पौड़ी गढ़वाल से कोई बाईस किलोमीटर ऊपर, थलीसैंण ब्लॉक की एक पतली सी सड़क चीड़ के जंगल को चीरती हुई ग्वाड़ गांव तक जाती है। सर्दियों में वहां धुंध इतनी घनी होती है कि सामने वाला घर भी नहीं दिखता, और बरसात में रास्ता फिसलन से भर जाता है। उसी गांव के सबसे ऊपरी धारे पर, जहाँ अब भी पत्थर और मिट्टी से बना दो कमरों का मकान है, धर्म सिंह नेगी और उनकी पत्नी कमला देवी आज भी रहते हैं। उनकी दीवार पर आज भी कोयले से लिखे पहाड़े दिखते हैं, दो एकम दो, दो दूनी चार, जो उनके बेटे संदीप ने बचपन में लिखे थे।
धर्म सिंह के पास पुश्तैनी डेढ़ नाली खेत था, सीढ़ीदार। उसमें मंडुवा और गेहूं होता, पर बंदर और सूअर आधी फसल पहले ही खा जाते। 1998 में जब संदीप पैदा हुआ तो कमला को पौड़ी के जिला अस्पताल ले जाने के लिए गाड़ी नहीं मिली। गांव की दाई ने ही घर में डिलीवरी कराई। उस रात धर्म सिंह श्रीनगर में एक सड़क के काम में मजदूरी कर रहा था, दिन भर पत्थर तोड़ने के बाद उसे तीन सौ रुपये मिले थे। उसने उसी में से सौ रुपये का घी और गुड़ गांव के दुकानदार से उधार पर लिया और पैदल तीन घंटे चल कर घर पहुंचा।
गांव में तब प्राइमरी स्कूल था, पांचवीं तक, एक ही मास्टर। संदीप जब पांच साल का हुआ तो कमला उसे रोज सुबह चार बजे उठाती, चूल्हे की राख से दांत साफ कराती, फिर फटी हुई स्वेटर पहना कर स्कूल भेजती। जूते नहीं थे, प्लास्टिक की चप्पल थी जो सर्दी में टूट जाती। स्कूल ढाई किलोमीटर नीचे था, उतराई पर। संदीप खाली बोतल में छाछ ले जाता, दोपहर में वही पीता। कमला दिन में खेत में काम करती, घास काटती, लकड़ी लाती, और दोपहर बाद आंगनबाड़ी में खाना बनाने में मदद करती। वहां से उसे महीने के बारह सौ रुपये मिलते थे।
धर्म सिंह को पहाड़ में काम नहीं मिला तो वह कोटद्वार चला गया। वहां वह लोडिंग का काम करता, कभी बस अड्डे पर बोरी उठाता। महीने में जो चार पांच हजार बचते, उसमें से दो हजार घर भेजता। सर्दियों में वह दिल्ली चला जाता, एक सोसाइटी में रात की सिक्योरिटी गार्ड की ड्यूटी करता। बारह घंटे खड़े रहना पड़ता, पहाड़ी ठंड में भी उसे पतली वर्दी में गेट पर रहना पड़ता। वह खुद एक टाइम राजमा चावल खाता, पैसे बचाता।
संदीप पढ़ने में तेज निकला। चौथी में उसने ब्लॉक स्तर की छात्रवृत्ति परीक्षा में पहला स्थान पाया। मास्टर जी ने धर्म सिंह को बुला कर कहा, इसे पौड़ी के इंटर कॉलेज में डालो। धर्म सिंह रात भर सो नहीं पाया। पौड़ी का मतलब था हॉस्टल या रोज का बस किराया, किताबें, फीस। अगले हफ्ते उसने अपनी एकमात्र गाय, जो कमला के मायके से मिली थी और जिससे घर में दूध होता था, अठारह हजार में बेच दी। कमला रोई, पर कुछ बोली नहीं। उसी पैसे से संदीप का दाखिला छठी में राजकीय इंटर कॉलेज पौड़ी में कराया गया।
पौड़ी बारह किलोमीटर दूर था। सुबह की एक ही बस थी जो छह बजे निकलती थी। किराया पच्चीस रुपये एक तरफ। धर्म सिंह ने पुरानी साइकिल ठीक कराई। रोज सुबह पांच बजे वह संदीप को साइकिल पर बिठा कर आधे रास्ते तक छोड़ता, फिर वहां से संदीप पैदल या लिफ्ट ले कर स्कूल जाता। शाम को उतराई में वह तेज चल कर घर आता। बारिश में सड़क टूट जाती तो वह कीचड़ में फिसलता हुआ आता, किताबें पन्नी में लपेट कर रखता।
