली थार आकर रुकी।
दरवाज़ा खुला।
चार आदमी नीचे उतरे।
सभी के हाथों में हथियार थे।
सबसे आखिर में नीचे उतरा—
विक्रम “विक्का” यादव।
राजू भाई का सबसे पुराना आदमी।
लंबा शरीर… आँखों में गुस्सा… और माथे पर पुराना कट का निशान।
राजू भाई के बाद वही सबसे बड़ा नाम था।
वो धीरे-धीरे बीच बाजार तक आया।
चारों तरफ खामोशी थी।
विक्का ने जोर से चिल्लाया—
“सुन लो सब!”
उसकी आवाज़ पूरे बाजार में गूँज गई।
“जिसने भी राजू भाई को मारा है…”
उसने पिस्टल निकाली।
“…उसे जिंदा जमीन में गाड़ दूँगा।”
धाँय!!
उसने सामने की दुकान के बोर्ड पर गोली मार दी।
लोग डरकर पीछे हट गए।
विक्का की आँखें खून उतार रही थीं।
“और जो भी उसे छुपाएगा…”
उसने बाजार में खड़े लोगों की तरफ देखा।
“…उसका पूरा खानदान जलेगा।”
उसी वक्त।
बाजार से थोड़ी दूर।
एक पुरानी बिल्डिंग की छत पर कोई खड़ा था।
काली हुडी।
चेहरे पर शांत मुस्कान।
अर्नब।
वो ऊपर से पूरा बाजार देख रहा था।
उसके हाथ में दूरबीन थी।
विक्का की हर हरकत पर उसकी नजर थी।
तभी पीछे से आवाज़ आई—
“तू पागल है।”
अर्नब बिना मुड़े बोला—
“सब यही कहते हैं।”
पीछे वही बाइक वाला लड़का खड़ा था।
नाम — समर।
बचपन से अर्नब के साथ।
लेकिन दोनों में फर्क था।
समर अभी भी इंसान था।
अर्नब… धीरे-धीरे कुछ और बनता जा रहा था।
समर गुस्से में बोला—
“राजू को मारना काफी था। अब रुक जा।”
अर्नब हँसा।
धीमी… ठंडी हँसी।
“मैं यहाँ रुकने नहीं आया।”
“तो क्या करेगा?”
अर्नब की नजर नीचे बाजार पर थी।
“शिवपुर बदलेगा।”
समर ने पूछा—
“और तू बदलेगा इसे?”
“नहीं।”
अर्नब की आँखों में अजीब अंधेरा उतर आया।
“मैं इसे तोड़ दूँगा।”
रात।
शिवपुर का पुराना बंदरगाह।
बारिश शुरू हो चुकी थी।
कंटेनरों के बीच कई गाड़ियाँ खड़ी थीं।
विक्का अपने आदमियों के साथ वहाँ पहुँचा।
“पक्का खबर है?”
एक आदमी बोला—
“हाँ भाई। जिसने राजू भाई को मारा… वो आज यहीं आने वाला है।”
विक्का ने बंदूक लोड की।
“आज उसका खेल खत्म।”
बारिश तेज हो गई।
चारों तरफ अंधेरा और पानी की आवाज़।
तभी…
टप…
टप…
टप…
किसी के कदमों की आवाज़ आने लगी।
सभी आदमी सतर्क हो गए।
अंधेरे से धीरे-धीरे एक परछाईं बाहर आई।
अर्नब।
काली शर्ट।
बारिश से भीगा चेहरा।
हाथ खाली।
विक्का हँसा।
“तू खुद चलकर मौत के पास आया है।”
अर्नब शांत खड़ा रहा।
“तुझे पता है सबसे बड़ी गलती क्या है?”
विक्का ने गुस्से से पूछा—
“क्या?”
“डर में आदमी सोचता कम है।”
विक्का समझ पाता उससे पहले—
धाँय!!
उसके पीछे खड़ा आदमी अचानक गोली लगते ही गिर पड़ा।
सब चौंक गए।
धाँय! धाँय!!
ऊपर कंटेनरों से गोलियाँ चलने लगीं।
विक्का चीखा—
“घात है! छुपो!”
पूरा बंदरगाह गोलियों से गूँज उठा।
अर्नब वहीं खड़ा रहा।
बिल्कुल शांत।
जैसे ये पूरा खेल उसी ने लिखा हो।
एक आदमी उसकी तरफ भागा।
अर्नब ने उसका हाथ पकड़ा…
और पूरी ताकत से उसका सिर कंटेनर पर दे मारा।
ठाक!!
खोपड़ी फट गई।
दूसरा आदमी पीछे से आया।
अर्नब ने उसकी बंदूक छीनकर उसके घुटने में गोली मारी।
“आआआह्ह्ह!”
आदमी नीचे गिर पड़ा।
अर्नब उसके कान के पास झुका।
धीरे से बोला—
“राजू भाई का डर खत्म।”
फिर गोली मार दी।
धाँय!!
विक्का गुस्से से पागल हो चुका था।
उसने अर्नब पर गोलियाँ चला दीं।
लेकिन अर्नब कंटेनरों के बीच गायब हो चुका था।
बारिश…
धुआँ…
चीखें…
और मौत।
पूरा बंदरगाह युद्ध का मैदान बन चुका था।
तभी विक्का के पीछे से आवाज़ आई—
“इतनी जल्दी भूल गया?”
विक्का पलटा—
लेकिन देर हो चुकी थी।
चक्!
अर्नब का चाकू उसके पेट में घुस चुका था।
विक्का दर्द से चीखा।
अर्नब ने उसका कॉलर पकड़ लिया।
“शिवपुर में अब नया नाम चलेगा।”
विक्का खून थूकते हुए बोला—
“तू… भाई नहीं बनेगा…”
अर्नब मुस्कुराया।
“मैं भाई बनने नहीं आया।”
उसने चाकू और अंदर घोंपा।
“…मैं अंत बनने आया हूँ।”
बारिश लगातार गिरती रही।
और उसी बारिश में…
विक्का की लाश धीरे-धीरे जमीन पर गिर गई।