When a relationship turns into love - 8 in Hindi Love Stories by Priyam Gupta books and stories PDF | जब रिश्ता प्यार बन जाए. - 8

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जब रिश्ता प्यार बन जाए. - 8


Episode 8 — जब ख़ामोशी बोलने लगे



रात काफ़ी देर तक नींद नहीं आई।
Priyam बिस्तर पर करवटें बदलती रही,
छत को घूरते हुए जैसे अपने ही सवालों के जवाब ढूँढ रही हो।
Yaman की बातें उसके दिमाग़ में घूम रही थीं—
“पीछे हटना भी एक सही कदम हो सकता है।”
अजीब था।
पहली बार किसी ने उसे यह एहसास दिलाया था
कि ना कहना भी उतना ही जायज़ है
जितना हाँ कहना।
लेकिन डर…
डर अब भी वहीं था।
सुबह जब उसकी आँख खुली,
तो घर में सामान्य-सी हलचल थी।
माँ रसोई में थीं,
बर्तन की आवाज़ें आ रही थीं,
जैसे सब कुछ बिल्कुल ठीक हो।
लेकिन Priyam जानती थी—
सब कुछ ठीक दिख रहा है,
है नहीं।
वह उठकर खिड़की के पास खड़ी हो गई।
बाहर सूरज निकला हुआ था,
हल्की धूप सामने वाले घर की दीवार पर गिर रही थी।
“ज़िंदगी भी ऐसी ही होती है शायद,”
उसने सोचा,
“ऊपर से रोशनी, अंदर कहीं उलझन।”
नाश्ते की मेज़ पर आज कोई सवाल नहीं पूछा गया।
माँ ने बस चुपचाप प्लेट उसके सामने रख दी।
यह चुप्पी
सवालों से ज़्यादा भारी थी।
Priyam ने धीरे से कहा—
“माँ…”
माँ ने उसकी तरफ देखा।
“हूँ?”
वह कुछ पल रुकी।
फिर बोली—
“अगर कोई फैसला लेने में समय लगे…
तो क्या वो ग़लत होता है?”
माँ ने चम्मच रखते हुए कहा—
“फैसला देर से हो सकता है,
पर दबाव में लिया गया फैसला
ज़्यादा नुकसान करता है।”
Priyam की आँखें भर आईं।
“तो आप नाराज़ नहीं होंगी?”
माँ मुस्कुराईं,
थोड़ा थका हुआ,
पर सच्चा मुस्कुराना।
“मैं बस चाहती हूँ
कि तुम खुद से नाराज़ न रहो।”
उस दिन दोपहर में Priyam अकेली बाहर निकली।
कोई तय जगह नहीं थी।
बस चलना था।
वही सड़कें,
वही भीड़,
लेकिन आज सब कुछ थोड़ा अलग लग रहा था।
एक बुकस्टोर के सामने वह रुक गई।
अंदर गई।
किताबों की खुशबू उसे हमेशा सुकून देती थी।
उसने एक किताब उठाई—
“खुद से मुलाक़ात”।
नाम पढ़कर
वह हल्का-सा मुस्कुरा दी।
“शायद यही तो कमी है,”
उसने सोचा,
“मैं सब से मिल रही हूँ,
खुद से नहीं।”
शाम होते-होते Yaman का कॉल आया।
“अगर busy हों, तो बाद में बात कर सकते हैं,”
उसने हमेशा की तरह space देते हुए कहा।
“नहीं,”
Priyam ने कहा,
“मैं बात करना चाहती हूँ।”
वे पास के एक कैफ़े में मिले।
कोई ज़्यादा सजावट नहीं,
बस सादगी।
वे आमने-सामने बैठे थे।
इस बार Priyam ने ही शुरुआत की।
“मुझे डर लगता है,”
उसने सीधे कहा।
Yaman ने कुछ नहीं कहा।
बस सुना।
“डर इस बात का कि
मैं फिर किसी expectation में खुद को खो दूँ।
डर इस बात का कि
अगर मैंने हाँ कहा,
तो कहीं मैं खुद को पीछे न छोड़ दूँ।”
उसकी आवाज़ हल्की काँप रही थी।
Yaman ने धीरे से कहा—
“और अगर आपने ना कहा?”
Priyam ने एक गहरी साँस ली।
“तो डर है कि
कहीं मैं एक अच्छे इंसान को
बिना वजह खो न दूँ।”
कुछ पल खामोशी रही।
फिर Yaman बोला—
“आप मुझे नहीं खोएँगी।
रिश्ता बने या न बने,
सम्मान बना रहेगा।”
Priyam ने उसे देखा।
उसकी आँखों में कोई शर्त नहीं थी।
उस रात Priyam ने पहली बार
अपने डर को काग़ज़ पर उतारा।
हर वो बात
जो उसने कभी किसी से नहीं कही थी।
उसने लिखा—
मैं मजबूत दिखती हूँ,
पर हर बार फैसला लेते वक्त
मैं खुद को भूल जाती हूँ।
इस बार
मैं खुद को चुनना चाहती हूँ,
चाहे रास्ता थोड़ा अकेला क्यों न हो।
लिखते-लिखते
आँसू गिरते रहे,
लेकिन मन हल्का होता गया।
अगले दिन उसने परिवार को बुलाया।
सब बैठे थे—
माँ, पापा,
और कुछ अपने।
उसके हाथ हल्के काँप रहे थे,
लेकिन आवाज़ साफ़ थी।
“मुझे थोड़ा समय चाहिए,”
उसने कहा।
“मैं मना नहीं कर रही,
बस अभी हाँ नहीं कह पा रही।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
फिर पापा बोले—
“अगर समय चाहिए,
तो मिलेगा।”
बस इतना।
कोई बहस नहीं,
कोई दबाव नहीं।
Priyam की आँखों से
राहत के आँसू निकल आए।
रात को उसने Yaman को मैसेज किया—
“मैंने सच कहा।”
कुछ देर बाद जवाब आया—
“मुझे आप पर भरोसा था।”
Priyam ने फोन साइड में रखा
और पहली बार
अपने फैसले से डर नहीं लगा।