भंवर - भाग 1 { उपन्यास } in Hindi Women Focused by Anil Kundal books and stories PDF | भंवर - भाग 1

Featured Books
Categories
Share

भंवर - भाग 1

                    ़ं एक ़ं 

मैंने कब चाहा था कि उससे मिलूँ? और मिल ही गया था वह किसी यायावर की तरह एकाएक एक अनजाने सफ़र पर निकले हुए, तो मैंने कब यह भी कभी चाहा था कि वो मुझसे प्रेम करे? फिर भी प्रायः सुबह शाम बस यही सब सोचती रहती थी कि प्रेम पर संभवतः ना ही उसका और ना ही मेरा कोई जोर रहा हो! प्रेम होना था, सो हो गया। इस दुनिया में  बहुतों सी चीजों के जैसे प्रेम करने और ना करने पर भी किसका बस चल पाया है? लेकिन यह कहाँ लिखा है कभी किसी ने कि एक की ही निभाने की जवाबदेही है, दूसरा पूर्णतः स्वच्छंद है? 

मैं बस इन्हीं सभी विचारों के भंवर में फंसी हुई थी कि अम्मा जी की कर्कश आवाज ने मुझे पूरी तरह से झंझोर कर रख दिया था, " गुड्डी, बिटिया! क्या सो गई, मेरी लाडो? "

" हाँ, सो गई हूँ! " मैंने बिस्तर पर से ना उठने के मारे झूठ मूठ ही कह दिया था। पर मेरी बात के पूरी होने के पूर्व ही वे झुंझलाहट के साथ बोली, " जागती हो और कहती हो कि सो गई हूँ। इधर आएं कि आती है, मरी?"

 मैंने अम्मा जी की बात अपने पूरे कान खोलकर सुन ली थी , लेकिन अपनी जगह से मैं टस से मस नहीं हुई और ढीठों की तरह चुपचाप अपनी सांसें खींचें हुई अपनी शय्या पर चित पड़ी रही थी। सोचा था कि और दो चार बार बुलाएँगी, तो चलें जाएंगे। वरना नहीं। और अपनी दोनों आंखों को बंद करने के साथ ही मैंने सो जाने की फिर से कोशिश की। अपने दिलोदिमाग़ पर जोर देकर अच्छे दिन याद करने की भी भरपूर कोशिश की। ताकि अच्छे से सुकून भरी नींद आ जाती। पर सब व्यर्थ सा जान पड़ा था और पता नहीं क्यों अनायास ही अम्मा जी की भी चिंता सताने लगी कि बीस मिनट से ऊपर का वक्त गुजर चुका है लेकिन अम्मा जी की आवाज कतई ख़ामोश क्योंकर हो गई! ठीक भी हैं कि? 

चिंता भाव सब तरह के भावों को तिलांजलि दे देने में कोई कसर नहीं छोड़ता है। हम दरअसल चिंता उसी की करतें हैं, जिससे हमारा अगाध स्नेह हो। 

पिताजी के देहावसान के पश्चात् अम्मा जी ही केवल एकमात्र मेरे जीने का सहारा रह गया था। और तो कोई और अपना था नहीं। ना कोई भाई और ना कोई बहन। जहाँ तक रिश्तेदारों का संबंध है, उनका होना और ना होना -  एक बराबर ही है। 

मैंने यूँ ही अपने कमरे की खिड़की से झांक कर बाहर गली की तरफ देखा, तो हर तरफ पसरे रात के सन्नाटे और अंधियारे में हर चीज़ की मिटी हुई हस्ती देखकर कुछ देर के लिए सहम सिहर सी गई मैं। सिर्फ रात की स्याही के अतिरिक्त कुछ और कुछ नहीं दिखाई देता था। वो सामने के अनगिनत से दिखते घर मकान और इक्की दुक्की दो चार रही सही दुकानें। उन नाजुक घड़ियों में कोई आदमी या बिल्ला कुत्ता भी नज़र नहीं आता था। संभवतः सभी के सभी अपने अपने ठिकानों पर ठिकाने लगे हुए थे! 