आठवीं में संदीप ने जिले में विज्ञान मेले में मॉडल बनाया, पानी से बिजली। अखबार में छोटी सी खबर छपी। गांव के प्रधान ने कहा, लड़का कुछ करेगा। नौवीं में फिजिक्स केमिस्ट्री की किताबें महंगी थीं, कोचिंग की जरूरत पड़ी। कमला ने अपना गुलबंद और नथ, जो उसकी शादी का था, पौड़ी के सुनार के पास गिरवी रख दिया। नौ हजार मिले। उससे संदीप की कोचिंग की फीस भरी गई।
दसवीं बोर्ड में संदीप ने 93 प्रतिशत अंक लाए। पूरे थलीसैंण ब्लॉक में किसी मजदूर के बेटे ने पहली बार इतने नंबर पाए थे। रिजल्ट वाले दिन धर्म सिंह दिल्ली में ड्यूटी पर था। फोन पर खबर सुनी तो उसने गेट पर खड़े खड़े ही अपने साथी गार्ड को मिठाई खिलाई, उधार के पैसे से। वह रात भर सो नहीं पाया।
ग्यारहवीं में संदीप ने साइंस ली। सपना था इंजीनियर बनने का। पर कोचिंग देहरादून में थी। फीस बहुत थी। धर्म सिंह ने ठेकेदार से कह कर बद्रीनाथ हाईवे पर मजदूरी पकड़ ली। तीन महीने पत्थर तोड़ता रहा। कमला अकेले खेत संभालती, साथ में गांव की दो औरतों के स्वेटर बुनती, एक स्वेटर के अस्सी रुपये मिलते। संदीप शाम को गांव के बच्चों को पढ़ाने लगा, सौ रुपये महीना। उससे अपनी कॉपी का खर्च निकलता।
बारहवीं में 89 प्रतिशत आए, JEE में रैंक नहीं आई। संदीप टूट गया। उसने फोन पर बाप से कहा, अब नहीं पढ़ूंगा, दिल्ली आ जाता हूं, तेरे साथ ड्यूटी कर लूंगा। धर्म सिंह ने सिर्फ इतना कहा, तू पहाड़ से नीचे मजदूरी करने नहीं आया है। उसने अपनी साइकिल बेच दी, दो हजार रुपये आए। उससे संदीप को देहरादून ले गया, एक सस्ते कमरे में रखा, कहा एक साल दे, PCS की तैयारी कर। अफसर बन।
संदीप ने उत्तराखंड लोक सेवा आयोग की तैयारी शुरू की। कमला ने गांव में मनरेगा में काम किया, पत्थर ढोए। हर महीने वह पोस्ट ऑफिस से पांच सौ हजार रुपये भेजती। धर्म सिंह अब भी दिल्ली में गार्ड था, रात की ड्यूटी में ठंड से उसके घुटने सूज जाते। वह खुद चाय बिस्किट खा कर सो जाता।
2018 में पहला प्री निकला, मेंस में रह गया। संदीप ने मां को बताया तो कमला ने कहा, घबराना मत, मंडुवा तो इस साल भी होगा। 2019 में फिर प्री निकला, इंटरव्यू तक पहुंचा, नाम नहीं आया। उसी साल धर्म सिंह बीमार पड़ा, दिल्ली की सर्दी में छाती में दर्द हुआ। संदीप देहरादून से गांव आया। धर्म सिंह ने अस्पताल के बिस्तर पर कहा, तू मत रुक, मैं ठीक हूं। कमला ने उस रात अपनी चांदी की हंसुली बेच दी, बिल भरा।
लॉकडाउन में सब बंद हो गया। संदीप गांव लौट आया। यहीं उस दो कमरे के घर में, जहां बिजली शाम को ही आती थी, वह लालटेन और मोबाइल की रोशनी में पढ़ता रहा। गांव वाले हंसते, कहते नेगी ने दिल्ली में कमा कर बेटे को बाबू बना दिया, अब देखो घास काट रहा है। कमला सुनती, चुप रहती, पर रात को चूल्हे पर रोटी बनाते हुए उसकी आंखें भर आतीं।
2020 में संदीप ने फिर फॉर्म भरा। इस बार उसने UKPCS की तैयारी की। प्री, मेंस, इंटरव्यू सब दिया। रिजल्ट आया 15 सितंबर 2021 को। दोपहर के तीन बजे थे, कमला खेत से मंडुवा काट कर लौट रही थी, पीठ पर घास की भारी बोझी थी। धर्म सिंह तब तक गांव आ चुका था, अब वह यहीं सड़क मरम्मत में बेलदारी करता था। संदीप का फोन आया, आवाज कांप रही थी, मां, हो गया।
