three and a half bighas in Hindi Fiction Stories by Jeetendra books and stories PDF | साढ़े तीन बीघा

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साढ़े तीन बीघा

मैंने पहली बार रामकिशन यादव का नाम सिरसी थाने की केस डायरी में देखा था। FIR नंबर 347/2024, धारा 302, 120B, 201। कागज पर स्याही थोड़ी फैली हुई थी, जैसे लिखने वाले सिपाही के हाथ कांप रहे हों। तारीख थी 13 दिसंबर 2024, सुबह 6:42। शिकायतकर्ता था रामकिशन का बड़ा बेटा अजय। उसने लिखा था, पापा रात से घर नहीं लौटे, उनका फोन बंद है, और खेत की मेड़ पर खून के धब्बे हैं।

उस दिन के बाद अगले तीन महीने तक मैं इसी केस के पीछे रहा, क्योंकि उत्तर प्रदेश के संभल जिले के इस छोटे से कस्बे सिरसी में प्रॉपर्टी के लिए हत्या नई नहीं थी, पर इस बार कहानी इतनी सीधी और इतनी क्रूर थी कि वह अखबार की हेडलाइन से ज्यादा किसी घर की दीवारों पर लिखी लगती थी।

रामकिशन के पास सिरसी-बिलारी रोड पर, NH-509 से ठीक चार सौ मीटर अंदर, साढ़े तीन बीघा जमीन थी। 1998 में उनके पिता हरिराम ने इसे दो बेटों में बराबर बांटा था, कागज पर नहीं, सिर्फ मौखिक। बड़ा हिस्सा रामकिशन को मिला क्योंकि वह खेती देखता था, छोटा भाई महेंद्र तब मुरादाबाद में ट्रक ड्राइवरी करता था। 2018 में जब सरकार ने उस रोड को फोरलेन करने का नोटिफिकेशन निकाला, तो उस जमीन का सर्किल रेट एक रात में चार लाख रुपये बीघा से बढ़कर बाईस लाख हो गया। 2021 में एक प्राइवेट डेवलपर ने वहां लॉजिस्टिक पार्क का प्रस्ताव रखा। अचानक वह धूल भरी मेड़ सोने की लकीर बन गई।

कागजों में अभी भी पूरी जमीन हरिराम के नाम थी। हरिराम 2016 में मर चुके थे। रामकिशन ने 2019 में तहसील में विरासत दर्ज कराई, पर महेंद्र ने आपत्ति लगा दी। उसने कहा, बंटवारा बराबर का था, मुझे भी आधा चाहिए। मामला संभल की सिविल कोर्ट में चला गया, वाद संख्या 118/2019।

रामकिशन बासठ साल का था, दो बेटे, अजय इकतीस साल, जो सिरसी में ही मोबाइल रिपेयर की दुकान चलाता, और छोटा अनुज सत्ताईस साल, जो नोएडा में सिक्योरिटी गार्ड था। पत्नी सुमित्रा को शुगर थी। महेंद्र पचपन साल का, मुरादाबाद में अब छोटा ट्रांसपोर्ट ऑफिस चलाता। उसका एक ही बेटा विकास, अट्ठाईस साल, बीए फेल, पर जमीन के कागजों में बहुत तेज। विकास ही 2022 से मुकदमा देख रहा था।

दोनों परिवारों के बीच बोलचाल 2020 में बंद हो गई थी। होली दिवाली पर भी दरवाजे नहीं खुलते। गांव वाले बताते हैं कि पंचायत में तीन बार बैठकी हुई, पर हर बार बात पैसे पर अटकती। रामकिशन कहता, तूने बीस साल खेत में पसीना नहीं बहाया, अब रेट बढ़ा तो हिस्सेदार बन गया। महेंद्र कहता, बाप की जमीन है, पसीना नहीं, खून का हक है।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक मौत का समय रात साढ़े नौ से ग्यारह के बीच था। उस दिन अजय की दुकान पर बिजली नहीं थी, इसलिए रामकिशन शाम सात बजे खेत पर पानी की मोटर देखने अकेले गया था। सर्दियों में वहां अंधेरा जल्दी हो जाता है। सुमित्रा ने बताया, वह रोज की तरह टॉर्च और लाठी लेकर निकला। 8:15 पर उसने अजय को फोन किया, बोला मोटर में शॉर्ट है, मिस्त्री को कल बुलाना। यही आखिरी कॉल थी, सत्तासी सेकंड की।