ठंडी हवाओं के झोंकें एकाएक मेरे दिल को डरा से जातें। कल सारा दिन और सारी रात लगातार मेह जो बरसता रहा था और अब ठंड भी बढ़कर दोगुनी हो चुकी थी। 

अपने ऊपर मोटा सा गरम शाल औढ़ कर मैं आधी सोई और आधी जागी हुई कदम दर कदम बढ़ाती हुई मंद्र गति की चाल चलकर अम्मा जी के कमरे की तरफ बढ़ गई थी। 

कि अचानक से ही जब कोई आवारा कुत्ता गली से गुजरते हुए भौंकने लगा, तो उसकी आवाज सुनकर मेरे दिल की धड़कन बहुत ही ज्यादा बढ़ सी गई महसूस हुई। 

मेरे पांव आप ही आप एक ही जगह पर ठिठक से गए। और मेरे कल्पनाशील मस्तिष्क में तरह तरह के खौफनाक ख्यालों के आने जाने का कुछ अजीबोगरीब सिलसिला शुरू हो गया। 

" गुड्डी, इस वक्त गली में कौन हो सकता है? कोई चोर उचक्का ही ना? या फिर कोई भटकती हुई रूह भी तो हो सकती है? " मैं अपने आप से बुदबुदाई और ऐसे डरावने ख्यालों के आते ही मैं यकायक एक घोड़ी के जैसे सरपट दौड़ लगाते हुए अम्मा जी के कमरे पर एक ही सांस खींचने के साथ ही पहुँच गई। 

अम्मा जी के कमरे में नन्हें से बल्ब की मद्धिम रौशनी में पहुँच कर मेरी रूह को बहुत सुकून मिला। मुझे उस वक्त ऐसा महसूस हुआ जैसे कि मैं अपने शक्तिशाली कवच की सीमारेखा के भीतर आ चुकी हूँ और अब मुझे किसी तरह का भय नहीं रहा। मैंने एक सुख चैन से भरी लंबी सी दीर्घ श्वास खींची और एक लंबी सी दीर्घ श्वास छोड़ी। 

अम्मा शायद मजे की मीठी नींद में सोई हुई थी। मैंने धीरे से अम्मा जी को आवाज लगाई, " सो गईं क्या, अम्मा जी? "

और मेरे उस प्रश्न के प्रत्युत्तर में अम्मा जी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई और एकदम यूँ शांत प्रमन बनी रहीं जैसे कि इस दुनिया को सदैव के लिए ही छोड़ गईं हों। 

मैंने कुछ देर की दमघोंटू ख़ामोशी के बाद फिर से एक बार और आवाज लगाई और उस बार की आवाज से यह आवाज ज्यादा तेजतर्रार थी। 

फिर से वो ही दमघोंटू ख़ामोशी कमरे को काटती हुई सी महसूस हुई। 

मै बहुत भयभीत हो उठी और अबकी बार मैंने चिल्ला कर आवाज लगाई। तब भी जब अम्मा जी नहीं उठीं, तो मैंने दौड़ कर उन्हें अपनी बांहों में भर लिया और फूट फूट कर रोते हुए बोली, " अम्मा जी, आप मुझे छोड़ कर क्यों चली गईं। अब मैं किसके सहारे जिंदा रहूंगी? हाय,रे! मेरी अम्मा!"

मैं अच्छे से रो भी नहीं सकी थी कि अम्मा जी मुझे एक खींच के करारा सा रैपटा सेंका और गुस्साये हुईं बोलीं, " पीछे हट निगोड़ी,  पगली चोटी! मुझे अब मार कर ही छोड़ेगी क्या? मुझे सही से सांस लेने में भी दिक्कत आ रही है। " अम्मा जी मेरी देह के भार से मुक्ति पाने के साथ ही किंचित मुस्कुराई। 

" आप अभी जिंदा हैं, मरी नहीं क्या? " मैंने भी चकोटी काटने के साथ ही कहा था। "

" मरे मेरे दुसमन, मैं क्यों मरूँ? " अम्मा फिर से बोली। और ना जाने क्यों कुछ गहराई के साथ सोच विचार करने के साथ ही मेरी आँखों में पानी तैरने सा लगा। और उसके साथ ही सिसकियां भी। 

अम्मा जी ने मुझे अपने अंक में भर लिया था और मेरी भी आंखों ने काफ़ी देर तक बारिश की।