“शिकार की शुरुआत”
बारिश पूरी रात होती रही।
शिवपुर की सड़कों पर पानी जमा था।
सुबह होने वाली थी, लेकिन आसमान अब भी काले बादलों से भरा था।
एक सुनसान सड़क पर काली बाइक आकर रुकी।
अर्नब धीरे-धीरे नीचे उतरा।
उसकी शर्ट पर मिट्टी लगी थी।
बाएँ कंधे पर गोली छूकर निकली थी।
खून अब भी रिस रहा था।
वो एक पुराने गोदाम की तरफ बढ़ा।
लोहे का भारी दरवाजा खोला।
अंदर अंधेरा था।
कमरे के बीच एक लकड़ी की टेबल रखी थी।
उस पर पूरा शिवपुर फैला हुआ था।
नक्शे।
फोटो।
नाम।
तारीखें।
लाल निशान।
काली स्याही से बने गोले।
ये कोई अड्डा नहीं था।
ये युद्ध कक्ष था।
और पहली बार पाठक को समझ आता कि अर्नब सिर्फ लोगों को मार नहीं रहा था...
वो कई सालों से तैयारी कर रहा था।
दीवार पर लगी तस्वीरों में राजू भाई का चेहरा था।
उसके ऊपर लाल क्रॉस बना था।
विक्का की तस्वीर।
उस पर भी लाल क्रॉस।
कुछ और चेहरे भी थे।
जिनमें से कई अभी जिंदा थे।
अर्नब टेबल के सामने खड़ा रहा।
उसकी नजर एक फोटो पर जाकर रुकी।
सुल्तान मिर्ज़ा।
उस फोटो के नीचे सिर्फ एक शब्द लिखा था—
"जड़"
अर्नब कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।
फिर उसने अगली तस्वीर उठाई।
ACP कबीर राठौड़।
उसके नीचे लिखा था—
"रुकावट... या साथी?"
अर्नब की आँखें कुछ पल के लिए ठहर गईं।
फिर उसने फोटो वापस रख दी।
उसी समय।
ACP कबीर अपने ऑफिस में बैठा था।
तीन रातों से उसने ठीक से नींद नहीं ली थी।
टेबल पर फाइलों का ढेर था।
लेकिन उसकी नजर सिर्फ एक बोर्ड पर थी।
वहाँ धागों से जुड़े कई फोटो लगे थे।
राजू।
विक्का।
बंदरगाह।
फैक्ट्री ब्लास्ट।
काला।
सुल्तान।
और बीच में—
अर्नब।
कबीर कुर्सी पर पीछे झुका।
उसके दिमाग में कुछ फिट नहीं बैठ रहा था।
"अगर ये सिर्फ सत्ता चाहता है..."
उसने खुद से कहा।
"...तो राजू को मारने के बाद उसका इलाका क्यों नहीं लिया?"
"अगर पैसे चाहिए..."
"...तो करोड़ों की डील क्यों उड़ा दी?"
"अगर बदला चाहिए..."
"...तो असली दुश्मन कौन है?"
उसी समय दरवाजा खुला।
इंस्पेक्टर राघव अंदर आया।
"सर।"
"हूँ?"
"अर्नब की पुरानी जानकारी निकाल ली।"
कबीर तुरंत सीधा बैठ गया।
"क्या मिला?"
राघव ने फाइल खोली।
लेकिन चेहरा अजीब था।
"यही तो समस्या है सर।"
"मतलब?"
"कुछ नहीं मिला।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
"कुछ नहीं?"
"स्कूल रिकॉर्ड नहीं।"
"कॉलेज नहीं।"
"पुराना क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं।"
"आधार, वोटर आईडी... कुछ नहीं।"
कबीर की आँखें सिकुड़ गईं।
"कोई आदमी हवा से पैदा नहीं होता।"
राघव धीरे से बोला—
"सर... ऐसा लग रहा है जैसे वो पाँच साल पहले तक अस्तित्व में ही नहीं था।"
दूसरी तरफ।
मिर्ज़ा हवेली।
सुल्तान अपनी लाइब्रेरी में बैठा था।
कमरे में हजारों किताबें थीं।
जो लोग उसे नहीं जानते थे, वे उसे प्रोफेसर समझ लेते।
अपराधी नहीं।
काला सामने बैठा चाकू घुमा रहा था।
"कब मारना है उसे?"
सुल्तान ने किताब बंद की।
"अभी नहीं।"
काला हँसा।
"डर गए क्या?"
सुल्तान ने उसकी तरफ देखा।
एक नजर।
बस एक नजर।
और काला की हँसी रुक गई।
क्योंकि वो जानता था—
सुल्तान कभी डरता नहीं।
"अगर आज अर्नब मर गया..."
सुल्तान बोला।
"...तो मुझे जवाब नहीं मिलेगा।"
"कौन सा जवाब?"
सुल्तान खिड़की तक गया।
"वो आखिर चाहता क्या है?"
काला कुछ सेकंड चुप रहा।
फिर मुस्कुराया।
"मैं जानता हूँ।"
"क्या?"
"खून।"
सुल्तान ने सिर हिलाया।
"नहीं।"
उसकी आवाज बहुत धीमी थी।
"जो आदमी सिर्फ खून चाहता है..."
"...वो योजना नहीं बनाता।"
"...वो इंतजार नहीं करता।"
"...वो सालों तैयारी नहीं करता।"
कमरे में फिर खामोशी फैल गई।
उसी शाम।
शिवपुर के बाहरी इलाके में एक आलीशान फार्महाउस।
बाहर कई गाड़ियाँ खड़ी थीं।
अंदर पार्टी चल रही थी।
शराब।
संगीत।
हँसी।
महंगे कपड़े।
ये शहर के बड़े लोगों की पार्टी थी।
नेता।
बिल्डर।
व्यापारी।
और अपराधी।
सब एक ही छत के नीचे।
ऊपर बालकनी में एक मोटा आदमी खड़ा था।
नाम—
महेन्द्र प्रताप चौहान।
शिवपुर का सबसे प्रभावशाली विधायक।
और सुल्तान का सबसे पुराना राजनीतिक साथी।
राजू भाई भी उसी के लिए काम करता था।
विक्का भी।
महेन्द्र ने शराब का गिलास उठाया।
तभी पीछे से आवाज आई।
"मज़े में हो?"
वो पलटा।
लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
सिर्फ हवा।
वो भौंहें सिकोड़कर आगे बढ़ा।
तभी...
उसे बालकनी की रेलिंग पर एक छोटा सा पैकेट दिखा।
उसने उठाया।
खोला।
अंदर एक फोटो थी।
राजू भाई की।
जिस पर लाल क्रॉस बना था।
महेन्द्र का चेहरा उतर गया।
उसने फोटो पलटी।
पीछे सिर्फ एक लाइन लिखी थी—
"अगला नंबर तुम्हारा है।"
उसके हाथ काँप गए।
क्योंकि पहली बार...
अर्नब ने सीधे किसी ऐसे आदमी को छुआ था—
जो सुल्तान के बराबर महत्व रखता था।
और इसका मतलब सिर्फ एक था।
अर्नब की असली लड़ाई शायद राजू या विक्का से कभी थी ही नहीं।
वो किसी और तक पहुँचने का रास्ता साफ कर रहा था।
किसी बहुत बड़े आदमी तक।
और अब...
शिवपुर का असली युद्ध शुरू होने वाला था।