cheptar 8 in Hindi Crime Stories by devil books and stories PDF | दी किंग ऑफ अंडरवर्ल्ड - 8

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दी किंग ऑफ अंडरवर्ल्ड - 8


शिवपुर की रातें अब पहले जैसी नहीं रहीं थीं।
पहले अंधेरा सिर्फ डर लाता था।
अब अंधेरा इंतज़ार लाता था।
लोग रात को दरवाज़े बंद करने से पहले सड़कें देखते थे…
जैसे कहीं कोई काली बाइक अचानक मोड़ से निकल न आए।
आजम बाजार की दुकानों पर फिर भीड़ आने लगी थी…
लेकिन हँसी गायब थी।
हर बातचीत धीरे आवाज़ में होती।
और हर बातचीत का अंत एक ही नाम पर जाकर रुकता—
अर्नब।
कुछ लोग कहते वो शैतान है।
कुछ कहते वो शहर साफ कर रहा है।
लेकिन सच ये था—
किसी को समझ नहीं आ रहा था कि वो आखिर चाहता क्या है।
और यही चीज़ उसे बाकी गुंडों से अलग बनाती थी।
रात 11 बजे।
शिवपुर का “काली घाट” इलाका।
शहर का सबसे पुराना मछली बाजार।
दिन में यहाँ इतनी भीड़ होती थी कि चलना मुश्किल हो जाता…
लेकिन रात में पूरा इलाका वीरान हो जाता था।
बस समुद्र की तरफ से आती हवा…
और पुराने टीन शेड्स की चरमराहट सुनाई देती थी।
एक पुराना गोदाम।
अंदर करीब दस आदमी मौजूद थे।
टेबल पर नक्शे फैले थे।
हथियार रखे थे।
और बीच में बैठा था—
शाहिद “काला” अंसारी।
जेल से निकलने के बाद पहली बार उसने अपने पुराने लोगों को बुलाया था।
उसने सिगरेट जलाई।
एक आदमी बोला—
“भाई, पूरे शहर में उसी की बात चल रही है।”
“किसकी?”
“अर्नब।”
काला हल्का सा हँसा।
“नाम अच्छा है।”
दूसरा आदमी बोला—
“सुना है अकेले सात-सात लोगों को मार देता है।”
“सुना है…”
काला ने उसकी तरफ देखा।
“…या देखा है?”
आदमी चुप हो गया।
काला कुर्सी से उठा।
धीरे-धीरे टहलने लगा।
“शिवपुर की सबसे बड़ी बीमारी पता है क्या है?”
कोई जवाब नहीं।
“लोग कहानियों से डर जाते हैं।”
वो रुका।
“और जो आदमी कहानी बन जाए…”
उसकी मुस्कान और गहरी हो गई।
“…वो आधा युद्ध बिना लड़े जीत जाता है।”
तभी एक आदमी अंदर आया।
घबराया हुआ।
“भाई… खबर मिली है।”
“क्या?”
“आज रात अर्नब बंदर रोड वाले इलाके में दिखा था।”
कमरे में हलचल हुई।
लेकिन काला शांत रहा।
“अकेला?”
“हाँ।”
काला ने अपनी जैकेट उठाई।
“गाड़ी निकालो।”
उसी समय।
बंदर रोड।
समुद्र के किनारे बनी लंबी सुनसान सड़क।
बारिश के बाद सड़क गीली चमक रही थी।
दूर-दूर तक सिर्फ स्ट्रीट लाइट्स की पीली रोशनी।
अर्नब अपनी बाइक के पास खड़ा था।
उसकी नजर सामने खड़ी एक पुरानी बिल्डिंग पर थी।
तीसरी मंजिल की एक खिड़की में हल्की रोशनी जल रही थी।
वो धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।
ऊपर पहुँचकर उसने दरवाजा खटखटाया।
अंदर से एक बूढ़ी औरत की आवाज आई—
“कौन?”
“मैं।”
दरवाजा खुला।
करीब साठ साल की महिला सामने खड़ी थी।
चेहरे पर थकान… लेकिन आँखों में अपनापन।
“फिर चोट लग गई?”
अर्नब चुप रहा।
औरत ने उसका हाथ पकड़ा।
उसकी बाजू पर गोली का पुराना जख्म फिर खुल गया था।
“अंदर आ।”
कमरा छोटा था।
पुराना पंखा।
दीवार पर भगवान की तस्वीर।
और एक कोने में दवाइयों का डिब्बा।
औरत ने पट्टी निकालते हुए पूछा—
“कब तक चलेगा ये सब?”
अर्नब खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया।
नीचे सड़क दिखाई दे रही थी।
“जब तक खत्म नहीं हो जाता।”
“क्या खत्म नहीं हो जाता?”