कमला को समझ नहीं आया। संदीप चिल्लाया, SDM बन गया, रैंक 19। कमला ने घास की बोझी वहीं मेड़ पर रख दी, बैठ गई। धर्म सिंह के हाथ में कुदाल थी, छूट गई। गांव में खबर जंगल की आग की तरह फैली। जिस प्राइमरी स्कूल में संदीप ने जमीन पर बैठ कर पढ़ा था, उसी के मास्टर दौड़े आए।
चार दिन बाद संदीप पहली बार छुट्टी पर गांव आया। सरकारी गाड़ी नहीं थी, वह पौड़ी तक बस से आया, फिर वहां से जीप में। गांव के मोड़ पर उतरा, कंधे पर वही पुराना बैग। गेट पर धर्म सिंह पुरानी टोपी में खड़ा था, कमला ने आंगन गोबर से लीपा था, धूप जलाई थी। संदीप ने झुक कर दोनों के पैर छुए तो कमला ने उसे सीने से लगा लिया और फूट फूट कर रोई। इतने सालों की थकान पहली बार हल्की लगी। धर्म सिंह ने कुछ नहीं कहा, बस उसकी पीठ थपथपाई, उसकी आंखें लाल थीं।
उस शाम पूरे गांव ने भंडारा किया। प्रधान ने ढोल दमाऊं मंगवाया। जिस ठेकेदार के यहां धर्म सिंह ने पत्थर तोड़े थे, वह भी आया, बोला नेगी, तूने हम सबका सिर ऊंचा कर दिया। संदीप ने खड़े हो कर सिर्फ इतना कहा, यह वर्दी मेरी नहीं, मेरे मां बाप की घास काटने और रात जागने की है। उसने वहीं ऐलान किया कि वह अपनी पहली तनख्वाह से गांव के स्कूल में एक लाइब्रेरी और कंप्यूटर लगवाएगा।
आज ग्वाड़ गांव में वह लाइब्रेरी चलती है। दो कमरे, चीड़ की लकड़ी की अलमारियां, तीन हजार किताबें, दो कंप्यूटर। दीवार पर धर्म सिंह और कमला की बड़ी सी तस्वीर लगी है, नीचे गढ़वाली में लिखा है, मेहनत की पढ़ाई। संदीप अब चमोली में तैनात है, SDM है। हर महीने वह गांव आता है, मां के हाथ की झंगोरे की खीर खाता है, बाप के साथ धारे पर बैठ कर चाय पीता है।
धर्म सिंह अब मजदूरी नहीं करता। वह लाइब्रेरी में बच्चों को अनुशासन सिखाता है, कहता है, किताब उठाओगे तो पलायन नहीं करना पड़ेगा। कमला अब भी सुबह घास लेने जाती है, पर अब उसके गले में वही हंसुली है जो संदीप ने पहली तनख्वाह से छुड़वाई थी। उसने नथ भी छुड़ा ली, वही पुरानी, अब वह उसे हर त्योहार पर पहनती है।
पिछले साल गांव की एक लड़की ने नर्सिंग की परीक्षा पास की, एक लड़के ने फॉरेस्ट गार्ड की। दोनों ने कहा, हमने संदीप दा को देख कर पढ़ाई की। प्रधान अब कहता है, हमारे गांव से अब कोई बच्चा दसवीं के बाद दिल्ली मजदूरी नहीं जाएगा।
यह कहानी अखबार में नहीं छपी, टीवी पर नहीं आई। पर जिस दिन संदीप की गाड़ी पहली बार गांव की उस टूटी सड़क पर आई थी, उस दिन धर्म सिंह ने अपनी फटी स्वेटर के ऊपर बेटे की दी हुई नई जैकेट पहनी थी। कमला ने दरवाजे पर सरसों के तेल का दीया जलाया था, वही दीया जिससे संदीप कभी पढ़ता था। गांव की औरतें कहती हैं, कमला ने बेटा नहीं, अपनी तपस्या को अफसर बनाया है।
और सच कहूं तो जब मैं पिछले महीने उस लाइब्रेरी में गया, एक नौ साल का बच्चा जमीन पर बैठा पहाड़ा रट रहा था, दो एकम दो, दो दूनी चार। उसकी मां बाहर घास सुखा रही थी। मैंने पूछा, बड़ा हो कर क्या बनेगा। उसने बिना रुके कहा, SDM, संदीप दा जैसा। उसके पीछे दीवार पर धर्म सिंह की तस्वीर मुस्कुरा रही थी, जैसे कह रही हो, पहाड़ में पढ़ाना मुश्किल है, पर एक बार बन जाए तो पूरी घाटी पढ़ जाती है।