रात 10:40 पर महेंद्र के बेटे विकास ने अजय को फोन किया। कॉल रिकॉर्ड में है। विकास ने पूछा, चाचा घर आ गए क्या, पापा उनसे बात करना चाहते हैं। अजय ने कहा नहीं। सुबह जब अजय खेत गया तो मोटर के पास रामकिशन की चप्पलें पड़ी थीं, टॉर्च टूटी हुई, और मेड़ पर घसीटने के निशान। सौ मीटर दूर, पुराने ईंट भट्ठे के गड्ढे में, जो बारिश में भर जाता है, बॉडी मिली। सिर पर भारी चीज से तीन वार, गला घोंटा हुआ।

पहले अड़तालीस घंटे में पुलिस ने इसे लूट माना। जेब से बारह सौ रुपये और पुराना नोकिया फोन गायब था। पर थाना प्रभारी इंस्पेक्टर राकेश त्यागी को दो बातें खटकीं। पहला, घसीटने के निशान सीधे भट्ठे की तरफ थे, जैसे किसी को छिपाना हो, लूटेरा बॉडी क्यों छिपाएगा। दूसरा, खेत के किनारे लगे नए पेट्रोल पंप के CCTV में रात 9:17 पर एक सफेद स्कॉर्पियो दिखी, नंबर UP21-BH-8743, जो महेंद्र के नाम रजिस्टर्ड थी।

पुलिस ने कॉल डिटेल निकाली। 12 दिसंबर को शाम छह से रात बारह के बीच महेंद्र और विकास के फोन तेईस बार आपस में मिले, और दोनों के फोन की लोकेशन रात 9:05 से 10:12 तक सिरसी के उसी टावर पर थी, जो खेत से छह सौ मीटर दूर है। महेंद्र का कहना था वह मुरादाबाद में था, पर टोल प्लाजा की पर्ची नहीं मिली।

पूछताछ में विकास टूट गया। उसने बताया, पापा ने दो महीने पहले एक बिचौलिए से एक करोड़ दस लाख में जमीन का सौदा पक्का कर लिया था, बयाना भी ले लिया था ग्यारह लाख। पर रजिस्ट्री के लिए रामकिशन के साइन चाहिए थे, क्योंकि कागज अभी भी पिता के नाम और कब्जा बड़े भाई का। कोर्ट में केस चल रहा था, इसलिए कोई खरीदार रिस्क नहीं ले रहा था।

11 दिसंबर को महेंद्र ने आखिरी बार बड़े भाई को पैंतीस लाख ऑफर किए, आधा हिस्सा छोड़ने के लिए। रामकिशन ने पंचों के सामने कहा, एक धूर भी नहीं दूंगा, कोर्ट जो देगा वही। विकास के बयान के मुताबिक, महेंद्र ने कहा, अगर बड़ा भाई नहीं रहेगा तो केस खत्म, विरासत अपने आप हम दोनों भाइयों के बच्चों में बंटेगी, और अजय अकेला पड़ेगा, दबाव में साइन कर देगा।