कुछ सेकंड खामोशी रही।
फिर अर्नब धीरे से बोला—
“ये शहर।”
औरत ने उसकी तरफ देखा।
“शहर खत्म करके क्या मिलेगा?”
अर्नब ने कोई जवाब नहीं दिया।
औरत उसके पास आई।
“तेरे अंदर बहुत गुस्सा है बेटा।”
पहली बार अर्नब की आँखों में हल्की हरकत हुई।
जैसे कोई पुरानी याद उभरी हो।
लेकिन अगले ही पल उसका चेहरा फिर पत्थर जैसा हो गया।
तभी…
नीचे सड़क पर कई गाड़ियों के रुकने की आवाज आई।
अर्नब तुरंत खिड़की की तरफ मुड़ा।
काली SUVs.
कम से कम आठ-दस आदमी।
और उनके बीच—
काला।
दोनों की नजरें कुछ सेकंड के लिए मिलीं।
नीचे खड़ा काला हल्का सा मुस्कुराया।
जैसे उसे पता था अर्नब ऊपर ही है।
और फिर—
उसने धीरे से अपनी उंगली गले पर फेर दी।
मारने का इशारा।
कमरे के अंदर हवा अचानक भारी हो गई।
औरत घबराई।
“कौन हैं ये?”
अर्नब की आँखें अब बिल्कुल ठंडी थीं।
“मुसीबत।”
नीचे।
काला ने अपने आदमियों की तरफ देखा।
“कोई गोली नहीं चलाएगा।”
एक आदमी हैरान हुआ।
“भाई?”
काला मुस्कुराया।
“मैं देखना चाहता हूँ…”
उसने ऊपर खिड़की की तरफ देखा।
“…कहानी कितनी सच्ची है।”
उसके आदमी बिल्डिंग को चारों तरफ से घेरने लगे।
ऊपर कमरे में।
अर्नब ने धीरे-धीरे टेबल से चाकू उठाया।
औरत डर गई।
“अर्नब…”
“दरवाजा बंद कर लो।”
“तू क्या करने जा रहा है?”
अर्नब ने उसकी तरफ देखा।
कुछ सेकंड तक उसके चेहरे पर वही पुराना इंसान दिखा…
जो शायद कभी सामान्य था।
फिर वो भाव गायब हो गया।
“जो जरूरी है।”
वो दरवाजे की तरफ बढ़ा।
सीढ़ियों में अंधेरा था।
नीचे से कदमों की आवाजें आ रही थीं।
टक…
टक…
टक…
धीमी।
आराम से।
जैसे सामने मौत नहीं… मुलाकात इंतजार कर रही हो।
अर्नब दूसरी मंजिल पर रुका।
नीचे काला अकेला सीढ़ियाँ चढ़ रहा था।
उसके आदमी नीचे ही रुक गए।
दोनों के बीच कुछ सेकंड खामोशी रही।
फिर काला हँसा।
“तू सच में बच्चा निकला।”
अर्नब चुप।
“इतने लोगों को मार दिया…”
काला धीरे-धीरे ऊपर आया।
“…और अब बूढ़ी औरतों के घर छुप रहा है?”
अर्नब की पकड़ चाकू पर मजबूत हो गई।
काला ने नोटिस कर लिया।
“अच्छा…”
वो मुस्कुराया।
“…गुस्सा जल्दी आता है।”
अगले ही पल—
अर्नब बिजली की तरह उसकी तरफ झपटा।
चक्!
चाकू सीधा काला के गले की तरफ गया।
लेकिन—
ठाक!!
काला ने उसका हाथ बीच में पकड़ लिया।
सीढ़ियों में जोरदार आवाज गूँजी।
अर्नब की आँखों में पहली बार हल्का surprise दिखा।
क्योंकि आज तक…
किसी ने उसकी स्पीड ऐसे नहीं रोकी थी।
काला मुस्कुराया।
“अब आया मजा।”
उसने पूरी ताकत से अर्नब को दीवार पर दे मारा।
धड़ाम!!
दीवार का प्लास्टर टूट गया।
लेकिन अर्नब तुरंत संभल गया।
उसने काला के पेट में घुटना मारा।
काला पीछे हटा…
और हँसने लगा।
हँसता ही रहा।
जैसे उसे दर्द अच्छा लग रहा हो।
“हाँ…”
उसने होंठ से खून साफ किया।
“…तू बाकी लोगों जैसा नहीं है।”
अर्नब ने पहली बार महसूस किया—
सामने वाला आदमी डर नहीं रहा।
बिल्कुल भी नहीं।
और शायद…
उसे यही चाहिए था।