रात काफी हो चुकी थी।
स्टेशन पर भीड़ धीरे-धीरे कम हो रही थी, लेकिन आरव अब भी उसी बेंच पर बैठा था। उसके हाथों में सिया की छोड़ी हुई किताब थी और दिमाग में उसकी आखिरी बात बार-बार घूम रही थी
"अगर किस्मत ने चाहा… तो हम फिर मिलेंगे…"
आरव ने घड़ी देखी। उसकी ट्रेन आने में सिर्फ दस मिनट बाकी थे।
वो चाहता तो किताब वहीं जमा करके चला जाता, लेकिन ना जाने क्यों उसका दिल ऐसा करने को तैयार नहीं था।
उसने किताब को अपने बैग में रखा और गहरी सांस ली।
“शायद ये सिर्फ एक इत्तेफाक था…” उसने खुद से कहा।
लेकिन दिल मानने को तैयार नहीं था।
ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आ चुकी थी। लोग जल्दी-जल्दी अंदर चढ़ रहे थे। आरव भी धीरे-धीरे अपनी सीट की तरफ बढ़ा, मगर उसकी नजर बार-बार स्टेशन के गेट की तरफ जा रही थी… जैसे उसे उम्मीद हो कि सिया अचानक वापस आ जाएगी।
लेकिन वो नहीं आई।
ट्रेन चल पड़ी।
बारिश की बूंदें खिड़की के शीशे पर गिर रही थीं और आरव चुपचाप बाहर अंधेरे में देख रहा था। जिंदगी में पहली बार उसे किसी अजनबी के जाने का इतना दुख हो रहा था।
उसने बैग से सिया की किताब निकाली।
किताब के बीच में एक छोटा सा कागज़ रखा हुआ था।
आरव ने धीरे से उसे खोला।
उसमें एक अधूरी कविता लिखी थी
"कुछ लोग बारिश की तरह होते हैं…
थोड़ी देर ठहरते हैं…
लेकिन दिल में हमेशा के लिए उतर जाते हैं
नीचे सिर्फ एक शब्द लिखा था
“सिया”
आरव के होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।
“अजीब लड़की है…” उसने मन ही मन कहा।
अचानक उसकी नजर किताब के पीछे लिखे एक पते पर पड़ी।
“ग्रीन वैली हॉस्पिटल, दिल्ली”
आरव कुछ सेकंड तक उस पते को देखता रहा।
“क्या वो वहीं गई होगी?” उसके मन में ख्याल आया।
लेकिन अगले ही पल उसने खुद को रोका।
“तुम पागल हो रहे हो आरव… सिर्फ कुछ घंटों की मुलाकात थी।”
उसने किताब बंद कर दी, लेकिन दिल में एक बेचैनी लगातार बढ़ रही थी।
पूरा सफर उसी बेचैनी में बीता।
अगली सुबह आरव अपने नए शहर पहुंच गया।
शहर बड़ा था… भीड़भाड़ वाला… लेकिन उसके अंदर अजीब सी खालीपन थी।
उसने नई नौकरी जॉइन कर ली, नया कमरा ले लिया और जिंदगी को फिर से सामान्य बनाने की कोशिश करने लगा।
लेकिन हर रात उसे वही स्टेशन याद आता… वही बारिश… और सिया की मुस्कान।
एक दिन ऑफिस में उसका दोस्त कबीर उससे बोला
“भाई, तू आजकल इतना खोया-खोया क्यों रहता है?”
आरव हल्का सा हंस पड़ा।
“कुछ नहीं
“देख, मुझे मत छुपा। मामला लड़की का लगता है।”
आरव चुप हो गया।
कबीर उसकी तरफ देखने लगा।
“सच में कोई है क्या?”
कुछ सेकंड बाद आरव ने धीरे से कहा
शायद
नाम?
सिया
“ओहो!” कबीर मुस्कुराया, “तो फिर बात आगे बढ़ा ना।”
आरव ने उदास होकर कहा
“समस्या ये है कि मुझे सिर्फ उसका नाम पता है।”
“क्या?” कबीर जोर से हंस पड़ा, “मतलब तू किसी अजनबी लड़की को दिल दे बैठा?
आरव ने जवाब नहीं दिया।
क्योंकि शायद कबीर सही कह रहा था।
उस रात आरव फिर देर तक सो नहीं पाया।
आखिरकार उसने फैसला किया।
“मुझे एक बार उससे मिलना होगा…
अगले दिन उसने ऑफिस से छुट्टी ली और सीधे दिल्ली के लिए निकल पड़ा।
कई घंटों के सफर के बाद वो ग्रीन वैली हॉस्पिटल पहुंचा।
उसका दिल बहुत तेज धड़क रहा था।
वो रिसेप्शन के पास गया।
“Excuse me… यहां सिया नाम की कोई लड़की आई थी क्या?”
रिसेप्शनिस्ट ने कंप्यूटर चेक किया।
“पूरा नाम?”
आरव चुप हो गया।
उसे एहसास हुआ… उसे तो सिया का सरनेम तक नहीं पता।
“मुझे सिर्फ इतना पता है कि उसके पापा यहां एडमिट थे
रिसेप्शनिस्ट ने सिर हिलाया।
“सॉरी सर, इतनी जानकारी से हम कुछ नहीं बता सकते।
आरव निराश होकर पीछे हट गया।
उसे खुद पर गुस्सा आ रहा था।
“क्यों आया मैं यहां?” उसने खुद से कहा।
वो वापस जाने ही वाला था कि तभी उसकी नजर अस्पताल के कॉरिडोर में लगी एक पेंटिंग पर पड़ी।
उस पेंटिंग के नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था
“Made by Siya Verma”
आरव की आंखें चमक उठीं।
“सिया वर्मा
कम से कम अब उसे उसका पूरा नाम पता चल चुका था।
उसी समय पीछे से एक आवाज आई
“आप सिया को जानते हैं?”
आरव ने पलटकर देखा।
सामने लगभग पचास साल की एक महिला खड़ी थीं।
“जी… मैं… हम स्टेशन पर मिले थे।”
महिला की आंखों में हल्की मुस्कान आई, लेकिन अगले ही पल उनका चेहरा उदास हो गया।
“तुम बहुत देर से आए
आरव घबरा गया।
“क्यों? क्या हुआ सिया को
महिला ने कांपती आवाज में कहा
“सिया पिछले तीन दिनों से अस्पताल में है
आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“क्या
उसके दिल की धड़कन अचानक तेज हो गई।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर सिया के साथ हुआ क्या था…।