योजना साधारण थी, इसीलिए भरोसेमंद लगी। महेंद्र ने रामकिशन को फोन कर कहा, चल खेत पर मिल, कागज सुलझा लेते हैं, बिचौलिया भी आएगा। रामकिशन अकेला आया। पुलिस की चार्जशीट कहती है, पहले विकास ने पीछे से लाठी मारी, रामकिशन गिरा। फिर महेंद्र ने गमछे से गला दबाया। सिर पर वार इसलिए किए गए ताकि लगे किसी ने ईंट से मारा। फोन और पैसे उन्होंने निकाल कर गड्ढे में फेंक दिए, बाद में निकाले नहीं जा सके।

बॉडी को घसीट कर भट्ठे में डाला, ऊपर पराली डाल दी। वे स्कॉर्पियो से मुरादाबाद निकल गए, रास्ते में संभल के पास ढाबे पर 10:48 का बिल मिला, जिससे वे अलिबी बनाना चाहते थे। पर CCTV ने टाइमलाइन तोड़ दी।

14 दिसंबर को महेंद्र और विकास को मुरादाबाद से उठाया गया। दोनों ने पहले इनकार किया, फिर विकास ने 164 के बयान में सब कबूल किया। पुलिस ने लाठी, गमछा और खून लगे जूते बरामद किए, जो उन्होंने नहर में फेंके थे, गोताखोरों ने निकाले।

गांव दो हिस्सों में बंट गया। कुछ ने कहा, प्रॉपर्टी आदमी को अंधा कर देती है। कुछ ने कहा, रामकिशन जिद्दी था, थोड़ा दे देता तो जान बच जाती। सुमित्रा अब भी उसी घर में रहती है, दरवाजे पर ताला नहीं लगाती, कहती है, जिस जमीन के लिए मारा, उसी पर अब केस चल रहा है, न बेच सकते हैं न जोत सकते हैं।

अजय ने दुकान बंद कर दी है, वह अब संभल कोर्ट के चक्कर लगाता है। उसने मुझसे कहा, पापा कहते थे, जमीन मां होती है, बांटो मत। अब मां भी नहीं रही, भाई भी जेल में।

मार्च 2026 तक सेशन कोर्ट में ट्रायल चल रहा है। महेंद्र जेल में है, विकास जमानत पर बाहर, शर्त है कि वह सिरसी नहीं आएगा। प्रॉपर्टी अभी भी कोर्ट के स्टे पर है। डेवलपर ने सौदा कैंसल कर दिया। सर्किल रेट फिर गिर गया है, क्योंकि लॉजिस्टिक पार्क दूसरी जगह शिफ्ट हो गया।

पुलिस फाइल में आखिरी नोट इंस्पेक्टर त्यागी का है, 3 जनवरी 2025 का। उसने लिखा है, हत्या का कारण न ईर्ष्या थी न पुरानी रंजिश, सिर्फ एक कागज का टुकड़ा था जिसकी कीमत अचानक बढ़ गई। अगर नोटिफिकेशन नहीं आता, तो शायद दोनों भाई आज भी एक ही थाली में खाते।

मैं जब आखिरी बार उस खेत पर गया, फरवरी की धूप में सरसों खिली थी। मेड़ वही थी, मोटर वही थी। भट्ठे का गड्ढा अब मिट्टी से भर दिया गया है। सुमित्रा ने वहां एक छोटा सा नीम का पेड़ लगा दिया है। उसने कहा, पेड़ बड़ा होगा तो छांव देगा, जमीन किसी के नाम रहे, छांव सबको मिलेगी।

सिरसी में लोग अब भी इस केस को प्रॉपर्टी वाला मर्डर कहते हैं। FIR की कॉपी तहसील के दलालों के पास रहती है, वे नए खरीदारों को दिखाते हैं, कहते हैं देख लो, साइन नहीं मिले तो क्या होता है। कहानी सच्ची लगती है, क्योंकि इसमें कोई फिल्मी मोड़ नहीं है। सिर्फ एक शाम, एक फोन कॉल, एक स्कॉर्पियो, और साढ़े तीन बीघा जमीन, जिसकी कीमत दो भाइयों ने एक जान से ज्यादा लगा दी।